भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 170 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 143

ऽध्याय ] भाषाटीकासहिता १३१ उनके साथ मेल-जोल बढ़ाने, उठने-बैठने और उनके उपदेश को सुनने से पतित हो जाते हैं ॥३२॥ यः शूद्रया पाचयेन्नित्यं शूद्री च गृहमेधिनी । वर्जितः पितृ-देवेभ्यो रौरवं याति स द्विजः ॥३३॥ जिस ब्राह्मण को रसोई शूद्र जाति की स्त्री बनाती है, ब्राह्मण की पत्नी बनकर घर में रहती है तथा जो ब्राह्मण देव-पितृ कार्य से पराङ्मुख है, उस ब्राह्मण को रौरव नरक में वास करना पड़ता है ॥३३॥ मृत-सूतक-पुष्टाङ्गो द्विज शूद्रान्नभोजनः । अहं तन्न विजानामि कां कां योनिं गमिष्यति ? ॥३४॥ सूतक लगने के कारण अशौचप्राप्त व्यक्ति का अन्न खाने तथा शूद्र का भोजन ग्रहण करनेवाले ब्राह्मण को किन-किन योनियों में भ्रमण करना पड़ेगा, इस बात को हम नहीं बतला सकते ॥३४॥ गृध्रो द्वादश जन्मानि दश जन्मानि शूकरः । श्वयोनौ सप्त जन्मानि इत्येवं मनुरब्रवीत् ॥३५॥ मनु ने कहा है कि ऐसा ब्राह्मण बारह जन्म तक गीध, दस जन्म तक सूअर और सात जन्म तक कुत्ते की योनि में रहता है ॥३५॥ दक्षिणार्थं तु यो विप्रः शूद्रस्य जुहुयाद् हविः । ब्राह्मणस्तु भवेच्छूद्रः शूद्रस्तु ब्राह्मणो भवेत् ॥३६॥ शूद्र के यज्ञ में जो ब्राह्मण शूद्र द्वारा पाचित खीर अग्नि में हवन करता है, तो दक्षिणा-लोलुप ऐसा ब्राह्मण शूद्रत्व को प्राप्त होता है और वह शूद्र ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है ॥३६॥ मौनव्रतं समाश्रित्य आसीनो न वदेद् द्विजः । भुञ्जानो हि वदेद् यस्तु तदन्नं परिवर्जयेत् ॥३७॥ १. 'मृतसूतकपुष्टाङ्गं द्विजं शूद्रान्नभोजिनम्' इति द्वितीयान्तपदयुक्तोऽपि पाठः क्वचित्पुस्तके दृश्यते । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal