पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 170 में से
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९ध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९१ तो वह स्थान घर में हो या घर के बाहर वनादि में हो ॥६॥ तदेव बन्धनं विद्यात् कामाऽकामंकृतं च यत् । हले वा शकटे पंक्तौ पृष्ठे वा पीडितो नरैः ॥ ७ ॥ तो इसी को 'बन्धन' और 'कामाकामकृत' कहते हैं। हल, सग्गड़, गाड़ी और कतार में बँधे अथवा पीठ पर लदे हुए भार के कारण मनुष्य से पीड़ित होकर, ॥७॥ गोपतिर्मृत्युमाप्नोति योक्त्रो भवति तद्वधः । मत्तः प्रमत्त उन्मत्तश्चेतनो वाऽप्यचेतनः ॥ ८ ॥ बैल की मृत्यु हो जाय तो उस बन्धन को शास्त्रों में 'योक्त्र' कहा गया है। मत्त (धन से), प्रमत्त (सुरापान आदि से) और उन्मत्त (भूत-प्रेतादि की बाधा), यदि चेतन या अचेतन अवस्था में, ॥८॥ कामाऽकामकृतक्रोधो दण्डैर्हन्यादथोपलैः । प्रहृता वा मृता वाऽपि तद्धि हेतुर्निपातने ॥ ९ ॥ इच्छा अथवा अनिच्छापूर्वक, क्रोध के वशीभूत होकर, दण्डे या पत्थर से मार डाले तो इसी को 'निपातन' और वध करना कहते हैं ॥९॥ अङ्गुष्ठमात्रस्थूलस्तु बाहुमात्रः प्रमाणतः । आर्द्रस्तु स-पलाशश्च दण्ड इत्यभिधीयते ॥१०॥ अँगूठे के बराबर मोटी, हाथ के बराबर लम्बी, पत्तीदार गीली लकड़ी को 'दण्ड' कहते हैं ॥१०॥ मूर्च्छितः पतितो वाऽपि दण्डेनाऽभिहतः स तु । उत्थितस्तु यदा गच्छेत् पञ्च सप्त दशैव वा ॥११॥ दण्ड के प्रहार से आहत पशु मूर्च्छित हो जाय अथवा भूमि पर गिर पड़े या फिर से उठकर पाँच, सात या दस पग चल पड़े ॥११॥
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal