पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८४ पाराशरस्मृतिः [ अष्टमो- जिस प्रकार निर्जन (सूना) ग्राम, जलरहित कूप तथा अग्नि के बिना होम व्यर्थ है उसी प्रकार मन्त्ररहित ब्राह्मण भी व्यर्थ ही है ॥२५॥ यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौरूषराऽफला । यथा चाऽज्ञेऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः ॥२६॥ जिस प्रकार स्त्रियों के लिए नपुंसक निष्फल है, बीज के लिए ऊसर भूमि निष्फल है तथा मूर्ख में दान निष्फल है, उसी प्रकार वेदरहित ब्राह्मण भी निष्फल है ॥२६॥ चित्रकर्म यथाऽनेकैरङ्गैरुन्मील्यते शनैः । ब्राह्मण्यमपि तद्वद्धि संस्कारैर्मन्त्रपूर्वकैः ॥२७॥ जिस प्रकार अनेक रंगों से निर्मित चित्रकर्म ( चित्रकारी ) उद्दीप्त होता है उसी प्रकार अनेक संस्कारों से ब्राह्मणत्व ( ब्राह्मणोचित गुण, कर्म तथा स्वभाव ) भी प्रस्फुटित होता है ॥२७॥ प्रायश्चित्तं प्रयच्छन्ति ये द्विजा नामधारकाः । ते द्विजाः पापकर्मणः समेता नरकं ययुः ॥२८॥ नाममात्र ( विद्या और तप से विहीन केवल योनिमात्र ) के ब्राह्मण जो भी प्रायश्चित्त की व्यवस्था देते हैं वे पापी कहे जाते हैं ! ऐसे सभी लोग नरक में गिरते हैं ॥२८॥ ये पठन्ति द्विजा वेदं पञ्चयज्ञरताश्च ये । त्रैलोक्यं तारयन्त्येते पञ्चेन्द्रियरता अपि ॥२९॥ जो ब्राह्मण वेदों का स्वाध्याय करते हैं और पञ्चयज्ञ करते हैं वे ज्ञानकर्मा पञ्चेन्द्रियों में रत होने पर भी तीनों लोकों को तारने में समर्थ होते हैं। २९॥ सम्प्रणीतः श्मशानेषु दीप्तोऽग्निः सर्वभक्षकः । तथा च वेदविद्विप्रः सर्वभक्षोऽपि दैवतम् ॥३०॥ १ 'तद्विद्धि' इति ।