पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११५ गत्वा नदीतटे विप्रो भुञ्जीयाच्छूद्रभोजनम्¹ ॥१४॥ ब्राह्मण को शूद्र के घर का दूध, गुड़, तेल तथा घृतनिर्मित पदार्थ किसी जलाशय या नदी के तट पर ले जाकर भक्षण करना चाहिए, परन्तु उसके घर में बैठकर भोजन नहीं करना चाहिए ॥१४॥ मद्य-मांसरतं नित्यं नीचकर्म-प्रवर्तकम् । तं शूद्रं वर्जयेद् विप्रःश्वपाकमिव दूरतः ॥१५॥ मद्य-मांस का क्रय-विक्रय या चर्मच्छेदन आदि निषिद्ध कर्म करने- वाले शूद्र का ब्राह्मण द्वारा परित्याग किया जाना चाहिए ॥१५॥ द्विज-शुश्रूषणरतान् मद्य-मांस-विवर्जितान् । स्वकर्मणि² रतान्नित्यं न ताँ³ञ्छूद्रान् त्यजेद् द्विजः ॥१६॥ विप्रसेवी, मद्य-मांस से रहित और अपने कर्म में निरत रहनेवाले शूद्र का ब्राह्मण को परित्याग नहीं करना चाहिए ॥१६॥ अज्ञानाद् भुञ्जते विप्राः सूतके मृतकेऽपि वा । प्रायश्चित्तं कथं⁴ तेषां वर्णे वर्णे विनिर्दिशेत् ॥१७॥ सूतक या मृतक के घर में अनजाने ही यदि कोई ब्राह्मण भोजन कर ले तो उस ब्राह्मण को विभिन्न वर्णों के घर में भोजन करने का अलग-अलग ढंग से प्रायश्चित्त करना पड़ता है ॥१७॥ गायत्र्यष्टसहस्रेण शुद्धिः स्याच्छूद्रसूतके । वैश्ये पञ्चसहस्रेण त्रिसहस्रेण क्षत्रिये ॥१८॥ सूतक में शूद्र के घर भोजन करने से आठ हजार, वैश्य के घर भोजन करने से पाँच हजार और क्षत्रिय के घर भोजन करने पर तीन हजार गायत्री मन्त्र जप करने से उस ब्राह्मण का दोष दूर हो जाता है ॥१८॥ १. 'च्छूद्रभाजने' इति । 'स्वकर्मनिरतान्नित्यं' इति । ३. 'तान् शूद्रान्' इति । ४. 'तत्र' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal