भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १२३ गृहस्थधर्मो यो विप्रो ददाति परिवर्जितः ॥५०॥ वह प्रातः उठने के बाद सदैव 'परपाक-रत' कहा जाता है। गृहस्थाश्रम में रहनेवाला जो ब्राह्मण दान नहीं करता ॥५०॥ ऋषिभिर्धर्मतत्त्वज्ञैरपचः परिकीर्तितः । युगे युगे तु ये धर्मास्तेषु तेषु च ये द्विजाः ॥५१॥ उस ब्राह्मण को धर्मवेत्ता ऋषियों ने 'अपच' के नाम से घोषित किया है । अन्य युग के जो धर्म हैं और उन युगों के जो ब्राह्मण हैं ॥५१॥ तेषां निन्दा न कर्त्तव्या युगरूपा हि ते द्विजाः । हुङ्कारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वङ्कारं च गरीयसः ॥५२॥ उनकी निन्दा कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वे विप्र युग के प्रतीक हैं। यदि किसी ब्राह्मण को 'हुंकार' और अपने से बड़े लोगों को 'तुकार' शब्द से सम्बोधित करे तो वह ॥५२॥ स्नात्वा तिष्ठन्नहःशेषमभिवाद्य प्रसाद्येत् । ताडयित्वा तृणेनापि कण्ठे बध्वाऽपि वाससा ॥५३॥ दिन के शेष होने तक स्नान करके बैठा रहे और रुष्ट हुए को नमस्कार के द्वारा प्रसन्न करने की चेष्टा करे। तिनके से आघात करने, गले में वस्त्र द्वारा बाँधने ॥५३॥ विवादेनापि निर्जित्य प्रणिपत्य प्रसाद्येत् । अवगूर्य त्वहोरात्रं त्रिरात्रं क्षितिपातने ॥५४॥ या वाद-विवाद में परास्त कर ले तो उन्हें प्रणाम करके प्रसन्न करे। यदि ब्राह्मण को मारने के उद्देश्य से दण्ड उठाये तो एक दिन, भूमि पर धराशायी कर देने पर तीन दिन, ॥५४॥ अतिकृच्छ्रं च रुधिरे कृच्छ्रोऽभ्यन्तरशोणिते । १. 'अवगृह्य' इति ।