भारतकोश
संग्रह पर लौटें

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३५ हाथ का प्रयोग न करके नदी में मुँह लगाकर पानी पीनेवाला अल्पज्ञ ब्राह्मण निश्चय ही कुत्ते की योनि में वास करता है ॥५३॥ यस्तु क्रुद्धः पुमान् ब्रूयाज्जायायास्तु अगम्यताम् । पुनरिच्छति चेदेनां विप्रमध्ये तु श्रावयेत् ॥५४॥ जो ब्राह्मण क्रोधावेश में अपनी पत्नी को माता या बहन की संज्ञा दे दे और क्रोध शान्त होने के पश्चात् यदि उससे पुनः रमण करना चाहे तो उस ब्राह्मण को परिषद् में इस बात को घोषणा करनी चाहिए-॥५४॥ श्रान्तः क्रुद्धस्तमोऽन्धो वा क्षुत्पिपासा-भयार्दितः । दानं पुण्यमकृत्वा तु प्रायश्चित्तं दिनत्रयम् ॥५५॥ मैंने श्रान्त, क्रोध, अज्ञान, क्षुधा-तृषा से क्लान्त एवं भयभीत होकर ऐसा वाक्य कह दिया, अथवा दान, तीर्थ, यात्रादि पुण्य करता हूँ, कहकर भी उसे न करे तो भी ब्राह्मणों को यही पूर्वोक्त कारण सुनाना चाहिए और तीन दिन तक उपवास करना चाहिए ॥५५॥ उपस्पृशेत् त्रिषवणं महानद्युपसङ्गमे । चीर्णान्ते चैव गां दद्याद् ब्राह्मणान् भोजयेद् दश ॥५६॥ इसके बाद समुद्रगामिनी नदी के संगम में त्रिकाल स्नान करे, तत्पश्चात् एक गोदान देकर और दस ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए ॥५६॥ दुराचारस्य विप्रस्य निषिद्धाचरणस्य च । अन्नं भुक्त्वा द्विजः कुर्याद् दिनमेकमभोजनम् ॥५७॥ दुराचरण और निषिद्धाचरण करनेवाले ब्राह्मण का यदि कोई ब्राह्मण अन्न भक्षण कर ले तो उसे एक दिन तक उपवास करना चाहिए ॥५७॥ सदाचारस्य विप्रस्य तथा वेदान्तवेदिनः । भुक्त्वाऽन्नं मुच्यते पापादहोरात्रान्तरान्तरः¹ ॥५८॥ १. '-न्तरः' इति ।

यदि स्वयं उपवास न कर सके तो किसी सदाचारी या वेदांगज्ञाता ब्राह्मण का अन्न दो दिनों तक भक्षण करे तो उपर्युक्त पाप से वह छूट जाता है ॥५८॥ ऊर्ध्वोच्छिष्टमथोच्छिष्टमन्तरिक्षमृतौ तथा । कृच्छ्रत्रयं प्रकुर्वीत अशौचमरणे तथा ॥५९॥ जो कोई वमनादि करके जूठे मुँह, मल-मूत्र से अशुद्ध होकर या अन्तरिक्ष में मृत हो जाय तो प्रायश्चित्त के लिए कृच्छ्र व्रत करा देने अर्थात् व्रत के बदले में उतनी ही गायें दान करने से शुद्ध होता है। इसी प्रकार का प्रायश्चित्त अशौच में मरनेवाले का भी होता है ॥५९॥ कृच्छ्रे १ देव्ययुतं चैव प्राणायामशतद्वयम् । पुण्यतीर्थेऽनार्द्रशिरःस्नानं २ द्वादशसंख्यया ॥६०॥ दस हजार गायत्री का जप करने से भी कृच्छ्र व्रत का फल होता है, दो सौ प्राणायाम करने से एक कृच्छ्र व्रत पूरा होता है। किसी तीर्थ स्थान में स्नान करके जब केश सूख जायें तो पुनः स्नान करे। इस प्रकार बारह बार करने से एक कृच्छ्र व्रत पूरा होता है ॥६०॥ द्वियोजने ३ तीर्थयात्रा कृच्छ्रमेकं प्रकल्पितम् ! गृहस्थः कामतः कुर्याद्रेतः स्खलनं भुवि ॥६१॥ दो योजन अर्थात् आठ कोस तक किसी तीर्थस्थल की ओर गमन करने से भी एक कृच्छ्र व्रत के समान होता है। जो गृहस्थ अपनी स्वेच्छा से वीर्यपात करे तो ॥६१॥ सहस्रं तु जपेद् देव्याः प्राणायामस्त्रिभिः सह । चतुर्विद्योपपन्नस्तु धवद् विप्रघातके ४ ॥६२॥ उसे एक हजार गायत्री मन्त्र का जाप और तीन प्राणायाम करना चाहिए। चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण ॥६२॥ १. 'कृच्छ्रे देव्ययुतं' । २. '-चाद्र'शिराः' । ३. 'द्वियोजनं' । ४. 'ब्रह्मघातके' इति ।

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[ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३७

समुद्रसेतुगमनं प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् । सेतुबन्धपथे भिक्षां चातुर्वर्ण्यात् समाचरेत् ॥६३॥ को विप्रघाती के लिए सेतुबन्ध रामेश्वर दर्शन करने का प्रायश्चित्त बतलाना चाहिए। प्रायश्चित्त करनेवाले ब्रह्मघाती को रामेश्वर दर्शन के लिए जाते समय मार्ग में सभी वर्णों के यहाँ भिक्षाटन करना चाहिए ॥६३॥ वर्जयित्वा विकर्मस्थान् छत्रोपानद्-विवर्जितः । अहं दुष्कृतकर्मा वै महापातककारकः ॥६४॥ विपरीत आचरण करनेवालों के घर भिक्षाटन न करे और न तो अपने पास छाता, जूता आदि ही रखे। भिक्षा याचना के समय प्रायश्चित्त- कर्त्ता को कहना चाहिए—'मैं दुराचरण करनेवाला पापी हूँ' ॥६४॥ गृहद्वारेषु तिष्ठामि भिक्षार्थी ब्रह्मघातकः । गोकुलेषु वसेच्चैव ग्रामेषु नगरेषु वा ॥६५॥ मैं घर के द्वार पर ब्रह्मघाती बनकर भिक्षा के उद्देश्य से आया हूँ। गायों के समूह के साथ गाँव और नगरों में निवास करे ॥६५॥ तपोवनेषु तीर्थेषु नदीप्रस्रवणेषु वा² । एतेषु ख्यापयन्नेनः³ पुण्यं गत्वा तु सागरम् ॥६६॥ तपोवन, तीर्थ, नदी और जल-प्रपातों में अपने किये हुए दुष्कर्मों का वर्णन करते हुए पवित्र सागर में जाय ॥६६॥ दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम् । रामचन्द्रसमादिष्टं¹ नरसञ्चय-सञ्चितम् ॥६७॥ भगवान् रामचन्द्र के कथनानुसार नल द्वारा निर्मित, दस योजन चौड़े और सौ योजन लम्बे ॥६७॥


१. 'समादिशेत्' । २. 'च' इति । ३. '-न्नेव' ।

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१३८ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो- सेतुं दृष्ट्वा समुद्रस्य ब्रह्महत्यां व्यपोहति । सेतुं दृष्ट्वा विशुद्धात्मा त्ववगाहेत सागरम् ॥६८॥ उस समुद्र सेतु को देखकर मनुष्य ब्रह्महत्यादि पापों से रहित हो जाता है । सेतुदर्शन से शुद्ध शरीर को प्राप्त करके समुद्र में स्नान करना चाहिए ॥६८॥ यजेत वाऽश्वमेधेन राजा तु पृथिवीपतिः । पुनः प्रत्यागतो वेश्म वासार्थमुपसर्पति ॥६९॥ पृथिवीपति राजा को ब्रह्महत्यादि से मुक्त होने के निमित्त अश्वमेध यज्ञ और निज गृह में वास करना उचित है ॥६९॥ सपुत्रः सह १भृत्यैश्च कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् । गाश्चैवैकशतं दद्याच्चातुर्विद्येषु दक्षिणाम् ॥७०॥ पुत्र, पत्नी, सेवक तथा ब्राह्मणों को भोजन करावे और चारों वेद के ज्ञाता ब्राह्मण को दक्षिणा में एक सौ गायों का दान करे ॥७०॥ ब्राह्मणानां प्रसादेन ब्रह्महा तु विमुच्यते । विन्ध्यादुत्तरतो यस्य २निवासः परिकीर्तितः ॥७१॥ ब्राह्मणों की प्रसन्नता से ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध हो जाता है । विन्ध्य पर्वतमाला के उत्तरी भाग में रहनेवालों के लिए ही ॥७१॥ पराशरमतं तस्य सेतुबन्धस्य दर्शनम् । सवनस्थां स्त्रियं हत्वा ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ॥७२॥ पराशर के मत से सेतुबन्ध दर्शनका विधान है। सोमयाग करनेवाली स्त्री का वध करने से ब्रह्महत्या के समान ही व्रत करना चाहिए ॥७२॥ मद्यपञ्च द्विजः कुर्यान्नदीं गत्वा समुद्रगाम् । चान्द्रायणे ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ॥७३॥ सुरापान करनेवाले ब्राह्मण को भी ब्रह्महत्या का व्रत करना उचित है और समुद्र में मिलनेवाली नदियों में स्नान करने के पश्चात् १. ‘भृत्यश्च’ । २. ‘संवासः’ । ३. ‘सुरापश्च’ ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३९ चान्द्रायण करने का विधान है। इसके बाद ब्राह्मण भोजन कराकर ॥७३॥ अनुडुत्सहितां गां च दद्याद् विप्रेषु दक्षिणाम् । सुरापानं सकृत्कृत्वा अग्निवर्णां सुरां पिवेत् ॥७४॥ ब्राह्मण को दक्षिणास्वरूप एक बैल और गौ का दान करना चाहिए। जो एक बार मदिरापान करे या अग्नि के समान तप्त सुरापान करके मृत्यु को प्राप्त हो जाय ॥७४॥ स पावयेदथात्मानमिह लोके परत्र च। अपहृत्य सुवर्णं तु ब्राह्मणस्य ततः स्वयम् ॥७५॥ तो वह व्यक्ति इस लोक तथा परलोक दोनों में अपनी आत्मा को शुद्ध कर लेता है। ब्राह्मण का स्वर्ण चोरी करनेवाले को स्वयं ही ।७५। गच्छेन्मुसलमादाय राजाभ्याशं^२ वधाय तु। हतः शुद्धिमवाप्नोति राज्ञाऽसौ मुक्त एव च ॥७६॥ अपने वध के लिए हाथ में मूसल धारण कर राजा के पास जाना चाहिए। चोर के द्वारा अपने वध का निवेदन करने पर यदि उसे राजा मार डाले या छोड़ दे तो भी वह अपने किये हुए पापों से मुक्त हो जाता है ॥७६॥ कामतस्तु कृतं यत्स्यान्नाऽन्यथा वधमर्हति । आसनाच्छयनाद्यानात् सम्भाषात् सहभोजनात् ॥७७॥ जान-बूझकर ब्राह्मण का स्वर्ण चुरानेवाले का वध करना विहित है, अन्यथा वह वध के अयोग्य होता है। एक साथ बैठने, सोने, एक ही वाहन पर सवारी करने, बोलने और एक साथ बैठकर भोजन करने से ॥७७॥ संक्रामन्ति^३ हि पापानि तैलविन्दुरिवाऽम्भसि । १. 'पावयेदिहात्मानमिह' । २. 'राजानं स्ववधाय' इति । 'न्तीह' इति !

२४० पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो- चान्द्रायणं यावकं च तुलापुरुष एव च । गवां चैवाऽनुगमनं सर्वपापप्रणाशनम् ॥७८॥ किसी पापी का पाप निर्दोष व्यक्ति को पानी पर तेल की बूँद पड़ने के समान ही लग जाता है। चान्द्रायण, यावक, तुलापुरुष और गायों के पीछे-पीछे अनुसरण करने से सभी प्रकार के पापों का शमन हो जाता है ॥७८॥ एतत् पाराशरं शास्त्रं श्लोकानां शतपञ्चकम् । द्विनवत्या समायुक्तं धर्मशास्त्रस्य संग्रहः॥७९॥ यह महर्षि पाराशर रचित पाँच सौ बानवे श्लोकों का धर्मशास्त्र संग्रह है ॥७९॥ यथाऽध्ययनकर्माणि धर्मशास्त्रमिदं तथा । अध्येतव्यं प्रयत्नेन नियतं स्वर्गकामिना ॥८०॥ इति देवरिया-मण्डलान्तर्गत - 'मझौलाराज्य' निवासि-व्याकरणाचार्य- साहित्यवारिधि-पण्डितश्रीशिवदत्तमिश्रशास्त्रिसम्पादिते पाराशरीये धर्म- शास्त्रे सकलप्रायश्चित्तनिर्णयो नाम द्वादशोऽध्यायः समाप्तः ॥१२॥ जिस प्रकार वेदाध्ययन से पुण्य-लाभ होता है उसी प्रकार इस धर्मशास्त्र के पढ़ने से भी पुण्य प्राप्त होता है। अतः प्रत्येक स्वर्गाभिलाषी व्यक्ति के लिए इस शास्त्र का पठन-पाठन नियमपूर्वक करना अत्यन्त आवश्यक है ॥८०॥ इस प्रकार 'देवरिया'-मण्डलान्तर्गत 'मझौलीराज्य' (सम्प्रति वाराणसी) निवासि- पण्डित श्रीसन्तशरणमिश्रात्मज-पण्डित-श्रीशिवदत्तमिश्र-शास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशरीय धर्मशास्त्र में सकल- प्रायश्चित्त निर्णय नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१२॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

श्लोकानुक्रमणिका

श्लोकानुक्रमणिका * १. प्रथमोऽध्याय श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः अकृत्वा वैश्वदेवं तु १५ कृते त्वस्थिगताः ९ अकृत्वा वैश्वदेवं तु १५ कृते सम्भाषणादेव ७ अतिथिं तत्र सम्प्राप्तं १२ क्षत्रियो हि प्रजा रक्षन् १७ अतिथैर्यस्य भग्नाशो १२ गार्गीया गौतमीयाश्च ४ अथ सन्तुष्टहृदयः ३ चतुर्णामपि वर्णानामाचारो १० अथाऽतो हिमशैलाग्रे १ चातुर्वर्ण्यं समाचारं ५ अन्ये कृतयुगे धर्मास्- ७ चोरो वा यदि चाण्डालः १६ अपूर्वः सुव्रती विप्रो १३ जितो धर्मो ह्यधर्मेण ९ अभिगम्य कृते दानं ८ तच्छ्रुत्वा ऋषिवाक्यं तु १ अभिगम्योत्तमं दानमाहूयैव ८ ततस्ते ऋषयः सर्वे २ अव्रती ह्यनधीयानां १७ तपः परं कृतयुगे ७ अस्मिन् मन्वन्तरे धर्माः ४ तस्मिन्नृषिसभामध्ये २ अहमद्यैव तत्सर्वं १० त्यजेद् देशं कृतयुगे ७ इष्टो वा यदि वा द्वेष्यो ११ दद्याच्च भिक्षात्रितयं १४ कपिलाक्षीरपानेन १७ दूराच्चोपगतं श्रान्तं ११ कल्पे कल्पे क्षये सत्या ६ धर्मं कथय मे तात ! ४ कात्यायनकृताश्चैव ४ धर्मस्य निर्णयं प्राह ५ काष्ठभार-सहस्रेण १३ न कश्चिद् वेदकर्ता च ६ कुशलं सम्यगित्युक्त्वा ३ न गृह्णाति तु यो विप्रो १६ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ३ न चाऽहं सर्वतत्वज्ञः २ कृते तात्क्षणिकः शापस्- ८ न पृच्छेद गोत्रचरणे १३ कृते तु मानवा धर्मास्- ७ न श्रीः कुलक्रमायाता १७

( १४२ ) श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः नानापुष्प-लताकीर्णं २ लाभकर्म तथा रत्नं १७ नैव ग्रामीणमतिथि १२ विक्रीणन् मद्य-मांसानि १७ पराशरमतं पुण्यं १० वैश्वदेवकृतं पापं १५ पुष्पं पुष्पं विचिनुयान् १७ वैश्वदेवविहीना ये १५ ब्राह्मणस्य मुखं क्षेत्रं १७ वैश्वदेवे तु सम्प्राप्ते १४ ब्रूहि धर्मं स्वरूपज्ञ ५ शातातपाच्च हारीताद् ४ मानुषाणा हितं धर्मं १ शिरो वेष्ट्य तु यो भुङ्क्ते १६ मृगपक्षि-निनादाढ्यं २ शुक्लवस्त्रं च यानं च १६ यतवे काञ्चनं दत्त्वा १६ शूद्रस्य द्विज-शुश्रूषा १७ यतिश्च ब्रह्मचारी च १४ श्रद्धया चाऽन्नदानेन १२ यतिहस्ते जलं दद्याद् १४ षट्कर्माभिरतो नित्यं १० यस्यच्छत्रं हयश्चैव १४ सन्ध्या स्नानं जपो होमो ११ युगे युगे च ये धर्मास्- ९ सीदन्ति चाऽग्निहोत्राणि ९ युगे युगे तु सामर्थ्यं ९ सुक्षेत्रे वापयेद् बीजं १३ लवणं मधु तैलं च १७ सुक्षेत्रे वापयेद् बीजं १७ * २. द्वितीयोऽध्याय अतः परं गृहस्थस्य १९ जप्यं देवार्चनं होमं २० अदाता कर्षकश्चैव २२ तं प्रवक्ष्याम्यहं पूर्वं १९ अयोमुखेन काष्ठेन २२ तिला रसा न विक्रेया २१ कर्षकः खलयज्ञेन २३ दानं दद्याच्च वै तेषां २२ क्षुधितं तृषितं श्रान्तं २० पञ्चसूना गृहस्थस्य २२ गृहस्थः प्रत्यहं कुर्यात् २३ ब्राह्मणश्चेत् कृषिं कुर्यात् २१ चतुर्गवं नृशंसानां २१ भवन्त्यल्पायुषस्ते वै २४

श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः

( १४३ ) श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः विप्राणां त्रिशकं भागं २३ स चौरः स च पापिष्ठी २३ वैश्यः शूद्रस्तथा कुर्यात् २४ स्थिराङ्गं नीरुजं दृप्तं २० षड्गवं तु त्रियामाहे २१ स्वयं कृष्टे तथा क्षेत्रे २० ३. तृतीयोऽध्यायः अतः शुद्धिं प्रवक्ष्यामि २४ त्रिरात्रे तु ततः पूर्णे ३५ अजा गावो महिष्यश्च २६ दन्तजातेऽनुजाते च २८ अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ३४ देवाङ्गना-सहस्राणि ३३ अनुगम्येच्छया प्रेतं ३४ देशान्तरं गतो विप्रः २७ अन्तरा तु दशाहस्य ३१ देशान्तरमृतः कश्चित् २७ असगोत्रमबन्धुं च ३४ द्वाविमौ पुरुषौ लोके ३२ आचतुर्थाद् भवेत् स्रावः २८ न तेषामशुभं किञ्चित् ३४ आजातदन्ता ये बाला २८ प्रसवे गृहमेधी तु ३० आदन्तजन्मनः सद्य २९ प्राप्नोति सूतकं गोत्रे २६ उद्यतो निधने दाने ३० प्रेतीभूतं तु यः शूद्रं ३५ उपासने तु विप्राणा- २५ ब्रह्मचारी गृहे तेषां २९ एकपिण्डास्तु दायादाः २६ ब्राह्मणार्थे विपन्नानां ३२ एकाहाच्छुद्ध्यते विप्रो २५ भृग्वग्निमरणे चैव २७ कृष्णाष्टमी त्वमावास्या २८ यत्र यत्र हतः शूरः ३२ क्षत्रियं मृतमज्ञानाद् ३५ यदि गर्भो विपद्येत २८ क्षत्रियो द्वादशाहेन २५ यदि पत्न्यां प्रसूतायां ३१ चतुर्थे दशरात्रं स्यात् २७ यस्तु भग्नेषु सैन्येषु ३२ जन्मकर्म-परिभ्रष्टः २६ यस्य छेदक्षतं गात्रं ३३ जाते विप्रो दशाहेन २५ ये यज्ञसङ्घस्तपसा च ३३ जितेन लभ्यते लक्ष्मी- ३३ ललाटदेशे रुधिरं स्रवञ्च ३४ तस्माद् द्विजो मृतं शूद्रं ३६ विनिर्वर्त्य यदा शूद्रा ३६

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ( १४४ ) श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः विवाहोत्सव-यज्ञेषु ३१ सम्पूर्काज्जायते दोषो ३१ शवं तद्वैश्यमज्ञानाद् ३५ सम्पर्काद् दुष्यते विप्रो २९ शिल्पिनः कारुका वैद्या २९ सर्वेषां शावमाशौचं ३० सैन्यस्तं ब्राह्मणं दृष्ट्वा ३२ सन्नतः सत्रपूतश्च ३० ४. चतुर्थोऽध्यायः अतिमानादतिक्रोधात् ३६ न कार्यमावसथ्येन ४१ अपृष्ट्वा चैव भर्तारं ४० नष्टे मृते प्रव्रजिते ४३ ऋतुस्नाता तु या नारी ३९ नाऽशौचं नोदकं नाऽग्नि ३७ ओध-वाताऽऽपहृतं बीजं ४१ पत्यौ जीवति या नारी ४० औरसः क्षेत्रजश्चैव ४१ परिवित्तिः परिवेत्ता ४२ कुब्ज-वामन-षण्ढेषु ४१ पितृव्यपुत्रः सापत्‍नः ४३ चतुर्थे दशरात्रं स्यात् ३९ पूय-शोणित-सम्पूर्णो ३६ ज्येष्ठो भ्राता यदा तिष्ठेद् ४३ बान्धवानां सजातीनां ४० तद्वत् परस्त्रियाः पुत्रौ ४१ मासाद्धं-मासमेकं वा ३८ तप्तकृच्छ्रेण शुद्धास्ते ३७ मृते भर्तरि या नारी ४३ तप्तकृच्छ्रेण शुद्ध्यन्ती ३७ यत्पापं ब्रह्महत्यायां ४० तिस्रः कोट्योऽर्द्धकोटी च ४४ यो वै समाचरेद् विप्रः ३८ त्रिरात्रं प्रथमे पक्षे ३८ व्यालग्राही यथा व्यालं ४४ त्र्यहमुष्णं पिबेद् वारि ३७ शुद्रव्यर्थमष्टमे चैव ३९ दरिद्रं व्याधितं धूतं ४० षट्पलं तु पिबेदम्भस्- ३८ द्वौ कृच्छ्रौ परिवित्तोस्तु ४२ संस्पृशन्ति तु ये विप्रा ३७ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ( १४५ ) ५. पञ्चमोऽध्यायः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः अग्निहोत्रोपकरणमशेषं ४९ दहेतं ब्राह्मणं विप्रो ४७ अन्यथा कुरुते कर्म ५० देहनाशमनुप्राप्तः ४७ अग्रतः सन्नतो वाऽपि ४५ प्राजापत्यं चरेत् पश्चात् ४७ असद्ब्राह्मणके ग्रामे ४६ वृक-श्वान-शृगालाद्यैः ४४ ईदृशं तु विधिं कुर्याद् ४९ वेद-विद्या-व्रतस्नातः ४५ एकविंशतिमूर्द्धन्यां ४८ शतं तु जघने दद्याद् ४८ कर्णे चोलूखलं दद्यात् ४९ शय्यां शिश्ने विनिःक्षिप्य ४८ कृष्णपक्षे यदा सोमो ४६ शुना घ्राताऽवलीढस्य ४६ कृष्णाजिनं समास्तीर्य ४८ शुना तु ब्राह्मणी दष्टा ४६ गवां शृङ्गोदकैः स्नानं ४५ श्रोत्रे च प्रोक्षणी दद्याद् ४९ चत्वारिंशच्छिरे दद्याद् ४८ सव्रतस्तु शुना दष्टो ४५ चाण्डालेन श्वपाकेन ४७ स्वेनाग्निना स्वमन्त्रेण ४७ दद्यात् पुत्रोऽथवा भ्राता ४९ ६. षष्ठोऽध्यायः अतः परं प्रवक्ष्यामि ५० कुरङ्गं वानरं सिंहं ५३ अतोऽन्यथा भवेद् दोषः ६३ कुर्याद् वाक्यं द्विजानां च ६४ अल्पं परित्यजेदन्नं ६८ कुर्वन्त्यनुग्रहं ये तु ६३ अविज्ञातस्तु चाण्डालो ५८ कुसुम्भ-गुड-कार्पास- ५९ उपवासो व्रतं होमो ६२ 'केनेदं शुद्धयते ? चे' ति ६६ एकैकं ग्रासमश्नीयाद् ५७ क्रौञ्च-सारस-हंसाश्च ५० एव चतुष्पदानां च ५३ क्षत्रियेणाऽपि वैश्येन ५४ एवं शुद्धस्ततः पश्चात् ५९ क्षत्रियोऽपि सुवर्णस्य ६१ कारण्डव-चकोराणां ५१ गजस्य च तुरङ्गस्य ५२ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ( १४६ ) श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः गवां मूत्र-पुरीषेण ६१ भावदुष्टं न भुञ्जीत ५९ गृध्र-श्येन-शशादोना- ५१ भुङ्क्तेऽज्ञानाद् द्विजश्रेष्ठः ५७ गृहस्याभ्यन्तरं गच्छेत् ६१ भेरुण्ड-चाष-भासांश्च ५२ चरेत् सान्तपनं विप्रः ५६ महत्कार्योपरोधेन ६३ चाण्डालं हतवान् कश्चिद् ५४ मुनिवक्त्रोद्गतान् धर्मान् ५८ चाण्डालं खात-वापीषु ५५ मृग-रोहिद्-वराहाणा- ५३ चाण्डालंघटसंस्थं तु ५६ यथा पराशरेणोक्तं ६६ चाण्डालदर्शने सद्यः ५५ यदि न क्षिपते तोयं ५६ चाण्डालभाण्डसंस्पृष्टं ५६ रजकी कर्मकारी च ६० चाण्डालैः सह सम्पर्कं ६० रसपूर्णं तु मृद्भाण्डं ६१ चाण्डालैः सह सुप्ते तु ५५ वल्गुली-टिट्टिभानां च ५१ चोराः श्वपाक-चाण्डाला ५४ विप्रसम्पादितं यस्य ६५ ज्ञात्वा तु निष्कृतिं कुर्यात् ६० विप्राणां वेदघोषेण ६७ ततो द्रोणाऽढकस्यान्नं ६६ वृक-काक-कपोतानां ५१ तदन्तरा स्पृशेच्चापः ६५ वृक-जम्बुक-ऋक्षाणां ५२ ते तस्य विघ्नकर्तारः ६३ वृथा तस्योपवासः स्यान्न ६४ तेषां वाक्योदकेनैव ६४ वेद-वेदाङ्गविद्-विप्रै- ६६ त्र्यहं भुञ्जीत दघ्ना च ५८ वैश्यं वा क्षत्रियं वाऽपि ५४ दध्ना च सर्पिषा चैव ५८ वैश्यं शूद्रं क्रियाऽऽसक्तं ५४ पुनर्लेपन-खातेन ६० शिल्पिन कारुकं शूद्रं ५३ प्रणम्य शिरसा ग्राह्य- ६२ शिशुमारं तथा गोधां ५२ वलाका-टिट्टीभौ वाऽपि ५१ शूद्राणां नोपवासः स्यात् ६२ ब्रह्मकूर्चोपवासेन ५७ श्वपाकं वाऽपि चाण्डालं ५५ ब्राह्मणस्य व्रणद्वारे ६१ श्वान-चाण्डालदृष्टौ च ६५ भस्मना तु भवेच्छुद्धि- ५९ सर्वं भवति निष्छिद्रं ६३ भाण्डस्थमन्त्यजानां तु ५६ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

( १४७ ) श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः सर्वदेवमयो विप्रः ६४ स्वमुच्छिष्टमसौ भुङ्क्ते ६५ सर्वान् कामानवाप्नोति ६३ स्वल्पमन्नं त्यजेद् विप्रः ६७ सुवर्णोदकमभ्युक्ष्य ६७ हत्वा मूषक-मार्जार- ५२ ० ७. सप्तमोऽध्यायः अथाऽतो द्रव्यसंशुद्धिः ६८ मधुपर्के च सोमे च ७६ अनुच्छिष्टेन शूद्रेण ७३ माता चैव पिता चैव ७० अष्टवर्षा भवेद् गौरी ६१ मारुतार्केण शुद्धयन्ति ७६ अस्तङ्गते यदा सूर्ये ७१ मार्जनाद् यज्ञपात्राणां ६८ आतुरे स्नान उत्पन्ने ७३ मृण्मये दहनाच्छुद्धि- ७५ आयसेष्वायसानां च ७४ मेध्याऽमेध्य स्पृशन्तोऽपि ७६ उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः ७३ यः करोत्येकरात्रेण ७० उद्धरेद् दीनमात्मानं ७८ यस्तां समुद्वहेत् कन्यां ७० एते सर्वेऽपि विप्राणां ७७ रक्षेदेव स्वदेहादि ७७ और्ण-नेत्रपटानां च ७५ रजसा शुद्धयते नारी ६९ गण्डूषं पादशौचं च ७४ रोगेण यद्रजः स्त्रीणा- ७२ गावाघ्रातानि कांस्यानि ७४ वापी-कूप-तडागेषु ६९ चरूणां च स्रुवाणां च ६९ विप्रस्य दक्षिणे कर्णे ७७ जातवेदं सुवर्णं च ७१ शोषयित्वाऽर्कतापेन ७५ तृणकाष्ठस्य रज्जूणा- ७५ साध्वाचारा न तावत् स्याद् ७२ पतितानां च सम्भाषे ७७ स्त्रियो वृद्धस्तथा बालाः ७७ प्रथमेऽहनि चाण्डाली ७३ स्नाता रजस्वला या तु ७२ प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे ७० स्पृष्ट्वा रजस्वला ७१ भस्मना शुद्धयते कांस्यं ७४ स्पृष्ट्वा रजस्वला ७१ भुक्तोच्छिष्ट तथा स्नेहं ७६ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ७१ मणिपात्राणि शङ्खंश्चेत् ७४ स्पृष्ट्वा रजस्वला ७२

श्लोकाः पृष्ठांकाः श्लोकाः पृष्ठांकाः

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( १४८ )

८. अष्टमोऽध्यायः

श्लोकाः पृष्ठांकाः श्लोकाः पृष्ठांकाः अज्ञातवा धर्मशास्त्राणि ८१ नैव गच्छति कर्तारं ८२ अत ऊर्ध्वं तु ये विप्राः ८३ पञ्चपूर्वं मया प्रोक्ताः ८३ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि ७९ पिबतीषु पिवेत्तोयं ८७ अनाहिताग्नयो येऽन्ये ८२ प्रमाणमार्गं मार्गन्तो ८१ अमेध्यानि तु सर्वाणि ८५ प्रायश्चित्तं सदा दद्याद् ८६ अव्रतानाममन्त्राणा- ८१ प्रायश्चित्तं प्रयच्छन्ति ८४ आत्मनो यदि वाऽन्येषां ८७ प्रायश्चित्तं समुत्पन्ने ८० उपस्थाय ततः शीघ्र- ८० प्रायश्चित्तं ततश्चीर्णे ८९ उष्णे वर्षति शीते वा ८७ ब्राह्मणांस्तानतिक्रम्य ८६ एकाहमेकभक्ताशी ८८ ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु ८९ कृत्वा पापं न गूहेत ७९ ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा ८७ गवां बन्धनयोक्त्रे षु ७८ मुनीनामात्मविद्यानां ८३ गायत्रीरहितो विप्रः ८५ यथा काष्ठमयी हस्ती ८३ नोवघस्याऽऽनुरूपेण ८८ यथाऽश्मनि स्थितं तोयं ८२ ग्रामस्थानं यथा शून्यं ८३ यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु ८४ चतुरहं त्वेकभक्ताशी ८८ यद् वदन्ति तमोमूढा ८१ चत्वारो वा त्रयो वाऽपि ८१ ये पठन्ति द्विजा वेदं ८४ चत्वारो वा त्रयो वाऽपि ८२ राज्ञश्चाऽनुमते स्थित्वा ८६ चातुर्वेद्योऽविकल्पी च ८५ वेद-वेदाङ्गविदुषा ७८ चित्रकर्म यथाऽनेक- ८४ संशये तु न भोक्तव्यं ७९ ते हि पापे कृते वैद्या ८० सचैलं वाग्यतः स्नात्वा ८० त्रिदिनं चैकभक्ताशी ८८ सद्यो निःसंशये पापे ७९ दिनद्वयं चैकभक्तो ८८ सम्प्रणीतः श्मशानेषु ८४ दुःशीलोऽपि द्विजः पूज्यो ८५ स-शिखं वपनं कृत्वा ८६ धर्मशास्त्ररथाऽऽरूढा ८५ सावित्र्याश्चाऽपि गायत्र्याः ८०

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ( १४९ ) ९. नवमोऽध्यायः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः अकृत्वा वपनं तेषां १०० त्रिसन्ध्यं स्नानमित्युक्तं १०१ अङ्गुष्ठमात्रस्थूलस्तु ९१ दण्डादूर्ध्वं यदन्येन ९० अतिदाहेऽतिवाहे च ९५ दहनात्तु विपद्येत ९५ अतिदाहे चरेत् पादं ९५ द्विगुणे व्रत आदिष्टे १०० अन्यत्राङ्कन-लक्ष्मभ्यां ९५ नदीषु सङ्गमे चैव १०१ आराधितस्तु यः कश्चिद् ९७ नदीष्वथ समुद्रेषु ९० एका चेद् बहुभिः काचिद् ९९ न नारिकेलैर्न च शाणबालैः ९६ एको हतो यैर्बहुभिः समेतै- ९९ न स्त्रियाः केशवपनं १०१ कामाऽकामकृतक्रोधौ ९१ निशि बन्धनिरुद्धेषु ९८ काष्ठ-लोष्ठक-पाषाणैः ९४ निष्पन्नसर्वगात्रैस्तु ९२ कुशैः काशैश्च बध्नीयाद् ९६ पञ्च सान्तपने गावः ९४ कूपखाते तटाबन्धे ९७ पादेऽङ्गरोमवपनं ९२ कूपखाते तथा खाते ९७ पादे वस्त्रयुगं चैव ९२ कूपादुक्रमणे चैव ९७ पाषाणेनाथ दण्डेन ९३ क्लीबा दुःखी च कुष्ठी च १०२ पिण्डस्ये पादमेकं तु ९२ गवां संरक्षणार्थाय ८९ प्रमापणे प्राणभृतां ९४ गृहेषु सततं तिष्ठेत् १०१ प्रायश्चित्तं तु तेनोक्त १०० गोपतिर्मृत्युमाप्नोति ९१ प्रेरयन् कूप वापीषु ९७ गो-वृषाणां विपत्तौ च ९९ बन्ध-पाश-सुगुप्ताङ्गो ९६ ग्रामघाते शरोघेण ९८ मूर्च्छितः पतितो वाऽपि ९१ ग्रासं वा यदि गृह्णीयात् ९२ यदि तत्र भवेत् काष्ठं ९६ ग्रासार्थं चोदितो वाऽपि १०० यद्यसम्पूर्णसर्वाङ्गो ९४ चरेत् सान्तपन काष्ठे ९४ यन्त्रिता गौश्चिकित्सार्थं ९८ तत्पापं तस्य तिष्ठेत् १०१ यावत्सम्पूर्ण-सर्वाङ्ग- ९३ तदेव बन्धनं विद्यात् ९१ योक्त्र-दामक-दौरैश्च ९० Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकः पृष्ठाङ्काः

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श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकः पृष्ठाङ्काः योक्त्रेषु तु त्रिपादं स्यात् ९० शृङ्गभङ्गेऽस्थि-भङ्गे च ९३ रोधनं बन्धनं चैव ९५ संग्रामे प्रहतानां च ९८ रोध-बन्धन-योक्त्राणि ९० स न्याति नरकं घोरं १०२ लाङ्गुले पादकृच्छ्रं तु ९३ सर्वान् केशान् समुद्धृत्य १०१ वेश्मद्वारे निवासेषु ९८ स्त्री-बाल भृत्य-गो-विप्रेषु १०२ व्यापन्नानां बहूनां च ९९ हते तु रुधिरं दृश्यं १०० व्रण भङ्गे च कर्तव्यः ९३

१०. दशमोऽध्यायः इतरेषामहोरात्रं १११ जप-होम-दया-दानैः १११ उल्लिख्य तद्गृहं पश्चात् ११० जारेण जनयेद् गर्भं १०९ एकैकं ह्रासयेद् ग्रासं १०३ तत्र स्थित्वा निराहारा १०६ एतास्तु मोहितो गत्वा १०५ त्रिरात्रमुपवासित्वा १०६ कामान्मोहात्तु या गच्छेत् १०९ दशगोमिथुनं दद्याच्छुद्धि १०५ कुक्कुटाण्डप्रमाणं तु १०३ दशमे तु दिने प्राप्ते १०९ कृत्वा सान्तपनं कृच्छ्रं १०८ न प्रदुष्यन्ति दर्भाश्च १११ खरी च सूकरीं गत्वा १०५ पतिताद्धं शरीरस्य १०८ गायत्रीं च जपेन्नित्यं १०४ पुंसो यदि गृहे गच्छेत् ११० गुरुपत्नीं स्नुषां चैव १०५ प्राजापत्यं चरेत् कृच्छ्रं १०४ गोद्वयं दक्षिणां दत्वा १०५ प्राजापत्यद्वयं कुर्याद् १०४ गोद्वयं दक्षिणां दद्यात् १०४ प्राजापत्येन शुद्धयेत १०८ गोद्वयं दक्षिणां दद्यात् १०७ प्रायश्चित्तं चरेद् विप्रो १११ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं १०८ प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे १०३ चाण्डालीं वा श्वपाकीं वा १०३ बन्दिग्राहे भयार्त्ता वा १०६ चातुर्वर्ण्येषु सर्वेषु १०२ ब्राह्मणी तु यदा गच्छेत् १०९

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श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः ब्राह्मणी तु यदा गच्छेत् ११० विप्रान् दश परान् कृत्वा १०६ भर्ता चैव चरेत् कृच्छ्रं ११० व्रतं चरति तद्यावत् १०७ मंद-मोहगता नारो १०९ सम्भावांश्चोधयेत् सर्वान् ११० महिष्युष्ट्री-खरीगामी १०६ स शिखं वपनं कृत्वा १०३ मातृष्वसृगमे चैव १०५ सुवर्णं पञ्चगव्यं च १०७ यथा भूमिस्तथा नारी १०८

११. एकादशोऽध्यायः

अज्ञानाद् भुञ्जते विप्राः ११५ क्षीरं सप्तपलं दद्याद् ११८ अतिकृच्छ्रं च रुधिरे १२३ गायत्र्यष्टसहस्रेण ११५ अपचस्य च भुक्त्वाऽन्नं १२२ गायत्र्याऽऽदाय गोमूत्रं ११९ अमेध्य-रेतो गोमांसं ११२ गोमूत्रं कृष्णवर्णायाः ११८ आपत्कालेषु विप्रेण ११६ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं ११८ आपो हिष्ठेति चाऽऽलोड्य ११९ घृत तैलं तथा क्षीरं ११४ उद्धृत्य प्रणवेनैव १२० तथैव क्षत्रियो वैश्यो ११२ उष्ट्रीक्षीरमविक्षीर- ११४ तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं ११९ ऋषिभिर्धर्मतत्त्वज्ञ १२३ तेषां निन्दा न कर्तव्या १२३ एकपङ्क्त्युपविष्टानां ११३ त्रिरात्रमुपवासी स्याद् १२४ एकाहेन तु वैश्यस्तु १२२ दशसाहस्रमभ्यस्ता १२४ एताभिश्चैव होतव्यं १२० दाता प्रतिग्रहीता च १२२ एतैरुद्धृत्य होतव्यं १२० दास-नापित-गोपाल- ११६ कपिलायाः घृतं ग्राह्यं ११८ द्विज-शुश्रूषणस्तान् ११५ कूपे च पतितां दृष्ट्वा १२१ नारं तु कुणपं काकं १२१ क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां ११७ पञ्चगव्यं पिबेच्छूद्रो ११२ क्षत्रियाश्चाऽपि वैश्यश्च ११४ परपाकनिवृत्तोऽसौ १२२ क्षत्रियोऽप्यभोज्यं भुक्त्वा ११३ पिबतः पतितं तोयं १२१

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ( १५२ ) श्लोकाः पृष्ठांकाः श्लोकाः पृष्ठांकाः पीयूष श्वेत-लशुनं ११४ वहणश्चैव गोमूत्रे १२१ प्रायश्चित्तं भवेत् पुंसः १२२ विवादेनापि निर्जित्य १२३ बालै-र्नकुल-मार्जारै- ११३ वैयाघ्रमाक्षं सैहं वा १२१ ब्रह्मकूर्चो दहेत् सर्वं १२० वैश्यकन्यासमुद्भूतो ११७ ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः ११७ शुष्कान्नं गोरसं स्नेहं ११६ ब्राह्मणस्य यदा भुङ्क्ते ११५ शूद्रकन्यासमुत्पन्नो ११७ भाण्डस्थितमभोज्येषु ११७ शूद्राणां नोपवासः स्यात् ११८ मण्डूकं भक्षयित्वा तु ११४ शूद्रान्नं सूतकान्नं च ११२ मद्य-मांसरतं नित्यं ११५ सततं गृहस्थधर्मो यो १२३ मोहाद् भुङ्क्षी यस्तत्र ११३ स्नात्वा तिष्ठन्नहः शेष- १२३ यदि भुक्तं तु विप्रेण ११३ १२. द्वादशोऽध्यायः अग्निकार्यात् परिभ्रष्टाः १३० एतत् पाराशरं शास्त्रं १४० अग्निचित्कपिला सत्री १३३ कामतस्तु कृतं यत्स्यात् १३९ अजिनं मेखला दण्डो १२५ कुटुम्बिने दरिद्राय १३४ अज्ञानात् प्राश्य विण्मूत्रं १२५ कुशैः पूतं भवेत् स्नानं १३० अनडुत्संहितां गां च १३९ कृच्छ्रे देव्ययुतं चैव १३६ अरणि कृष्णमार्जारं १३३ क्षुते निष्ठीवने चैव १२८ अर्द्धे भुक्ते तु यो विप्रः १३२ खलयज्ञे विवाहे च १२९ अवधूनोति च यः केशान् १२७ गवां चैवाऽनुगमनं १४० अष्टादशदिनादर्वाक् १३४ गवां शतं सैकवृष १३३ अस्थिसञ्चयनात् पूर्वं १२९ गृध्रो द्वादश जन्मानि १३१ अस्नात्वा नैव भुञ्जीत १३२ गृहद्वारेषु तिष्ठामि १३७ आग्नेय भस्मना स्नान- १२६ गृहस्थस्तु दयायुक्तो १३२ उपस्पृशेत् त्रिषवणं १३५ गोद्वयं दक्षिणां दद्यात् १२६ ऊर्ध्वोच्छिष्टमधोच्छिष्ट- १३६ चैत्यवृक्षश्चितियूप- १२९ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

( १५३ ) श्लोकाः पृष्ठांकाः श्लोकाः पृष्ठांकाः जलाग्निपतने चैव १२५ यजेत वाऽश्वमेधेन १३८ जले स्थलस्थो नाऽऽचा- १२८ यत्तु सातपवर्षेण १२६ ततः सन्निधिमात्रेण १३४ ययाऽध्ययनकर्माणि १४० तपोवनेषु तीर्थेषु १३७ यस्तु क्रुद्धः पुमान् ब्रूयात् १३५ तस्माद् वृषलभीतेन १३० युगं युगद्वयं चैव १३४ दक्षिणार्थं तु यो विप्रः १३१ रोमकूपेष्ववस्थाप्य १२७ दशयोजनविस्तीर्णं १३८ वर्जयित्वा विकर्मस्थान् १३७ दुःस्वप्नं यदि पश्येद् १२४ विण्मूत्रभोजी शुद्धयर्थं १२५ दुराचारस्य विप्रस्य १३५ विद्यमानेषु हस्तेषु १३५ द्वियोजने तीर्थयात्रा १३६ विन्ध्यादुत्तरतो यस्य १३८ निराशास्ते निवर्त्तन्ते १२७ वापी-कूप-तडागाद्यै- १३४ न्यायोपार्जितवित्तेन १३३ शिरः प्रावृत्य कण्ठं वा १२७ पराशरमतं तस्य १३८ शूद्रान्नं शूद्रसम्पर्कः १३० पुत्रजन्मनि यज्ञे च १२९ शूद्रान्न-रस-पुष्टस्य १३० प्राजापत्यद्वयेनैव १२५ श्रान्तः क्रुद्धस्तमोऽन्धो १३५ ब्रह्महत्यादिभिर्मर्त्यो १३३ संक्रामन्ति हि पापानि १३९ ब्राह्मणस्य प्रवक्ष्यामि १२५ सदाचारस्य विप्रस्य १३६ ब्राह्मणानां प्रसादेन १३८ स पावयेदथात्मान- १२० भास्करस्य करैः पूतं १२८ सपुत्रः सह भृत्यैश्च १३८ भुञ्जानेषु तु विप्रेषु १३२ समुद्रसेतुगमनं १३७ भोजनेषु च तिष्ठत्सु १३२ सर्वं गङ्गासमं तोयं १३० मद्यपश्च द्विजः कुर्यान् १३८ सहस्रं तु जपेद् देव्याः १३७ मरुतो वसवो रुद्रा १२८ सेतुं दृष्ट्वा समुद्रस्य १३८ महानिशा तु विज्ञेया १२१ स्नातुं यान्तं द्विजं सर्वे १२६ मृत-सूतक-पुष्टाङ्गा १३१ स्नात्वा पीत्वा क्षुते सुप्ते १२८ मौनव्रतं समाश्रित्य १३१ स्नानानि पञ्च पुण्यानि १२६ यः शूद्रया पाचयेन्नित्यं १३१ इति श्लोकानुक्रमणिका समाप्ता ● ●

शास्त्रिकृत, संशोधित-सम्पादित, अनुवादित, शुद्धातिशुद्ध,

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काशी के ख्याति-प्राप्त विद्वान् आचार्य पण्डित श्री शिवदत्तमिश्र- शास्त्रिकृत, संशोधित-सम्पादित, अनुवादित, शुद्धातिशुद्ध, समस्त विद्वानों एवं सम्मानित धर्माचार्यों-द्वारा मुक्तकण्ठ से प्रशंसित, सर्वश्रेष्ठ, महत्त्वपूर्ण कृतियाँ १. बृहत्स्तोत्ररत्नाकर [ स्तोत्र सं० ४४२ ] — १८.०० २. गायत्री-रहस्य अथवा गायत्री पञ्चाङ्ग — ‘शिवदत्ती’ भा. टी. १४.०० ३. पाराशरस्मृति — ‘शिवदत्ती’ भाषा टीका ८.०० ४. वाञ्छाकल्पलता — ‘जयन्ती’ भाषा टीका ६ ०० ५. बगलोपासनपद्धति अर्थात् बगलापञ्चाङ्ग-‘शिवदत्ती’ भा.टी. १०.०० ६. अन्नपूर्णव्रतकथा — ‘सावित्री’ भाषा टीका २.०० ७. संकटास्तुति — ‘सङ्कटाप्रिया’ हिन्दी टीका सहित २.०० ८. सूक्त संग्रह-कनकधारास्तोत्र-गणेशाथर्वशीर्ष-देव्यपराधक्षमापनसहित २.०० ९. दुर्गाकवच — ‘पुष्पा’भिध’ भाषाटीका १.५० १०. गङ्गालहरी — ‘शिवदत्ती’ भाषाटीका १.०० ११. प्रत्यङ्गिरास्तोत्र — ‘शिवदत्ती’ भाषाटीका १.२० १२. विपरीत प्रत्यङ्गिरास्तोत्र — ‘शिवदत्ती’ भाषाटीका १.२० १३. लक्ष्मीनारायणहृदय — लक्ष्मीलहरी सहित : भाषाटीका १.०० १४. ऋणमोचन मंगलस्तोत्र — ‘शिवदत्ती’ भाषाटीका १.५० १५. संकटाव्रतकथा — राष्ट्रभाषा हिन्दी में - स्तुतिसहित १.०० १६. अन्नपूर्णस्तोत्र — कवचसहित ०.३० १७. नारायणकवच — ‘द्रौपदी’ भाषाटीका ०.६० १८. लांगूलास्त्र शत्रुञ्जय-हनुमत्स्तोत्र — ‘शिवत्त’ भाषाटीका ०.८० १९. पुरुषसूक्त' श्रीसूक्त' च — लक्ष्मीसूक्त सहित ०.३० २०. शनिस्तोत्र — ‘शिवदत्ती’ भाषाटीका ०.८० २१. आदित्यहृदयस्तोत्र — नवग्रहस्तोत्र सहित ०.३० पुस्तक-प्राप्ति-स्थान : ठाकुरप्रसाद ऐण्ड सन्स बुकसेलर राजादरवाजा, वाराणसी-१ मुद्रक—स्वतन्त्र भारत प्रेस, हड़हा, वाराणसी

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