पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 141, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १२९ खलयज्ञे विवाहे च संक्रान्तौ ग्रहणे तथा । सर्व्वयां दानमस्त्येव नाऽन्यत्रैवं १ विधीयते ॥२२॥ खलिहान, विवाह, संक्रान्ति और ग्रहण काल में ही दान किया जाना उचित है अन्यथा रात्रिकालीन दान वर्जित है ॥२२॥ पुत्रजन्मनि यज्ञे च तथा चाऽत्ययकर्मणि । राहोश्च दर्शने दानं प्रशस्तं नाऽन्यदा निशि ॥२३॥ पुत्रोत्पत्ति, यज्ञ, मरण और ग्रहण के समय रात्रि में किया जाने- वाला दान फलदायक कहा है । इसके अतिरिक्त और किसी भी समय रात्रि में दान नहीं करना चाहिए ॥२३॥ महानिशा तु विज्ञेया मध्यस्थं प्रहरद्वयम् । प्रदोष-पश्चिमौ यामौ दिनवत् स्नानमाचरेत् ॥२४॥ रात्रि के मध्यकाल में दो पहर का समय महानिशा होती है और सन्ध्या के पहले तथा पिछले प्रहर की रात में दिन के समान ही स्नान किया जा सकता है ॥२४॥ चैत्यवृक्षश्चितियू २ पश्चाण्डालः सोमविक्रयी । एतांस्तु ब्राह्मणः स्पृष्ट्वा सवासा जलमाविशेत् ॥२५॥ श्मशान के वृक्ष, श्मशान का खम्भा, चाण्डाल या सोमलता के विक्रेता का यदि कोई ब्राह्मण स्पर्श कर ले तो उसे विवस्त्र (वस्त्र-सहित) होकर जल में स्नान करना चाहिए ॥२५॥ अस्थिसञ्चयनात् पूर्व्वं रुदित्वा स्नानमाचरेत् । अन्तर्दशाहे विप्रस्य ह्यूर्ध्वमाचमनं स्मृतम् ॥२६॥ अस्थिसंचय (मरने के पश्चात् चार दिन) के पूर्व रुदन करनेवाला ब्राह्मण स्नान के द्वारा शुद्ध हो जाता है । और यदि दस दिन के अन्दर रुदन करे तो आचमन से ही शुद्धि मिल जाती है ॥२६॥ १. ‘तु’ इति । २. ‘पूयश्चण्डालः’ इति । ९