भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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१३८ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो- सेतुं दृष्ट्वा समुद्रस्य ब्रह्महत्यां व्यपोहति । सेतुं दृष्ट्वा विशुद्धात्मा त्ववगाहेत सागरम् ॥६८॥ उस समुद्र सेतु को देखकर मनुष्य ब्रह्महत्यादि पापों से रहित हो जाता है । सेतुदर्शन से शुद्ध शरीर को प्राप्त करके समुद्र में स्नान करना चाहिए ॥६८॥ यजेत वाऽश्वमेधेन राजा तु पृथिवीपतिः । पुनः प्रत्यागतो वेश्म वासार्थमुपसर्पति ॥६९॥ पृथिवीपति राजा को ब्रह्महत्यादि से मुक्त होने के निमित्त अश्वमेध यज्ञ और निज गृह में वास करना उचित है ॥६९॥ सपुत्रः सह १भृत्यैश्च कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् । गाश्चैवैकशतं दद्याच्चातुर्विद्येषु दक्षिणाम् ॥७०॥ पुत्र, पत्नी, सेवक तथा ब्राह्मणों को भोजन करावे और चारों वेद के ज्ञाता ब्राह्मण को दक्षिणा में एक सौ गायों का दान करे ॥७०॥ ब्राह्मणानां प्रसादेन ब्रह्महा तु विमुच्यते । विन्ध्यादुत्तरतो यस्य २निवासः परिकीर्तितः ॥७१॥ ब्राह्मणों की प्रसन्नता से ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध हो जाता है । विन्ध्य पर्वतमाला के उत्तरी भाग में रहनेवालों के लिए ही ॥७१॥ पराशरमतं तस्य सेतुबन्धस्य दर्शनम् । सवनस्थां स्त्रियं हत्वा ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ॥७२॥ पराशर के मत से सेतुबन्ध दर्शनका विधान है। सोमयाग करनेवाली स्त्री का वध करने से ब्रह्महत्या के समान ही व्रत करना चाहिए ॥७२॥ मद्यपञ्च द्विजः कुर्यान्नदीं गत्वा समुद्रगाम् । चान्द्रायणे ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ॥७३॥ सुरापान करनेवाले ब्राह्मण को भी ब्रह्महत्या का व्रत करना उचित है और समुद्र में मिलनेवाली नदियों में स्नान करने के पश्चात् १. ‘भृत्यश्च’ । २. ‘संवासः’ । ३. ‘सुरापश्च’ ।