पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ९२ पराशरस्मृतिः [ नवमो- ग्रासं वा यदि गृह्णीयात्तोयं वाऽपि पिबेद् यदि । पूर्वं व्याध्युपसृष्टश्चेत् प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥१२॥ अथवा तृणादि का भक्षण कर ले या पानी पी ले और पहले से ही रोगग्रस्त हो तो उस पशु के मरने पर किसी प्रकार का प्रायश्चित्त नहीं करना पड़ता है ॥१२॥ पिण्डस्थे पादमेकं तु द्वौ पादौ गर्भसम्मते । पादोनं व्रतमुद्दिष्टं हत्वा गर्भमचेतनम् ॥१३॥ गाय का पन्द्रह दिन का गर्भपात हो जाने से सम्पूर्ण व्रत का चतुर्थांश, एक मास का गर्भ गिराने में आधा और सात मास से पूर्व का गर्भ गिराने पर तीन चौथाई व्रत करने का विधान है ॥१३॥ पादेऽङ्गरोमवपनं द्विपादे श्मश्रुणोऽपि च । त्रिपादे तु शिखावर्जं स-शिखं तु निपातने ॥१४॥ चौथाई व्रत करने में शरीर के रोम, अर्ध व्रत में रोम, मूँछ और दाढ़ी, तीन चौथाई में शिखा के अतिरिक्त सम्पूर्ण शरीर का मुण्डन और निपातन अर्थात् वध करने पर शिखा के सहित समस्त शरीर का मुण्डन कराना चाहिए ॥१४॥ पादे वस्त्रयुगं चैव द्विपादे कांस्यभाजनम् । त्रिपादे गोवृषं दद्याच्चतुर्थे गोद्वयं स्मृतम् ॥१५॥ चतुर्थांश व्रत करने पर ब्राह्मण को दक्षिणा-स्वरूप जोड़ा वस्त्र, आधा व्रत करने पर काँसे को धातु का निर्मित पात्र, तीन चौथाई व्रत में बैल और सम्पूर्ण व्रत में दो गौ का दान करना चाहिए ॥१५॥ निष्पन्नसर्वगात्रस्तु दृश्यते वा स-चेतनः । अङ्ग-प्रत्यङ्ग-सम्पूर्णो द्विगुणं गोव्रतं चरेत् ॥१६॥ जब गर्भस्थ पशु में प्राण का संचार हो गया हो और उसके सम्पूर्ण अंगों का गठन हो गया हो तो उस समय गौ का घात करने से दुगुनी गोहत्या का व्रत करना उचित है ॥१६॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal