पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 151, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३९ चान्द्रायण करने का विधान है। इसके बाद ब्राह्मण भोजन कराकर ॥७३॥ अनुडुत्सहितां गां च दद्याद् विप्रेषु दक्षिणाम् । सुरापानं सकृत्कृत्वा अग्निवर्णां सुरां पिवेत् ॥७४॥ ब्राह्मण को दक्षिणास्वरूप एक बैल और गौ का दान करना चाहिए। जो एक बार मदिरापान करे या अग्नि के समान तप्त सुरापान करके मृत्यु को प्राप्त हो जाय ॥७४॥ स पावयेदथात्मानमिह लोके परत्र च। अपहृत्य सुवर्णं तु ब्राह्मणस्य ततः स्वयम् ॥७५॥ तो वह व्यक्ति इस लोक तथा परलोक दोनों में अपनी आत्मा को शुद्ध कर लेता है। ब्राह्मण का स्वर्ण चोरी करनेवाले को स्वयं ही ।७५। गच्छेन्मुसलमादाय राजाभ्याशं^२ वधाय तु। हतः शुद्धिमवाप्नोति राज्ञाऽसौ मुक्त एव च ॥७६॥ अपने वध के लिए हाथ में मूसल धारण कर राजा के पास जाना चाहिए। चोर के द्वारा अपने वध का निवेदन करने पर यदि उसे राजा मार डाले या छोड़ दे तो भी वह अपने किये हुए पापों से मुक्त हो जाता है ॥७६॥ कामतस्तु कृतं यत्स्यान्नाऽन्यथा वधमर्हति । आसनाच्छयनाद्यानात् सम्भाषात् सहभोजनात् ॥७७॥ जान-बूझकर ब्राह्मण का स्वर्ण चुरानेवाले का वध करना विहित है, अन्यथा वह वध के अयोग्य होता है। एक साथ बैठने, सोने, एक ही वाहन पर सवारी करने, बोलने और एक साथ बैठकर भोजन करने से ॥७७॥ संक्रामन्ति^३ हि पापानि तैलविन्दुरिवाऽम्भसि । १. 'पावयेदिहात्मानमिह' । २. 'राजानं स्ववधाय' इति । 'न्तीह' इति !