पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 133, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसे यह ब्रह्मकूर्च सम्पूर्ण रूप से भस्मसात् कर देता है जिस प्रकार धधकती हुई अग्नि ईंधन को जला डालती है। यह त्रैलोक्य में अत्यन्त पुनीत होने के साथ ही साथ देवताओं का निवासस्थल भी है ॥३९॥ वरुणश्च व गोमूत्रे गोमये हव्यवाहनः । दध्नि वायुः समुद्दिष्टः सोमः क्षीरे घृते रविः ॥४०॥ गोमूत्र में वरुण, गोबर में अग्नि, दही में वायु, दूध में चन्द्रमा और घी में सूर्य का निवास माना गया है ॥४०॥ पिबतः पतितं तोयं भोजने मुखनिःसृतम् । अपेयं तद् विजानीयात् पीत्वो चान्द्रायणं चरेत् ॥४१॥ पानी पीने के समय गिरा हुआ पानी या भोजन के समय मुँह से गिरा हुआ अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। यदि ग्रहण ही कर ले तो उसकी शुद्धि के लिए चान्द्रायण व्रत करना चाहिए ॥४१॥ कूपे च पतितं दृष्ट्वा श्व-शृगालौ च मर्कटम् । अस्थि-चर्मादि पतितं पीत्वाऽमेध्या अपो द्विजः ॥४२॥ किसी कूप में यदि कुत्ते, गीदड़, बन्दर की हड्डी या चमड़ा गिरा हुआ दिखाई दे और उस जल को ब्राह्मण पी जाय तो उसे वर्णित प्रकार का प्रायश्चित्त करना उचित है ॥४२॥ नारं तु कुणपं काकं २विड्वराह-खरोष्ट्रकम् । गावयं सौप्रतीकं च मायूरं खड्गकं तथा ॥४३॥ मनुष्य, कौवे, ग्राम-शूकर, गधे, ऊँट, शवर (नील गाय), सुप्रतीक (हाथी), मोर, गैंडा, ॥४३॥ वैयाघ्रमार्क्षं साहं वा कूपे यदि निमज्जति । तडागस्याऽथ दुष्टस्य पीतं स्यादुदकं यदि ॥४४॥ १. 'भुक्त्वा' इति । २. 'विड्वराहं' इति ।