पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १३४ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो- कुटुम्बिने दरिद्राय श्रोत्रियाय विशेषतः । यद्दानं दीयते तस्मै तद्दानं शुभकारकम् ॥४८॥ कुटुम्बी, दरिद्री और विशेषतः वेदपाठी ब्राह्मण को दिया जानेवाला दान शुभ फलदायक कहा गया है । ४८॥ वापी कूप-तडागाद्यैर्वाजपेय-शतैर्मखैः । गवां कोटिप्रदानेन भूमिहर्त्ता न शुद्ध्यति ॥४९॥ किसी की भूमि का हरण करनेवाला व्यक्ति सैकड़ों वापी, कूप, तालाव आदि का निर्माण कराने, सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करने तथा करोड़ों गायें दान करने पर भी पापरहित होकर शुद्ध नहीं हाता ॥४९॥ अष्टादशदिनादर्वाक् स्नानमेव रजस्वला । अत ऊर्ध्वं त्रिरात्रं स्यादुशना मुनिरब्रवीत् ॥५०॥ उशना मुनि का कथन है कि यदि स्त्री अठारह दिन के अन्दर ही रजस्वला हो जाती हो तो वह तीन दिनों तक अशुद्ध रहती है ॥५०॥ युगं युगद्वयं चैव त्रियुगं च चतुर्युगम् । चाण्डाल-सूतिकोदक्या-पतितानामधःक्रमात् ॥५१॥ पतिता स्त्री से चार हाथ, रजस्वला से आठ हाथ, प्रसूता से बारह हाथ तथा चाण्डालिनी से सोलह हाथ की दूरी पर रहना चाहिए ।५१। ततः सन्निधिमात्रेण स-चैलं स्नानमाचरेत् । स्नात्वाऽवलोकयेत् सूर्यमज्ञानात् स्पृशते यदि ॥५२॥ यदि उपर्युक्त रूप से वर्णित दायरे के निकट वे आ जायें तो वस्त्र सहित स्नान कर डालना चाहिए । यदि अज्ञानवश इन्हें स्पर्श कर ले तो स्नान के बाद सूर्य का दर्शन करना चाहिए । ज्ञान द्वारा स्पर्श करने पर आठ हजार गायत्री मन्त्र का जप किया जाता है ॥५२॥ विद्यमानेषु हस्तेषु ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः । तोयं पिबति वक्त्रेण श्वयोनौ जायते ध्रुवम् ॥५३॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal