पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३५ हाथ का प्रयोग न करके नदी में मुँह लगाकर पानी पीनेवाला अल्पज्ञ ब्राह्मण निश्चय ही कुत्ते की योनि में वास करता है ॥५३॥ यस्तु क्रुद्धः पुमान् ब्रूयाज्जायायास्तु अगम्यताम् । पुनरिच्छति चेदेनां विप्रमध्ये तु श्रावयेत् ॥५४॥ जो ब्राह्मण क्रोधावेश में अपनी पत्नी को माता या बहन की संज्ञा दे दे और क्रोध शान्त होने के पश्चात् यदि उससे पुनः रमण करना चाहे तो उस ब्राह्मण को परिषद् में इस बात को घोषणा करनी चाहिए-॥५४॥ श्रान्तः क्रुद्धस्तमोऽन्धो वा क्षुत्पिपासा-भयार्दितः । दानं पुण्यमकृत्वा तु प्रायश्चित्तं दिनत्रयम् ॥५५॥ मैंने श्रान्त, क्रोध, अज्ञान, क्षुधा-तृषा से क्लान्त एवं भयभीत होकर ऐसा वाक्य कह दिया, अथवा दान, तीर्थ, यात्रादि पुण्य करता हूँ, कहकर भी उसे न करे तो भी ब्राह्मणों को यही पूर्वोक्त कारण सुनाना चाहिए और तीन दिन तक उपवास करना चाहिए ॥५५॥ उपस्पृशेत् त्रिषवणं महानद्युपसङ्गमे । चीर्णान्ते चैव गां दद्याद् ब्राह्मणान् भोजयेद् दश ॥५६॥ इसके बाद समुद्रगामिनी नदी के संगम में त्रिकाल स्नान करे, तत्पश्चात् एक गोदान देकर और दस ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए ॥५६॥ दुराचारस्य विप्रस्य निषिद्धाचरणस्य च । अन्नं भुक्त्वा द्विजः कुर्याद् दिनमेकमभोजनम् ॥५७॥ दुराचरण और निषिद्धाचरण करनेवाले ब्राह्मण का यदि कोई ब्राह्मण अन्न भक्षण कर ले तो उसे एक दिन तक उपवास करना चाहिए ॥५७॥ सदाचारस्य विप्रस्य तथा वेदान्तवेदिनः । भुक्त्वाऽन्नं मुच्यते पापादहोरात्रान्तरान्तरः¹ ॥५८॥ १. '-न्तरः' इति ।