पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ें११४ पाराशरस्मृतिः [ एकादशो- यदि मोहवश कोई ब्राह्मण उस जूठी पंक्ति में भोजन कर ही ले तो कृच्छ्र-सान्तपन व्रत करने से उसका प्रायश्चित्त दूर हो जाता है ॥९॥ पीयूषं श्वेत - लशुनं वृन्ताकफल - गृञ्जने । पलाण्डुं ¹वृक्षनिर्यास देवस्वं कवकानि च ॥१०॥ यदि कोई ब्राह्मण अपनी अज्ञानता के कारण तुरन्त की ब्यायी हुई गौ का दूध, सफेद लहसुन, सफेद रंग का बैगन, गाजर, प्याज, गोंद, देवसमर्पित वस्तु, कुकुरमुत्ता, ॥१०॥ उष्ट्रीक्षीरमविक्षीरमज्ञानाद् भुञ्जते² द्विजः³ । त्रिरात्रमुपवासेन पञ्चगव्येन शुद्धयति ॥११॥ ऊँटनी का दूध या भेड़ी का दूध पान कर ले तो उसे तीन दिन उपवास करके पंचगव्य पान करना आवश्यक है ॥११॥ मण्डूकं भक्षयित्वा तु मूषिकामांसमेव च । ज्ञात्वा विप्रस्त्वहोरात्रं यवकान्नेन शुद्धयति ॥१२॥ यदि कोई जान-बूझकर मेढक या चूहे का मांस भक्षण करे तो उसे शुद्धि के निमित्त एक दिन जव का बनाया हुआ भात खाना चाहिए ॥१२॥ क्षत्रियश्चाऽपि वैश्यश्च क्रियावन्तौ शुचिव्रतौ । तद्गृहे⁴ तु द्विजैर्भोज्यं हव्य-कव्येषु नित्यशः ॥१३॥ अपने धर्म में तत्पर सदाचारी क्षत्रिय या वैश्य के घर देवता या पितृ कार्य में आमन्त्रित ब्राह्मण को निःसंकोच भोजन करना चाहिए ॥१३॥ ⁵घृतं तैलं तथा क्षीरं गुडं स्नेहेन पाचितम् । १. 'वृक्षनिर्यासान्' 'पलाण्डुवृक्षनिर्यासान् देवस्वकवनानि च' इति च । २. 'पिबते' इति । ३. 'द्विजाः' इति । ४. 'तद्गृहेषु' इति । ५. 'घृतं क्षीरं तथा तैलं गूढं तैलेन पाचितम्' इत्यपि पाठः क्वचित्पुस्तके दृश्यते ।