पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 102, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ९० पाराशरस्मृतिः [ नवमो- दण्डादूर्ध्वं यदन्येन प्रहाराद् यदि पातयेत् । प्रायश्चित्तं तदा प्रोक्तं द्विगुणं गोवधे चरेत् ॥ २ ॥ हाथ के अँगूठे-जैसे मोटे दण्ड या लाठी आदि के आघात से गोवध हो जाने पर दुगुना प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥२॥ रोध-बन्धन-योक्त्राणि घातश्चेति चतुर्विधम् । एकपादं चरेद् रोधे द्वौ पादौ बन्धने चरेत् ॥ ३ ॥ किसी गाय को रोक रखने, बाँध लेने, जोतने और मारने से गोवध होता है। रोक लेने मात्र से ही यदि गाय की मृत्यु हो जाय तो चौथाई व्रत करने का विधान है और बन्धन के कारण होनेवाले गोवध में आधा व्रत करना उचित है ॥३॥ योक्त्रेषु तु त्रिपादं स्याच्चरेत् सर्वं निपातने । १गोव्राटे वा गृहे वाऽपि दुर्गे वाऽप्यसमस्थले ॥ ४ ॥ जोतने के समय गोवध होने से तीन चौथाई और मार डालने पर सम्पूर्ण रूप से प्रायश्चित्त करना चाहिए। गोशाला, घर, किला और असमतल भूमि, ॥४॥ नदीष्वथ समुद्रेषु त्वन्येषु च नदीमुखे । दग्धदेशे मृता गावः स्तम्भनाद्रोध उच्यते ॥ ५ ॥ नदी, समुद्र, नदियों के उद्गम स्थल या अग्नि से घिरे हुए स्थान में रोक लेने से गाय की मृत्यु हो जाय तो उसे 'रोध' की संज्ञा दी जाती है ॥५॥ योक्त्र-दामक-दोरैश्च कण्ठाभरण-भूषणैः । गृहे वाऽपि वने वाऽपि बद्धा स्याद् गौर्मृता यदि ॥६॥ हल जोतने की लकड़ी, गाड़ी के जुए, रस्सी, गले में पड़े हुए आभूषण अर्थात् कण्ठी, माला आदि से बँधी हुई गौ का मरण हो जाय १. 'गोचरे' इति पा० । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal