पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११७ शूद्रकन्यासमुत्पन्नो ब्राह्मणेन तु संस्कृतः । असंस्काराद् भवेद्दासः संस्कारादेव नापितः ॥२३॥ ब्राह्मण द्वारा शूद्र कन्या से उत्पन्न सन्तान का संस्कार कर देने से वह 'नापित' हो जाता है, और संस्कार-विहीन सन्तान 'दास' कहलाता है ॥२३॥ क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां समुत्पन्नस्तु यः सुतः । स गोपाल इति ख्यातो भोज्यो विप्रैर्न संशयः ॥२४॥ क्षत्रिय द्वारा शूद्र कन्या से उत्पन्न सन्तान को 'गोपाल' कहते हैं। ऐसे व्यक्ति का अन्न ब्राह्मण को भक्षण करना उचित है ॥२४॥ वैश्यकन्यासमुद्भूतो ब्राह्मणेन तु संस्कृतः । १सो हर्धाद्धिक इति ज्ञेयो भोज्यो विप्रैर्न संशयः ॥२५॥ ब्राह्मण द्वारा वैश्य कन्या में उत्पन्न सन्तान का संस्कार कर देने से वह सन्तान 'अर्धसोरी' कहलाता है। ऐसे मनुष्य का अन्न ब्राह्मणों के लिए ग्राह्य है ॥२५॥ भाण्डस्थितमभोज्येषु जलं दधि घृतं पयः । अकामतस्तु यो भुङ्क्ते प्रायश्चित्तं कथं भवेत् ? ॥२६॥ अग्राह्यों के पात्र में रखे हुए जल, दही, घी या दूध को जो अनजाने में ही ग्रहण कर ले, तो उसका प्रायश्चित्त किस प्रकार से हो सकता है ? ॥२६॥ ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा उपसर्पति । ब्रह्मकूर्चोपवासेन ३योज्या वर्णस्य निष्कृतिः ॥२७॥ १. 'संस्कृतस्तु भवेद्दासो ह्यसंस्कारैस्तु नापितः' इति । 'संस्कारात्तु भवेद्दासः असंस्काराच्च नापितः' इति च पाठा० । २. 'सोत्यर्द्धिक' इति । ३. 'याज्यवर्णस्य' इति ।
११४ पराशरस्मृतिः [ एकादशो- चारों वर्णों में से सभी लोगों की शुद्धि ब्रह्मकूर्च के पान और उपवास करने से हो जाती है ॥२७॥ शूद्राणां नोपवासः स्याच्छूद्रो दानेन शुद्धयति । ब्रह्मकूर्चमहोरात्रं श्वपाकमपि शोधयेत् ॥२८॥ शूद्रों को उपवास करने का आदेश नहीं दिया गया है । शूद्र केवल दान करने से ही शुद्ध हो जाता है । ब्रह्मकूर्च पान करके रात-दिन रह जाने से चाण्डाल भी शुद्ध हो जाता है ॥२८॥ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । निर्दिष्टं पञ्चगव्यं तु१ पवित्रं पापशोधनम् ॥२९॥ पंचगव्य बनाने के लिए गाय का गोबर, गोमूत्र, दूध, दही, घी और कुश के जल का मिश्रण किया जाता है । इसका मिश्रण समस्त पापों का नाशक और अत्यन्त पवित्र कहा गया है ॥२९॥ गोमूत्रं कृष्णवर्णायाः श्वेतायाश्चैव गोमयम् । पयश्च ताम्रवर्णाया रक्ताया गृह्यते दधि ॥३०॥ काली गाय का मूत्र, सफेद गाय का गोबर, ताम्रवर्णी गौ का दूध और लाल रंग की गाय का दही, ॥३०॥ कपिलायाः घृतं ग्राह्य सर्वं कौपिलमेव२ वा । मूत्रमेकपलं दद्यादङ्गुष्ठार्द्धं तु गोमयम् ॥३१॥ कपिला गाय का घृत अथवा उपर्युक्त वर्णित सभी वस्तुएँ कपिला गाय का ही हो । गोमूत्र ४ तोला, आधे अँगूठे के बराबर गोबर, ॥३१॥ क्षीरं सप्तपलं दद्याद् दधि त्रिपलमुच्यते । घृतमेकपलं दद्यात् पलमेकं कुशोदकम् ॥३२॥ दूध २८ तोले, दही १२ तोले, घी ४ तोले और कुशा का जल ४ तोले लेना चाहिए । ३२॥
१. 'च' इति । २. 'कपिल' इति ।
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११९ 'गायत्र्याऽऽदाय गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम् । आँप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णस्तथा दधि ॥३३॥ गोमूत्र ग्रहण के समय 'ॐ भूर्भुवः स्वः०' गायत्रीमंत्र का पाठ, 'गन्धद्वारां०' मन्त्र से गोबर, 'आप्यायस्व०' मन्त्र से दूध और 'दधि- क्रा०णो०' मन्त्र से दही ग्रहण करना चाहिए ॥३३॥ तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम् । पञ्चगव्यमृचा पूतं स्थापयेदग्निसन्निधौ । ३४॥ 'तेजोऽसि शुक्रम्०' मन्त्र से घृत और 'देवस्य त्वा०' मन्त्र से कुशोदक ग्रहण करे। उक्त ऋचाओं से शुद्ध किया हुआ पंचगव्य अग्नि के समक्ष स्थापित करना चाहिए ॥३४॥ आँपो हिष्ठेति चाऽलोड्य मा नस्तोकेति मन्थयेत् । सप्त वारांस्तु ये दर्भा अच्छिन्नाग्राः शुकत्विषः ॥३५॥ 'आपो हिष्ठा०' मन्त्र द्वारा उसे हिलोदना और 'मा नस्तोके०' मन्त्र से मंथन किया जाना चाहिए। इसके पश्चात् सात बार अर्थात् १. ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ २. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ३. आप्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य सङ्गथे ॥ — ऋ० मं० ९, सूक्त ३१, मन्त्र० ४ ४. दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभि नो मुखा करतप्राण आयूंषि तारिषत् ॥ —ऋ० ४,३९,६ ५. तेजोऽसि शुक्रममृतमायुष्पा आयुर्मे पाहि । ६. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामाददे ॥ —शु० य० सं०, अ० २२, म० १ ७. आपो हिष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे ॥ ऋ. १०,९,१ ८. मा नस्तोके तनये मा न आयौ मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । वीरान्मा नो रुद्रभामितो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥—ऋ. १,११४,८ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
१२° पराशरस्मृतिः [ एकादशो- सात अपराधों के निवारक ऐसे कुशों को ग्रहण करें जिनके आगे का भाग कटा-फटा न हो और उनका रंग बिलकुल हरा हो ॥३५॥ एतैरुद्धृत्य होतव्यं पञ्चगव्यं यथाविधि । १'इरावती' २‘इदं विष्णुर्मानस्तोके’३ति४ ५'शंवती ॥३६॥ उपर्युक्त प्रकार की कुशाओं द्वारा पंचगव्य उठाकर विधिपूर्वक हवन करना चाहिए । हवन की ऋचाएं 'इरावती०', 'इदं विष्णु०', 'मानस्तोके०' और 'शंवतीः०' हैं ॥३६। एताभिश्चैव होतव्यं हुतशेषं पिवेद् द्विजः । आलोड्य प्रणवेनैव निर्मन्ध्य प्रणवेन तु ॥३७॥ इन्हीं से हवन करना चाहिए । हवन करने के बाद जो कुछ शेष रह जाय उसे पान करना चाहिए । ब्राह्मण को पान के पूर्व प्रणव पाठ द्वारा उसका आलोडन और मंथन करना उचित है ॥३७॥ उद्धृत्य प्रणवेनैव पिवेच्च प्रणवेन तु । यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम् ॥३८॥ प्रणव से निकालकर प्रणव द्वारा ही पान करे । मनुष्य की हड्डी और चमड़े में जो कुछ भी पाप समाविष्ट रहता है । ३८॥ ६ब्रह्मकूर्चो दहेत् सर्वं ७प्रदीप्ताग्निरिवेन्धनम् । पवित्रं त्रिषु लोकेषु देवताभिरधिष्ठितम् ॥३९॥ १. इरावती धेनुमती हि भूतं सूयवसिनी मनुषे दशस्या । व्यस्तम्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः ॥ - ऋ० ७,९९,३ २. इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेदा नि दधे पदम् । समूळहमस्य पांसुरे ।-ऋ० १,२२,१७ ३. 'मानस्तोके'—ऋ० १,११४,८ । ४. 'च' इति । ५. शंवतीः पारयन्त्येते तं पृच्छन्ति वचो यया । अभ्यारन्तं यमकेतं य एवेदमिति ब्रवत् । —ऋ० परिशिष्टम् ६. 'ब्रह्मकूर्चं' इति । ७. 'यथैवाग्निरिवेन्धनम्' इति ।
उसे यह ब्रह्मकूर्च सम्पूर्ण रूप से भस्मसात् कर देता है जिस प्रकार धधकती हुई अग्नि ईंधन को जला डालती है। यह त्रैलोक्य में अत्यन्त पुनीत होने के साथ ही साथ देवताओं का निवासस्थल भी है ॥३९॥ वरुणश्च व गोमूत्रे गोमये हव्यवाहनः । दध्नि वायुः समुद्दिष्टः सोमः क्षीरे घृते रविः ॥४०॥ गोमूत्र में वरुण, गोबर में अग्नि, दही में वायु, दूध में चन्द्रमा और घी में सूर्य का निवास माना गया है ॥४०॥ पिबतः पतितं तोयं भोजने मुखनिःसृतम् । अपेयं तद् विजानीयात् पीत्वो चान्द्रायणं चरेत् ॥४१॥ पानी पीने के समय गिरा हुआ पानी या भोजन के समय मुँह से गिरा हुआ अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। यदि ग्रहण ही कर ले तो उसकी शुद्धि के लिए चान्द्रायण व्रत करना चाहिए ॥४१॥ कूपे च पतितं दृष्ट्वा श्व-शृगालौ च मर्कटम् । अस्थि-चर्मादि पतितं पीत्वाऽमेध्या अपो द्विजः ॥४२॥ किसी कूप में यदि कुत्ते, गीदड़, बन्दर की हड्डी या चमड़ा गिरा हुआ दिखाई दे और उस जल को ब्राह्मण पी जाय तो उसे वर्णित प्रकार का प्रायश्चित्त करना उचित है ॥४२॥ नारं तु कुणपं काकं २विड्वराह-खरोष्ट्रकम् । गावयं सौप्रतीकं च मायूरं खड्गकं तथा ॥४३॥ मनुष्य, कौवे, ग्राम-शूकर, गधे, ऊँट, शवर (नील गाय), सुप्रतीक (हाथी), मोर, गैंडा, ॥४३॥ वैयाघ्रमार्क्षं साहं वा कूपे यदि निमज्जति । तडागस्याऽथ दुष्टस्य पीतं स्यादुदकं यदि ॥४४॥ १. 'भुक्त्वा' इति । २. 'विड्वराहं' इति ।
१२२ पराशरस्मृतिः [ एकादशो- व्याघ्र, भालू, सिंह आदि किसी कुएँ या तालाब में गिरकर मर गये हों तो उस दूषित जल को पीने से, ॥४४॥ प्रायश्चित्तं भवेत् पुंसः क्रमेणैतेन सर्वशः । विप्रः शुद्ध्येत् त्रिरात्रेण क्षत्रियस्तु दिनद्वयात् ॥४५॥ ब्राह्मण को तीन दिन और क्षत्रिय को दो दिन तक उपवास करना चाहिए ॥४५॥ एकाहेन तु वैश्यस्तु शूद्रो नक्तेन शुद्ध्यति । परपाकनिवृत्तस्य परपाकरतस्य च ॥४६॥ वैश्य एक दिनके उपवास तथा शूद्र रात्रिमें भोजन करने से ही शुद्धता को प्राप्त हो जाता है। परपाकनिवृत्त और परपाकरत, ।४६॥ अपचस्य च भुक्त्वाऽन्नं द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् । अपचस्य च यद्दानं दातुश्चाऽस्य कुतः फलम् ? ॥४७॥ तथा अपच का अन्न यदि कोई ब्राह्मण ग्रहण करे तो उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिए। अपच को दान करने का कुछ भी फल नहीं होता ॥४७॥ दाता प्रतिग्रहीता च तौ द्वौ निरयगामिनौ । गृहीत्वाऽग्निं समारोप्य पञ्चयज्ञान् निर्वपेत् ॥४८॥ दान देने और ग्रहण करनेवाले दोनों ही नरकगामी होते हैं। जो कोई अग्नि का समारोपण करके भी पंचयज्ञों को नहीं करता ॥४८॥ परपाकनिवृत्तोऽसौ मुनिभिः परिकीर्तितः । पञ्चयज्ञान् स्वयं कृत्वा परान्नेनोपजीवति ॥४९॥ उसे मुनियों ने 'परपाकनिवृत्त' की संज्ञा दी है। जो स्वयं पंचयज्ञों को करके भी किसी दूसरे के अन्न पर निर्भर रहता है ॥४९॥ सततं प्रातरुत्थाय परपाकतस्तु सः । १. 'तु' इति ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १२३ गृहस्थधर्मो यो विप्रो ददाति परिवर्जितः ॥५०॥ वह प्रातः उठने के बाद सदैव 'परपाक-रत' कहा जाता है। गृहस्थाश्रम में रहनेवाला जो ब्राह्मण दान नहीं करता ॥५०॥ ऋषिभिर्धर्मतत्त्वज्ञैरपचः परिकीर्तितः । युगे युगे तु ये धर्मास्तेषु तेषु च ये द्विजाः ॥५१॥ उस ब्राह्मण को धर्मवेत्ता ऋषियों ने 'अपच' के नाम से घोषित किया है । अन्य युग के जो धर्म हैं और उन युगों के जो ब्राह्मण हैं ॥५१॥ तेषां निन्दा न कर्त्तव्या युगरूपा हि ते द्विजाः । हुङ्कारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वङ्कारं च गरीयसः ॥५२॥ उनकी निन्दा कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वे विप्र युग के प्रतीक हैं। यदि किसी ब्राह्मण को 'हुंकार' और अपने से बड़े लोगों को 'तुकार' शब्द से सम्बोधित करे तो वह ॥५२॥ स्नात्वा तिष्ठन्नहःशेषमभिवाद्य प्रसाद्येत् । ताडयित्वा तृणेनापि कण्ठे बध्वाऽपि वाससा ॥५३॥ दिन के शेष होने तक स्नान करके बैठा रहे और रुष्ट हुए को नमस्कार के द्वारा प्रसन्न करने की चेष्टा करे। तिनके से आघात करने, गले में वस्त्र द्वारा बाँधने ॥५३॥ विवादेनापि निर्जित्य प्रणिपत्य प्रसाद्येत् । अवगूर्य त्वहोरात्रं त्रिरात्रं क्षितिपातने ॥५४॥ या वाद-विवाद में परास्त कर ले तो उन्हें प्रणाम करके प्रसन्न करे। यदि ब्राह्मण को मारने के उद्देश्य से दण्ड उठाये तो एक दिन, भूमि पर धराशायी कर देने पर तीन दिन, ॥५४॥ अतिकृच्छ्रं च रुधिरे कृच्छ्रोऽभ्यन्तरशोणिते । १. 'अवगृह्य' इति ।
[Page Header] १२४ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो-
नवाहमतिकृच्छ्री स्यात् पाणिपूरान्नभोजनः ॥५५॥ प्रहार के द्वारा रक्तपात होने पर अतिकृच्छ्र और चमड़े के अन्दर रक्त जम जाने पर कृच्छ्र व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए । एक मुट्ठी अन्न के द्वारा नव दिन तक व्यतीत करना चाहिए ॥ ५५ ॥ त्रिरात्रमुपवासी स्यादतिकृच्छ्रः स उच्यते । सर्वेषामेव पापानां सङ्करे समुपस्थिते ॥५६॥ इसके पश्चात् तीन दिन तक उपवास करने से कृच्छ्र नामक व्रत पूरा होता है । जब समस्त प्रकार के पापों का एक साथ समन्वय हो जाय तब ॥ ५६ ॥ दशसाहस्रमभ्यस्ता गायत्रीशोधनं परम् ॥५७॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ दस हजार गायत्री मन्त्र का पाठ करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है ॥ ५७ ॥ इस प्रकार 'शिवदत्तो' भाषा टीका में पाराशरीय धर्मशास्त्र में ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ॥ ११ ॥
१२. द्वादशोऽध्यायः दुःस्वप्नं यदि पश्येद् वा वान्ते वा क्षुरकर्मणि । मैथुने प्रेतधूमे³ च स्नानमेव विधीयते ॥ १ ॥ किसी प्रकार का खराब स्वप्न देखने, वमन करने, क्षौर-कर्म कराने, मैथुन करने या प्रेतधूम (श्मशान आदि स्थानों का धुआँ) लगने पर स्नान मात्र से ही शुद्धि हो जाती है ॥ १ ॥ १. 'त्रिरात्रमुपवासः' इति । २. 'पश्येत्तु' इति । ३. 'धूम्र' इति ।
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १२५ अज्ञानात् प्राश्य विण्मूत्रं १सुरासंसृष्टमेव च । पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥ २ ॥ अज्ञान के कारण मल-मूत्र या मद्य-मिश्रित पदार्थ आदि खा-पी लेने पर, तीनों वर्णों को पुनः अपना संस्कार करना चाहिए ॥ २ ॥ अजिनं मेखला दण्डो भैक्ष्यचर्या व्रतानि च । निवर्तन्ते द्विजातीनां पुनः संस्कारकर्मणि ॥ ३ ॥ जब विप्रों का पुनः संस्कार किया जाता है तब मृगचर्म, मेखला, दण्ड आदि धारण नहीं करना पड़ता । इसके अतिरिक्त भैक्ष्यचर्या ( भिक्षाचरण ) और व्रतादि कर्म भी नहीं करने पड़ते ॥ ३ ॥ विण्मूत्रभोजो शुद्धयर्थं प्राजापत्यं समाचरेत् । पञ्चगव्यं च कुर्वीत स्नात्वा पीत्वा शुचिर्भवेत् ॥ ४ ॥ मल-मूत्रभक्षी के लिए प्राजापत्य व्रत का विधान है । स्नान के पश्चात् पंचगव्य का पान करने से शुद्धि मिलती है ॥ ४ ॥ जलाऽग्निपतने चैव प्रव्रज्याऽनाशकेषु च । वृथावासितवर्णानां कथं शुद्धिविधीयते ? ॥ ५ ॥ मनुष्य के जल में डूबने, आग में जलने, संन्यास ग्रहण करने, पहाड़ से गिरने, अनशन व्रत करने या आत्महत्या का प्रयास करके बचे रहने पर चारों वर्णों के लोगों की शुद्धि किस प्रकार हो सकती है ? ॥ ५ ॥ प्राजापत्यद्वयेनैव तीर्थाभिगमनेन च । वृषैकादशदानेन वर्णाः शुद्ध्यन्ति ते त्रयः ॥ ६ ॥ दो प्राजापत्य व्रत करके किसी तीर्थस्थान में स्नान करके दस गौ और एक बैल का दान करने से तीनों वर्णों की शुद्धि हो जाती है ॥ ६॥ ब्राह्मणस्य प्रवक्ष्यामि वनं गत्वा चतुष्पथे । १. 'सुरां वा पिवते यदि' इति । २. 'विण्मूत्रस्य च' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
१२६ पराशरस्मृतिः [ द्वादशो- स-शिखं वपनं कृत्वा प्राजापत्यद्वयं चरेत् ॥ ७ ॥ वन में स्थित चौराहे के बीच बैठकर शिखा सहित मुण्डन और दो प्राजापत्य करने से ब्राह्मण की शुद्धि होती है ॥ ७ ॥ गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् । मुच्यते तेन पापेन ब्राह्मणत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥ इसके अतिरिक्त दक्षिणा में दो गायों का दान करना चाहिए । ऐसा महर्षि पाराशर का आदेश है । फिर उक्त पाप से रहित होकर ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व को पा लेता है ॥ ८ ॥ स्नानादि पञ्च पुण्यानि कीर्तितानि मनीषिभिः । आग्नेयं वारुणं ब्राह्मं वायव्यं दिव्यमेव च ॥ ९ ॥ आग्नेय, वारुण, ब्राह्म, वायव्य और दिव्य—इन पाँच प्रकार के स्नानों को पण्डितों ने पुनीत (पवित्र) कहा है ॥ ९ ॥ आग्नेयं भस्मना स्नानमवगाह्य तु वारुणम् । 'आपो हिष्ठे'ति च ब्राह्मं वायव्यं गोरजः स्मृतम् ॥१०॥ सम्पूर्ण शरीर में भस्म लेपन 'आग्नेय' स्नान, जल में नहाना 'वारुण' स्नान, 'आपो हिष्ठा-' मन्त्र द्वारा मार्जन करने से 'ब्राह्म' स्नान, गाय के रज से 'वायव्य' स्नान होता है ॥ १० ॥ यत्तु सातपवर्षेण ३तत्स्नानं दिव्यमुच्यते । तत्र स्नात्वा तु गङ्गायां स्नातो भवति मानवः ॥११॥ जब धूप निकलने के साथ ही साथ कुछ बारिश भी हो रही हो तो उसमें नहाने से 'दिव्य' स्नान होता है । उसमें नहाने से मनुष्य को गंगा-स्नान करने का फल मिलता है ॥ ११ ॥ स्नातुं यान्तं द्विजं सर्वे देवाः पितृगणैः सह । १. 'स्वायम्भुवोऽब्रवीत्' इति । २. 'आपो हिष्ठा०'-ऋ० १०,९,१ । ३. स्नानं तद्दिव्यमुच्यते' इत्यपि पाठः ।
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १२७ वायुभूतास्तु गच्छन्ति तृषार्त्ताः सलिलार्थिनः ॥१२॥ जब ब्राह्मण लोग स्नान के लिए जाते हैं तो उनके पीछे-पीछे सभी देवता, पितर आदि वायु के रूप में अपनी तृषा-शान्ति के लिए चलते हैं ॥ १२ ॥ निराशास्ते निवर्त्तन्ते वस्त्रनिष्पीडने कृते । तस्मान्न पीडयेद् वस्त्रमकृत्वा पितृतर्पणम् ॥१३॥ स्नान के बाद वस्त्र निचोड़ने पर देव-पितृगणों की आशा निराशा में परिणत हो जाती है । इसलिए जब तक पितृतर्पण न कर ले तब तक गीले वस्त्र को निचोड़ना नहीं चाहिए ॥ १३ ॥ रोमकूपेष्ववस्थाप्य यस्तिलैस्तर्पयेत् पितॄन् । तर्पितास्तेन ते सर्वे रुधिरेण मलेन च ॥१४॥ जो मनुष्य अपने रोमकूपों पर तिल रखकर पितरों का तर्पण करता है तो ऐसा तर्पण रक्त और मल द्वारा किया जानेवाला तर्पण समझा जाता है ॥ १४ ॥ अवधूनोति च यः केशान् स्नात्वा प्रस्रवते द्विजः । आचामेद् वा जलस्थोऽपि स बाह्यः पितृ-दैवतैः ॥१५॥ स्नान के बाद अपने केशों को झटकारने, गीले कपड़े पहनकर लघुशंका करने और सूखे कपड़े से जल में खड़ा होकर आचमन करने- वाला ब्राह्मण देव-पितृ के कार्य के लिए अयोग्य होता है ॥ १५ ॥ शिरः प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छ-शिखोऽपि वा । विना यज्ञोपवीतेन आचान्तोऽप्यशुचिर्भवेत् ॥१६॥ शिर या गले में कपड़ा लपेट, धोती, लाँग या शिखा को खोल या यज्ञोपवीत से रहित होकर आचमन करने पर भी उस ब्राह्मण को शुद्धि नहीं मिलती ॥ १६ ॥ १. 'यस्तूतसृजेन्मलम्' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
१२४ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो- जले स्थलस्थो नाऽऽचामेज्जलस्थश्च१ बहिःस्थले । उभे स्पृष्ट्वा समाचामेदुभयत्र शुचिर्भवेत् ॥१७॥ स्थल पर खड़े होकर जल में और जल में खड़े होकर स्थल पर- आचमन नहीं करना चाहिए । एक पैर जल में और दूसरा स्थल पर रखकर आचमन करने से वह आचमन शुद्ध माना जाता है ॥ १७ ॥ स्नात्वा पीत्वा क्षुते सुप्ते भुक्त्वा रथ्योपसर्पणे । आचान्तः पुनराचामेद् वासो विपरिधाय च ॥१८॥ स्नान, जलपान, भोजन, शयन और मार्ग में भ्रमण तथा वस्त्र धारण के बाद दो बार आचमन करना चाहिए । इसी तरह ॥ १८ ॥ क्षुते निष्ठीवने चैव दन्तोच्छिष्टे तथाऽनृते । पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत् ॥१९॥ छींकने, थूकने, दाँतों में अन्न का कण रहने, मिथ्या भाषण करने और पतितों के साथ वार्तालाप करने के बाद दाहिने कान का स्पर्श करना चाहिए ॥ १९ ॥ भास्करस्य करैः पूतं दिवा स्नानं प्रशस्यते । अप्रशस्तं निशि स्नानं राहोरन्यत्र दर्शनात् ॥२०॥ दिन में किया जानेवाला स्नान उत्तम माना गया है, क्योंकि सूर्य की रश्मियों द्वारा वह जल पवित्र किया गया होता है । ग्रहण के अतिरिक्त रात्रि में स्नान करने का निषेध किया गया है ॥ २० ॥ मरुतो वसवो रुद्रा आदित्याश्चाऽथ देवताः । सर्वे सोमे प्रलीयन्ते तस्माद् दानं तु संग्रहे ॥२१॥ मरुत्, वसु, रुद्र, आदित्य और समस्त देवता चन्द्रमा में मिल जाते हैं । इसीलिए ग्रहण के समय सभी देवताओं की रक्षा के निमित्त दान करने का माहात्म्य बतलाया गया है ॥ २१ ॥ १. 'श्चेद्' इति ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १२९ खलयज्ञे विवाहे च संक्रान्तौ ग्रहणे तथा । सर्व्वयां दानमस्त्येव नाऽन्यत्रैवं १ विधीयते ॥२२॥ खलिहान, विवाह, संक्रान्ति और ग्रहण काल में ही दान किया जाना उचित है अन्यथा रात्रिकालीन दान वर्जित है ॥२२॥ पुत्रजन्मनि यज्ञे च तथा चाऽत्ययकर्मणि । राहोश्च दर्शने दानं प्रशस्तं नाऽन्यदा निशि ॥२३॥ पुत्रोत्पत्ति, यज्ञ, मरण और ग्रहण के समय रात्रि में किया जाने- वाला दान फलदायक कहा है । इसके अतिरिक्त और किसी भी समय रात्रि में दान नहीं करना चाहिए ॥२३॥ महानिशा तु विज्ञेया मध्यस्थं प्रहरद्वयम् । प्रदोष-पश्चिमौ यामौ दिनवत् स्नानमाचरेत् ॥२४॥ रात्रि के मध्यकाल में दो पहर का समय महानिशा होती है और सन्ध्या के पहले तथा पिछले प्रहर की रात में दिन के समान ही स्नान किया जा सकता है ॥२४॥ चैत्यवृक्षश्चितियू २ पश्चाण्डालः सोमविक्रयी । एतांस्तु ब्राह्मणः स्पृष्ट्वा सवासा जलमाविशेत् ॥२५॥ श्मशान के वृक्ष, श्मशान का खम्भा, चाण्डाल या सोमलता के विक्रेता का यदि कोई ब्राह्मण स्पर्श कर ले तो उसे विवस्त्र (वस्त्र-सहित) होकर जल में स्नान करना चाहिए ॥२५॥ अस्थिसञ्चयनात् पूर्व्वं रुदित्वा स्नानमाचरेत् । अन्तर्दशाहे विप्रस्य ह्यूर्ध्वमाचमनं स्मृतम् ॥२६॥ अस्थिसंचय (मरने के पश्चात् चार दिन) के पूर्व रुदन करनेवाला ब्राह्मण स्नान के द्वारा शुद्ध हो जाता है । और यदि दस दिन के अन्दर रुदन करे तो आचमन से ही शुद्धि मिल जाती है ॥२६॥ १. ‘तु’ इति । २. ‘पूयश्चण्डालः’ इति । ९
१३० पराशरस्मृतिः [ द्वादशो- सर्वं गङ्गासमं तोयं राहुग्रस्ते दिवाकरे । सोमग्रस्ते तथैवोक्तं स्नान-दानादि कर्मसु ॥२७॥ सूर्य या चन्द्रग्रहण के समय दानादि के रूप में मिलनेवाला पदार्थ गङ्गाजल के समान फलदायी होता है ॥२७॥ कुशैः पूतं भवेत् स्नानं कुशेनोपस्पृशेद् द्विजः । कुशेन चोद्धृतं तोयं सोमपानसमं भवेत् ॥२८॥ कुश के द्वारा किया जानेवाला स्नान पवित्र होता है। ब्राह्मण को कुश लेकर ही आचमन करना चाहिए। कुश के साथ जो जल उठाया जाता है, वह जल सोमपान के सदृश अत्यन्त पुनीत होता है ॥२८॥ अग्निकार्यात् परिभ्रष्टाः सन्ध्योपासनवर्जिताः । वेदं चौवाऽनधीयानाः सर्वे ते वृषलाः स्मृताः ॥२९॥ अग्निहोत्र से च्युत, सन्ध्या-वन्दन से रहित और वेदपाठ से विमुख होनेवाला ब्राह्मण शूद्र के समान कहा गया है ॥२९॥ तस्माद् वृषलभीतेन ब्राह्मणेन विशेषतः । अध्येतव्योऽप्येकदेशो यदि सर्वं न शक्यते ॥३०॥ इसलिए ब्राह्मण को चाहिए कि यदि वेद का सम्पूर्ण भाग न पढ़ सके तो उसके एक भाग का ही पाठ कर ले ॥३०॥ शूद्रान्न-रस-पुष्टस्याऽप्यधीयानस्य^१ नित्यशः । जपतो जुह्वतो वाऽपि गतिरूर्ध्वा न विद्यते ॥३१॥ शूद्र के अन्न और रस से पलनेवाले वेदाध्ययन, जप और हवन के द्वारा भी सद्गति प्राप्त नहीं कर सकते ॥३१॥ शूद्रान्नं शूद्रसम्पर्कः शूद्रेण तु सहासनम् । शूद्राज्ज्ञानाऽऽगमश्चैव^२ ज्वलन्तमपि पातयेत् ॥३२॥ अग्नि के समान तेजस्वी ब्राह्मण भी शूद्र का अन्न ग्रहण करते, १. 'धीयमानस्य' इति । २. '-श्चापि' इति ।
ऽध्याय ] भाषाटीकासहिता १३१ उनके साथ मेल-जोल बढ़ाने, उठने-बैठने और उनके उपदेश को सुनने से पतित हो जाते हैं ॥३२॥ यः शूद्रया पाचयेन्नित्यं शूद्री च गृहमेधिनी । वर्जितः पितृ-देवेभ्यो रौरवं याति स द्विजः ॥३३॥ जिस ब्राह्मण को रसोई शूद्र जाति की स्त्री बनाती है, ब्राह्मण की पत्नी बनकर घर में रहती है तथा जो ब्राह्मण देव-पितृ कार्य से पराङ्मुख है, उस ब्राह्मण को रौरव नरक में वास करना पड़ता है ॥३३॥ मृत-सूतक-पुष्टाङ्गो द्विज शूद्रान्नभोजनः । अहं तन्न विजानामि कां कां योनिं गमिष्यति ? ॥३४॥ सूतक लगने के कारण अशौचप्राप्त व्यक्ति का अन्न खाने तथा शूद्र का भोजन ग्रहण करनेवाले ब्राह्मण को किन-किन योनियों में भ्रमण करना पड़ेगा, इस बात को हम नहीं बतला सकते ॥३४॥ गृध्रो द्वादश जन्मानि दश जन्मानि शूकरः । श्वयोनौ सप्त जन्मानि इत्येवं मनुरब्रवीत् ॥३५॥ मनु ने कहा है कि ऐसा ब्राह्मण बारह जन्म तक गीध, दस जन्म तक सूअर और सात जन्म तक कुत्ते की योनि में रहता है ॥३५॥ दक्षिणार्थं तु यो विप्रः शूद्रस्य जुहुयाद् हविः । ब्राह्मणस्तु भवेच्छूद्रः शूद्रस्तु ब्राह्मणो भवेत् ॥३६॥ शूद्र के यज्ञ में जो ब्राह्मण शूद्र द्वारा पाचित खीर अग्नि में हवन करता है, तो दक्षिणा-लोलुप ऐसा ब्राह्मण शूद्रत्व को प्राप्त होता है और वह शूद्र ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है ॥३६॥ मौनव्रतं समाश्रित्य आसीनो न वदेद् द्विजः । भुञ्जानो हि वदेद् यस्तु तदन्नं परिवर्जयेत् ॥३७॥ १. 'मृतसूतकपुष्टाङ्गं द्विजं शूद्रान्नभोजिनम्' इति द्वितीयान्तपदयुक्तोऽपि पाठः क्वचित्पुस्तके दृश्यते । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
१३२ पराशरस्मृतिः [ द्वादशो- मौन होकर भोजन करनेवाला व्यक्ति यदि असावधानी के कारण कदाचित् बोल दे, तो उसे अवशिष्ट अन्न को त्याग देना चाहिए ॥३७॥ १अर्द्धं भुक्ते तु यो विप्रस्तस्मिन् पात्रे जलं पिबेत् । हतं दैवं च पित्र्यं च आत्मानं चैवं² घातयेत् ॥३८॥ जो ब्राह्मण आधा भोजन करते ही उसी भोजनपात्र में जल पी ले तो वह ब्राह्मण देव-पितृ कार्य के अतिरिक्त अपनी आत्मा का भी हनन कर लेता है ॥३८॥ भुञ्जानेषु तु विप्रेषु योऽग्रे पात्रं विमुञ्चति । स मूढः स च पापिष्ठो ब्रह्मघ्नः स खलूच्यते ॥३९॥ ब्राह्मणों के भोजन करते समय जो व्यक्ति सबसे पहले भोजन छोड़- कर उठ जाता है वह मूर्ख, पापी और ब्रह्मघाती होता है ॥३९॥ भोजनेषु च तिष्ठत्सु स्वस्ति कुर्वन्ति ये द्विजाः । न देवास्तृप्तिमायान्ति निराशाः पितरस्तथा ॥४०॥ भोजन का पत्तल उठने से पहले ही ब्राह्मण लोग यदि स्वस्तिवाचन कर दें तो देवता अतृप्त रह जाते और पितृ-गण निराश हो जाते हैं ॥४०॥ ३अस्नात्वा नैव भुञ्जीत अजप्त्वाऽग्निमहूय च । ४पर्णपृष्ठे न भुञ्जीत रात्रौ दीपं विना तथा ॥४१॥ स्नान, जप और अग्निहोत्र के बिना भोजन नहीं करना चाहिए । पत्तल को उलटा रखकर भी भोजन न करे और रात्रि को बिना दीपक अर्थात् अँधेरे में भोजन करना उचित नहीं है ॥४१॥ गृहस्थस्तु दयायुक्तो धर्ममेवाऽनुचिन्तयेत् । पोष्यवर्गार्थसिद्ध्यर्थं न्यायवर्ती ५सुबुद्धिमान् ॥४२॥ १. 'अर्द्धभुक्त' इति । २. 'चोपघातयेत्' इति । ३. 'अस्नात्वा वै न भुञ्जीत तथैवाऽग्निमपूज्य च' इति । ४. 'न पर्णपृष्ठे' इति । ५. 'स बुद्धिमान्' इति ।
अध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३३
CC-0. In Public Domain, Digitization by eGangotri अध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३३ दयायुक्त होकर धर्मचिन्तन करने और अपने आश्रितों के भरण- पोषण के लिए नीतिपूर्वक आचरण करनेवाला गृहस्थ ही बुद्धिमान समझा जाता है ॥४२॥ न्यायोपार्जितवित्तेन कर्त्तव्यं ह्यात्मरक्षणम् । अन्यायेन तु यो जीवेत् सर्वकर्मबहिष्कृतः ॥४३॥ न्यायपूर्वक उपार्जित धन से आत्मरक्षा करना उचित है । इसके विपरीत अन्याय द्वारा अर्जित धन सभी शुभ कर्मों का नाशक होता है ॥४३॥ अग्निचित्कपिला सत्री राजा भिक्षुर्महोदधिः । दृष्टमात्राः पुनन्त्येते तस्मात् पश्येत्तु नित्यशः ॥४४॥ अग्निहोत्री, इष्ट का चयनकर्ता, कपिला गौ, यज्ञकर्ता, राजा, संन्यासी और समुद्र के दर्शन मात्र से मनुष्य शुद्धता को प्राप्त होता है । इसलिए उपर्युक्त का दर्शन प्रतिदिन ही करना चाहिए ॥४४॥ अरणिं कृष्णमार्जारं चन्दनं सुमणिं घृतम् । तिलान् कृष्णाऽजिनं छागं गृहे चैतानि रक्षयेत् ॥४५॥ अपने घर में अग्निमन्थन दण्ड, काली बिल्ली, चन्दन, श्रेष्ठ मणि, घी, तिल, काले मृग का चर्म और बकरे को रखना चाहिए ॥४५॥ गवां शतं सैकवृषं यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितम् । तत्क्षेत्रं दशगुणितं ‘गोचर्म’ परिकीर्तितम् ॥४६॥ भूमि की जितना दूरी में सौ गायें और एक बैल खड़ा हो उससे दसगुनी विस्तृत भूमि को ‘गोचर्म’ कहते हैं ॥४६॥ ब्रह्महत्यादिभिर्मर्त्यो मनो-वाक्काय कर्मजैः । एतद् गोचर्मदानेन मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥४७॥ इस गोचर्म भूमि का दान करनेवाला व्यक्ति कायिक, वाचिक, मानसिक और ब्रह्महत्यादि पापों से मुक्त हो जाता है ॥४७॥ १. ‘कर्मभिः’ इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १३४ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो- कुटुम्बिने दरिद्राय श्रोत्रियाय विशेषतः । यद्दानं दीयते तस्मै तद्दानं शुभकारकम् ॥४८॥ कुटुम्बी, दरिद्री और विशेषतः वेदपाठी ब्राह्मण को दिया जानेवाला दान शुभ फलदायक कहा गया है । ४८॥ वापी कूप-तडागाद्यैर्वाजपेय-शतैर्मखैः । गवां कोटिप्रदानेन भूमिहर्त्ता न शुद्ध्यति ॥४९॥ किसी की भूमि का हरण करनेवाला व्यक्ति सैकड़ों वापी, कूप, तालाव आदि का निर्माण कराने, सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करने तथा करोड़ों गायें दान करने पर भी पापरहित होकर शुद्ध नहीं हाता ॥४९॥ अष्टादशदिनादर्वाक् स्नानमेव रजस्वला । अत ऊर्ध्वं त्रिरात्रं स्यादुशना मुनिरब्रवीत् ॥५०॥ उशना मुनि का कथन है कि यदि स्त्री अठारह दिन के अन्दर ही रजस्वला हो जाती हो तो वह तीन दिनों तक अशुद्ध रहती है ॥५०॥ युगं युगद्वयं चैव त्रियुगं च चतुर्युगम् । चाण्डाल-सूतिकोदक्या-पतितानामधःक्रमात् ॥५१॥ पतिता स्त्री से चार हाथ, रजस्वला से आठ हाथ, प्रसूता से बारह हाथ तथा चाण्डालिनी से सोलह हाथ की दूरी पर रहना चाहिए ।५१। ततः सन्निधिमात्रेण स-चैलं स्नानमाचरेत् । स्नात्वाऽवलोकयेत् सूर्यमज्ञानात् स्पृशते यदि ॥५२॥ यदि उपर्युक्त रूप से वर्णित दायरे के निकट वे आ जायें तो वस्त्र सहित स्नान कर डालना चाहिए । यदि अज्ञानवश इन्हें स्पर्श कर ले तो स्नान के बाद सूर्य का दर्शन करना चाहिए । ज्ञान द्वारा स्पर्श करने पर आठ हजार गायत्री मन्त्र का जप किया जाता है ॥५२॥ विद्यमानेषु हस्तेषु ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः । तोयं पिबति वक्त्रेण श्वयोनौ जायते ध्रुवम् ॥५३॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३५ हाथ का प्रयोग न करके नदी में मुँह लगाकर पानी पीनेवाला अल्पज्ञ ब्राह्मण निश्चय ही कुत्ते की योनि में वास करता है ॥५३॥ यस्तु क्रुद्धः पुमान् ब्रूयाज्जायायास्तु अगम्यताम् । पुनरिच्छति चेदेनां विप्रमध्ये तु श्रावयेत् ॥५४॥ जो ब्राह्मण क्रोधावेश में अपनी पत्नी को माता या बहन की संज्ञा दे दे और क्रोध शान्त होने के पश्चात् यदि उससे पुनः रमण करना चाहे तो उस ब्राह्मण को परिषद् में इस बात को घोषणा करनी चाहिए-॥५४॥ श्रान्तः क्रुद्धस्तमोऽन्धो वा क्षुत्पिपासा-भयार्दितः । दानं पुण्यमकृत्वा तु प्रायश्चित्तं दिनत्रयम् ॥५५॥ मैंने श्रान्त, क्रोध, अज्ञान, क्षुधा-तृषा से क्लान्त एवं भयभीत होकर ऐसा वाक्य कह दिया, अथवा दान, तीर्थ, यात्रादि पुण्य करता हूँ, कहकर भी उसे न करे तो भी ब्राह्मणों को यही पूर्वोक्त कारण सुनाना चाहिए और तीन दिन तक उपवास करना चाहिए ॥५५॥ उपस्पृशेत् त्रिषवणं महानद्युपसङ्गमे । चीर्णान्ते चैव गां दद्याद् ब्राह्मणान् भोजयेद् दश ॥५६॥ इसके बाद समुद्रगामिनी नदी के संगम में त्रिकाल स्नान करे, तत्पश्चात् एक गोदान देकर और दस ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए ॥५६॥ दुराचारस्य विप्रस्य निषिद्धाचरणस्य च । अन्नं भुक्त्वा द्विजः कुर्याद् दिनमेकमभोजनम् ॥५७॥ दुराचरण और निषिद्धाचरण करनेवाले ब्राह्मण का यदि कोई ब्राह्मण अन्न भक्षण कर ले तो उसे एक दिन तक उपवास करना चाहिए ॥५७॥ सदाचारस्य विप्रस्य तथा वेदान्तवेदिनः । भुक्त्वाऽन्नं मुच्यते पापादहोरात्रान्तरान्तरः¹ ॥५८॥ १. '-न्तरः' इति ।
यदि स्वयं उपवास न कर सके तो किसी सदाचारी या वेदांगज्ञाता ब्राह्मण का अन्न दो दिनों तक भक्षण करे तो उपर्युक्त पाप से वह छूट जाता है ॥५८॥ ऊर्ध्वोच्छिष्टमथोच्छिष्टमन्तरिक्षमृतौ तथा । कृच्छ्रत्रयं प्रकुर्वीत अशौचमरणे तथा ॥५९॥ जो कोई वमनादि करके जूठे मुँह, मल-मूत्र से अशुद्ध होकर या अन्तरिक्ष में मृत हो जाय तो प्रायश्चित्त के लिए कृच्छ्र व्रत करा देने अर्थात् व्रत के बदले में उतनी ही गायें दान करने से शुद्ध होता है। इसी प्रकार का प्रायश्चित्त अशौच में मरनेवाले का भी होता है ॥५९॥ कृच्छ्रे १ देव्ययुतं चैव प्राणायामशतद्वयम् । पुण्यतीर्थेऽनार्द्रशिरःस्नानं २ द्वादशसंख्यया ॥६०॥ दस हजार गायत्री का जप करने से भी कृच्छ्र व्रत का फल होता है, दो सौ प्राणायाम करने से एक कृच्छ्र व्रत पूरा होता है। किसी तीर्थ स्थान में स्नान करके जब केश सूख जायें तो पुनः स्नान करे। इस प्रकार बारह बार करने से एक कृच्छ्र व्रत पूरा होता है ॥६०॥ द्वियोजने ३ तीर्थयात्रा कृच्छ्रमेकं प्रकल्पितम् ! गृहस्थः कामतः कुर्याद्रेतः स्खलनं भुवि ॥६१॥ दो योजन अर्थात् आठ कोस तक किसी तीर्थस्थल की ओर गमन करने से भी एक कृच्छ्र व्रत के समान होता है। जो गृहस्थ अपनी स्वेच्छा से वीर्यपात करे तो ॥६१॥ सहस्रं तु जपेद् देव्याः प्राणायामस्त्रिभिः सह । चतुर्विद्योपपन्नस्तु धवद् विप्रघातके ४ ॥६२॥ उसे एक हजार गायत्री मन्त्र का जाप और तीन प्राणायाम करना चाहिए। चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण ॥६२॥ १. 'कृच्छ्रे देव्ययुतं' । २. '-चाद्र'शिराः' । ३. 'द्वियोजनं' । ४. 'ब्रह्मघातके' इति ।