भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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१३२ पराशरस्मृतिः [ द्वादशो- मौन होकर भोजन करनेवाला व्यक्ति यदि असावधानी के कारण कदाचित् बोल दे, तो उसे अवशिष्ट अन्न को त्याग देना चाहिए ॥३७॥ १अर्द्धं भुक्ते तु यो विप्रस्तस्मिन् पात्रे जलं पिबेत् । हतं दैवं च पित्र्यं च आत्मानं चैवं² घातयेत् ॥३८॥ जो ब्राह्मण आधा भोजन करते ही उसी भोजनपात्र में जल पी ले तो वह ब्राह्मण देव-पितृ कार्य के अतिरिक्त अपनी आत्मा का भी हनन कर लेता है ॥३८॥ भुञ्जानेषु तु विप्रेषु योऽग्रे पात्रं विमुञ्चति । स मूढः स च पापिष्ठो ब्रह्मघ्नः स खलूच्यते ॥३९॥ ब्राह्मणों के भोजन करते समय जो व्यक्ति सबसे पहले भोजन छोड़- कर उठ जाता है वह मूर्ख, पापी और ब्रह्मघाती होता है ॥३९॥ भोजनेषु च तिष्ठत्सु स्वस्ति कुर्वन्ति ये द्विजाः । न देवास्तृप्तिमायान्ति निराशाः पितरस्तथा ॥४०॥ भोजन का पत्तल उठने से पहले ही ब्राह्मण लोग यदि स्वस्तिवाचन कर दें तो देवता अतृप्त रह जाते और पितृ-गण निराश हो जाते हैं ॥४०॥ ३अस्नात्वा नैव भुञ्जीत अजप्त्वाऽग्निमहूय च । ४पर्णपृष्ठे न भुञ्जीत रात्रौ दीपं विना तथा ॥४१॥ स्नान, जप और अग्निहोत्र के बिना भोजन नहीं करना चाहिए । पत्तल को उलटा रखकर भी भोजन न करे और रात्रि को बिना दीपक अर्थात् अँधेरे में भोजन करना उचित नहीं है ॥४१॥ गृहस्थस्तु दयायुक्तो धर्ममेवाऽनुचिन्तयेत् । पोष्यवर्गार्थसिद्ध्यर्थं न्यायवर्ती ५सुबुद्धिमान् ॥४२॥ १. 'अर्द्धभुक्त' इति । २. 'चोपघातयेत्' इति । ३. 'अस्नात्वा वै न भुञ्जीत तथैवाऽग्निमपूज्य च' इति । ४. 'न पर्णपृष्ठे' इति । ५. 'स बुद्धिमान्' इति ।