पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 97, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ८५
जिस प्रकार श्मशान में भी जलती हुई अग्नि समस्त वस्तुओं को जला देने में समर्थ होती है तथा उसके देवत्व का नाश नहीं होता उसी प्रकार वेदज्ञ ब्राह्मण सर्वभक्षी होते हुए भी देवता ही है ॥३०॥ अमेध्यानि तु सर्वाणि प्रक्षिप्यन्ते यथोदके । तथैव किल्बिषं सर्वं प्रक्षिपेच्च द्विजानले ॥३१॥ जिस प्रकार अपवित्र वस्तु जल में डालने से पवित्र हो जाती है, उसी प्रकार ब्राह्मणरूपी अग्नि में भी शुद्धि के लिए अपना पाप प्रकट कर देना चाहिए ॥३१॥ गायत्रीरहितो विप्रः शूद्रादप्यशुचिर्भवेत् । गायत्रीब्रह्मतत्त्वज्ञाः सम्पूज्यन्ते जनैर्द्विजाः ॥३२॥ जो ब्राह्मण गायत्री को नहीं जानता वह शूद्र से भी अपवित्र होता है । परन्तु जो गायत्री और ब्रह्म तत्त्व को जाननेवाला है वह संसार में लोगों से पूजित होता है ॥३२॥ दुःशीलोऽपि द्विजः पूज्यो न तु शूद्रो जितेन्द्रियः। कः परित्यज्य गां दुष्टां दुहेच्छीलवतीं खरीम् ? ॥३३॥ शीलरहित भी ब्राह्मण पूजा के योग्य होता है । पर शूद्र कितना भी जितेन्द्रिय हो, तो वह पूजा के योग्य नहीं होता । जिस प्रकार लोग शीलरहित गौ को दुहते हैं, पर सीधी गदही को कोई नहीं दुहता ॥३३। धर्मशास्त्ररथाऽऽरूढा वेदखड्गधरा द्विजाः । क्रीडार्थमपि यद् ब्रूयुः स धर्मः परमः स्मृतः ॥३४॥ धर्मशास्त्ररूपी रथ पर बैठे हुए वेदरूपी तलवार को धारण किये हुए ब्राह्मण विनोद के लिए भी जो कुछ कहते हैं, वह भी उत्कृष्ट धर्म समझना चाहिए ॥३४॥ चातुर्विद्याऽविकल्पी च अङ्गविद्धर्मपाठकाः । त्रयश्चाश्रमिणो मुख्याः पर्षदेषा दशावरा ॥३५॥
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