भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११७ शूद्रकन्यासमुत्पन्नो ब्राह्मणेन तु संस्कृतः । असंस्काराद् भवेद्दासः संस्कारादेव नापितः ॥२३॥ ब्राह्मण द्वारा शूद्र कन्या से उत्पन्न सन्तान का संस्कार कर देने से वह 'नापित' हो जाता है, और संस्कार-विहीन सन्तान 'दास' कहलाता है ॥२३॥ क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां समुत्पन्नस्तु यः सुतः । स गोपाल इति ख्यातो भोज्यो विप्रैर्न संशयः ॥२४॥ क्षत्रिय द्वारा शूद्र कन्या से उत्पन्न सन्तान को 'गोपाल' कहते हैं। ऐसे व्यक्ति का अन्न ब्राह्मण को भक्षण करना उचित है ॥२४॥ वैश्यकन्यासमुद्भूतो ब्राह्मणेन तु संस्कृतः । १सो हर्धाद्धिक इति ज्ञेयो भोज्यो विप्रैर्न संशयः ॥२५॥ ब्राह्मण द्वारा वैश्य कन्या में उत्पन्न सन्तान का संस्कार कर देने से वह सन्तान 'अर्धसोरी' कहलाता है। ऐसे मनुष्य का अन्न ब्राह्मणों के लिए ग्राह्य है ॥२५॥ भाण्डस्थितमभोज्येषु जलं दधि घृतं पयः । अकामतस्तु यो भुङ्क्ते प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ॥२६॥ अग्रा‍ह्यों के पात्र में रखे हुए जल, दही, घी या दूध को जो अनजाने में ही ग्रहण कर ले, तो उसका प्रायश्चित्त किस प्रकार से हो सकता है ? ॥२६॥ ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा उपसर्पति । ब्रह्मकूर्चोपवासेन ३योज्या वर्णस्य निष्कृतिः ॥२७॥ १. 'संस्कृतस्तु भवेद्दासो ह्यसंस्कारैस्तु नापितः' इति । 'संस्कारात्तु भवेद्दासः असंस्काराच्च नापितः' इति च पाठा० । २. 'सोत्यर्द्धिक' इति । ३. 'याज्यवर्णस्य' इति ।