पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४३ मुनीनामात्मविद्यानां द्विजानां यज्ञयाजिनाम् । वेदव्रतेषु स्नातानामेकाऽपि परिषद् भवेत् ॥२१॥ आत्मविद्या के जाननेवाले मुनि, यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण तथा वेदज्ञ स्नातक इनमें से किसी एक को भी 'परिषद्' कहते हैं ॥२१॥ पञ्च पूर्वं मया प्रोक्तास्तेषां चाऽसम्भवे त्रयः । स्ववृत्तिपरितुष्टा ये परिषत् सा प्रकीर्तिता ॥२२॥ मैंने पाँच प्रकार की परिषद् कही : १. उन्नीसवें श्लोक में, २. बीसवें श्लोक में तथा तीन प्रकार की इक्कीसवें श्लोक में। यदि पाँचों प्रकार की परिषद् असम्भव हो तो अपनी वृत्ति (सदाचार) से सन्तुष्ट रहने- वाले ब्राह्मणों को भी 'परिषद्' कहते हैं ॥२२॥ अत ऊर्ध्वं तु ये विप्राः केवलं नामधारकाः । परिषत्त्वं न १तेष्वस्ति सहस्रगुणितेष्वपि ॥२३॥ इसके अनन्तर जो श्रुत तथा तप से विहीन योनिमात्र से केवल नाममात्र के ब्राह्मण हैं उनके हजारगुना की संख्या से भी परिषद् नहीं होती ॥२३॥ यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । ब्राह्मणस्त्वनधीयानस्त्रयस्ते नामधारकाः ॥२४॥ जिस प्रकार काठ का हाथी एवं चमड़े का मृग नाम मात्र से हाथी और मृग है, उनमें हाथी और मृग के गुण तथा क्रिया नहीं होती उसी प्रकार अध्ययन से शून्य भी ब्राह्मण नाम मात्र का ब्राह्मण है ॥२४॥ ग्रामस्थानं यथा शून्यं यथा कूपस्तु निर्जलः । यथा हुतमनग्नौ च अमन्त्रो ब्राह्मणस्तथा ॥२५॥ ——————————————————————————————————————————— १. 'तेषां वै' इति । २. 'दन्ती' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal