भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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१२२ पराशरस्मृतिः [ एकादशो- व्याघ्र, भालू, सिंह आदि किसी कुएँ या तालाब में गिरकर मर गये हों तो उस दूषित जल को पीने से, ॥४४॥ प्रायश्चित्तं भवेत् पुंसः क्रमेणैतेन सर्वशः । विप्रः शुद्ध्येत् त्रिरात्रेण क्षत्रियस्तु दिनद्वयात् ॥४५॥ ब्राह्मण को तीन दिन और क्षत्रिय को दो दिन तक उपवास करना चाहिए ॥४५॥ एकाहेन तु वैश्यस्तु शूद्रो नक्तेन शुद्ध्यति । परपाकनिवृत्तस्य परपाकरतस्य च ॥४६॥ वैश्य एक दिनके उपवास तथा शूद्र रात्रिमें भोजन करने से ही शुद्धता को प्राप्त हो जाता है। परपाकनिवृत्त और परपाकरत, ।४६॥ अपचस्य च भुक्त्वाऽन्नं द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् । अपचस्य च यद्दानं दातुश्चाऽस्य कुतः फलम् ? ॥४७॥ तथा अपच का अन्न यदि कोई ब्राह्मण ग्रहण करे तो उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिए। अपच को दान करने का कुछ भी फल नहीं होता ॥४७॥ दाता प्रतिग्रहीता च तौ द्वौ निरयगामिनौ । गृहीत्वाऽग्निं समारोप्य पञ्चयज्ञान् निर्वपेत् ॥४८॥ दान देने और ग्रहण करनेवाले दोनों ही नरकगामी होते हैं। जो कोई अग्नि का समारोपण करके भी पंचयज्ञों को नहीं करता ॥४८॥ परपाकनिवृत्तोऽसौ मुनिभिः परिकीर्तितः । पञ्चयज्ञान् स्वयं कृत्वा परान्नेनोपजीवति ॥४९॥ उसे मुनियों ने 'परपाकनिवृत्त' की संज्ञा दी है। जो स्वयं पंचयज्ञों को करके भी किसी दूसरे के अन्न पर निर्भर रहता है ॥४९॥ सततं प्रातरुत्थाय परपाकतस्तु सः । १. 'तु' इति ।