पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयदि स्वयं उपवास न कर सके तो किसी सदाचारी या वेदांगज्ञाता ब्राह्मण का अन्न दो दिनों तक भक्षण करे तो उपर्युक्त पाप से वह छूट जाता है ॥५८॥ ऊर्ध्वोच्छिष्टमथोच्छिष्टमन्तरिक्षमृतौ तथा । कृच्छ्रत्रयं प्रकुर्वीत अशौचमरणे तथा ॥५९॥ जो कोई वमनादि करके जूठे मुँह, मल-मूत्र से अशुद्ध होकर या अन्तरिक्ष में मृत हो जाय तो प्रायश्चित्त के लिए कृच्छ्र व्रत करा देने अर्थात् व्रत के बदले में उतनी ही गायें दान करने से शुद्ध होता है। इसी प्रकार का प्रायश्चित्त अशौच में मरनेवाले का भी होता है ॥५९॥ कृच्छ्रे १ देव्ययुतं चैव प्राणायामशतद्वयम् । पुण्यतीर्थेऽनार्द्रशिरःस्नानं २ द्वादशसंख्यया ॥६०॥ दस हजार गायत्री का जप करने से भी कृच्छ्र व्रत का फल होता है, दो सौ प्राणायाम करने से एक कृच्छ्र व्रत पूरा होता है। किसी तीर्थ स्थान में स्नान करके जब केश सूख जायें तो पुनः स्नान करे। इस प्रकार बारह बार करने से एक कृच्छ्र व्रत पूरा होता है ॥६०॥ द्वियोजने ३ तीर्थयात्रा कृच्छ्रमेकं प्रकल्पितम् ! गृहस्थः कामतः कुर्याद्रेतः स्खलनं भुवि ॥६१॥ दो योजन अर्थात् आठ कोस तक किसी तीर्थस्थल की ओर गमन करने से भी एक कृच्छ्र व्रत के समान होता है। जो गृहस्थ अपनी स्वेच्छा से वीर्यपात करे तो ॥६१॥ सहस्रं तु जपेद् देव्याः प्राणायामस्त्रिभिः सह । चतुर्विद्योपपन्नस्तु धवद् विप्रघातके ४ ॥६२॥ उसे एक हजार गायत्री मन्त्र का जाप और तीन प्राणायाम करना चाहिए। चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण ॥६२॥ १. 'कृच्छ्रे देव्ययुतं' । २. '-चाद्र'शिराः' । ३. 'द्वियोजनं' । ४. 'ब्रह्मघातके' इति ।