पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९७ देवी का एक सौ आठ बार जप करने से मनुष्य के पाप का मोचन होता है ॥३५॥ प्रेरयन् कूप-वापीषु वृक्षच्छेदेषु पातयन् । गवाशनेषु विक्रीर्णस्ततः प्राप्नोति गोवधम् ॥३६॥ जब किसी कुएँ, तालाब और बड़े-बड़े वृक्ष काटने के स्थान में गाय को ले जाय अथवा किसी कसाई के हाथ उसे विक्रय कर दे तो गोवध करने का प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥३६॥ आराधितस्तु यः कश्चिद् भिन्नकक्षो यदा भवेत् । श्रवणं हृदयं भिन्नं भग्नो वा कूपसङ्कटे ॥३७॥ यत्नपूर्वक बलवान् बनाकर किसी बैल को दौड़ाने पर जब वह कक्षहीन हो जाय अथवा किसी कुएँ आदि में गिरने से उसके कान और हृदय विदीर्ण हो जायें, ॥३७॥ कूपादुत्क्रमणे चैव भग्नो वा ग्रीव-पादयोः । स एव म्रियते तत्र त्रीन् पादांस्तु समाचरेत् ॥३८॥ कुएँ से निकालने के समय यदि गरदन या पैर टूट जाय तो उस बैल के मरने पर तीन चौथाई प्राजापत्य नामक व्रत करने का विधान बतलाया गया है ॥३८॥ कूपखाते तटाबन्धे नदीबन्धे प्रपासु च । पानीयेषु विपन्नानां प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥३९॥ यदि कोई बैल पुराने कुएँ के गड्ढे, बाँध, पुल, पौसरे और पानी के गड्ढे में डूबकर मर जाय तो उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं करना पड़ता ॥३९॥ कूपखाते तटाखाते १दीर्घीखाते तथैव च । स्वल्पेषु धर्मखातेषु प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४०॥ १. 'दीर्घखाते' इति पा० । ७