भारतकोश
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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १२९ खलयज्ञे विवाहे च संक्रान्तौ ग्रहणे तथा । सर्व्वयां दानमस्त्येव नाऽन्यत्रैवं १ विधीयते ॥२२॥ खलिहान, विवाह, संक्रान्ति और ग्रहण काल में ही दान किया जाना उचित है अन्यथा रात्रिकालीन दान वर्जित है ॥२२॥ पुत्रजन्मनि यज्ञे च तथा चाऽत्ययकर्मणि । राहोश्च दर्शने दानं प्रशस्तं नाऽन्यदा निशि ॥२३॥ पुत्रोत्पत्ति, यज्ञ, मरण और ग्रहण के समय रात्रि में किया जाने- वाला दान फलदायक कहा है । इसके अतिरिक्त और किसी भी समय रात्रि में दान नहीं करना चाहिए ॥२३॥ महानिशा तु विज्ञेया मध्यस्थं प्रहरद्वयम् । प्रदोष-पश्चिमौ यामौ दिनवत् स्नानमाचरेत् ॥२४॥ रात्रि के मध्यकाल में दो पहर का समय महानिशा होती है और सन्ध्या के पहले तथा पिछले प्रहर की रात में दिन के समान ही स्नान किया जा सकता है ॥२४॥ चैत्यवृक्षश्चितियू २ पश्चाण्डालः सोमविक्रयी । एतांस्तु ब्राह्मणः स्पृष्ट्वा सवासा जलमाविशेत् ॥२५॥ श्मशान के वृक्ष, श्मशान का खम्भा, चाण्डाल या सोमलता के विक्रेता का यदि कोई ब्राह्मण स्पर्श कर ले तो उसे विवस्त्र (वस्त्र-सहित) होकर जल में स्नान करना चाहिए ॥२५॥ अस्थिसञ्चयनात् पूर्व्वं रुदित्वा स्नानमाचरेत् । अन्तर्दशाहे विप्रस्य ह्यूर्ध्वमाचमनं स्मृतम् ॥२६॥ अस्थिसंचय (मरने के पश्चात् चार दिन) के पूर्व रुदन करनेवाला ब्राह्मण स्नान के द्वारा शुद्ध हो जाता है । और यदि दस दिन के अन्दर रुदन करे तो आचमन से ही शुद्धि मिल जाती है ॥२६॥ १. ‘तु’ इति । २. ‘पूयश्चण्डालः’ इति । ९

१३० पराशरस्मृतिः [ द्वादशो- सर्वं गङ्गासमं तोयं राहुग्रस्ते दिवाकरे । सोमग्रस्ते तथैवोक्तं स्नान-दानादि कर्मसु ॥२७॥ सूर्य या चन्द्रग्रहण के समय दानादि के रूप में मिलनेवाला पदार्थ गङ्गाजल के समान फलदायी होता है ॥२७॥ कुशैः पूतं भवेत् स्नानं कुशेनोपस्पृशेद् द्विजः । कुशेन चोद्धृतं तोयं सोमपानसमं भवेत् ॥२८॥ कुश के द्वारा किया जानेवाला स्नान पवित्र होता है। ब्राह्मण को कुश लेकर ही आचमन करना चाहिए। कुश के साथ जो जल उठाया जाता है, वह जल सोमपान के सदृश अत्यन्त पुनीत होता है ॥२८॥ अग्निकार्यात् परिभ्रष्टाः सन्ध्योपासनवर्जिताः । वेदं चौवाऽनधीयानाः सर्वे ते वृषलाः स्मृताः ॥२९॥ अग्निहोत्र से च्युत, सन्ध्या-वन्दन से रहित और वेदपाठ से विमुख होनेवाला ब्राह्मण शूद्र के समान कहा गया है ॥२९॥ तस्माद् वृषलभीतेन ब्राह्मणेन विशेषतः । अध्येतव्योऽप्येकदेशो यदि सर्वं न शक्यते ॥३०॥ इसलिए ब्राह्मण को चाहिए कि यदि वेद का सम्पूर्ण भाग न पढ़ सके तो उसके एक भाग का ही पाठ कर ले ॥३०॥ शूद्रान्न-रस-पुष्टस्याऽप्यधीयानस्य^१ नित्यशः । जपतो जुह्वतो वाऽपि गतिरूर्ध्वा न विद्यते ॥३१॥ शूद्र के अन्न और रस से पलनेवाले वेदाध्ययन, जप और हवन के द्वारा भी सद्गति प्राप्त नहीं कर सकते ॥३१॥ शूद्रान्नं शूद्रसम्पर्कः शूद्रेण तु सहासनम् । शूद्राज्ज्ञानाऽऽगमश्चैव^२ ज्वलन्तमपि पातयेत् ॥३२॥ अग्नि के समान तेजस्वी ब्राह्मण भी शूद्र का अन्न ग्रहण करते, १. 'धीयमानस्य' इति । २. '-श्चापि' इति ।

ऽध्याय ] भाषाटीकासहिता १३१ उनके साथ मेल-जोल बढ़ाने, उठने-बैठने और उनके उपदेश को सुनने से पतित हो जाते हैं ॥३२॥ यः शूद्रया पाचयेन्नित्यं शूद्री च गृहमेधिनी । वर्जितः पितृ-देवेभ्यो रौरवं याति स द्विजः ॥३३॥ जिस ब्राह्मण को रसोई शूद्र जाति की स्त्री बनाती है, ब्राह्मण की पत्नी बनकर घर में रहती है तथा जो ब्राह्मण देव-पितृ कार्य से पराङ्मुख है, उस ब्राह्मण को रौरव नरक में वास करना पड़ता है ॥३३॥ मृत-सूतक-पुष्टाङ्गो द्विज शूद्रान्नभोजनः । अहं तन्न विजानामि कां कां योनिं गमिष्यति ? ॥३४॥ सूतक लगने के कारण अशौचप्राप्त व्यक्ति का अन्न खाने तथा शूद्र का भोजन ग्रहण करनेवाले ब्राह्मण को किन-किन योनियों में भ्रमण करना पड़ेगा, इस बात को हम नहीं बतला सकते ॥३४॥ गृध्रो द्वादश जन्मानि दश जन्मानि शूकरः । श्वयोनौ सप्त जन्मानि इत्येवं मनुरब्रवीत् ॥३५॥ मनु ने कहा है कि ऐसा ब्राह्मण बारह जन्म तक गीध, दस जन्म तक सूअर और सात जन्म तक कुत्ते की योनि में रहता है ॥३५॥ दक्षिणार्थं तु यो विप्रः शूद्रस्य जुहुयाद् हविः । ब्राह्मणस्तु भवेच्छूद्रः शूद्रस्तु ब्राह्मणो भवेत् ॥३६॥ शूद्र के यज्ञ में जो ब्राह्मण शूद्र द्वारा पाचित खीर अग्नि में हवन करता है, तो दक्षिणा-लोलुप ऐसा ब्राह्मण शूद्रत्व को प्राप्त होता है और वह शूद्र ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है ॥३६॥ मौनव्रतं समाश्रित्य आसीनो न वदेद् द्विजः । भुञ्जानो हि वदेद् यस्तु तदन्नं परिवर्जयेत् ॥३७॥ १. 'मृतसूतकपुष्टाङ्गं द्विजं शूद्रान्नभोजिनम्' इति द्वितीयान्तपदयुक्तोऽपि पाठः क्वचित्पुस्तके दृश्यते । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

१३२ पराशरस्मृतिः [ द्वादशो- मौन होकर भोजन करनेवाला व्यक्ति यदि असावधानी के कारण कदाचित् बोल दे, तो उसे अवशिष्ट अन्न को त्याग देना चाहिए ॥३७॥ १अर्द्धं भुक्ते तु यो विप्रस्तस्मिन् पात्रे जलं पिबेत् । हतं दैवं च पित्र्यं च आत्मानं चैवं² घातयेत् ॥३८॥ जो ब्राह्मण आधा भोजन करते ही उसी भोजनपात्र में जल पी ले तो वह ब्राह्मण देव-पितृ कार्य के अतिरिक्त अपनी आत्मा का भी हनन कर लेता है ॥३८॥ भुञ्जानेषु तु विप्रेषु योऽग्रे पात्रं विमुञ्चति । स मूढः स च पापिष्ठो ब्रह्मघ्नः स खलूच्यते ॥३९॥ ब्राह्मणों के भोजन करते समय जो व्यक्ति सबसे पहले भोजन छोड़- कर उठ जाता है वह मूर्ख, पापी और ब्रह्मघाती होता है ॥३९॥ भोजनेषु च तिष्ठत्सु स्वस्ति कुर्वन्ति ये द्विजाः । न देवास्तृप्तिमायान्ति निराशाः पितरस्तथा ॥४०॥ भोजन का पत्तल उठने से पहले ही ब्राह्मण लोग यदि स्वस्तिवाचन कर दें तो देवता अतृप्त रह जाते और पितृ-गण निराश हो जाते हैं ॥४०॥ ३अस्नात्वा नैव भुञ्जीत अजप्त्वाऽग्निमहूय च । ४पर्णपृष्ठे न भुञ्जीत रात्रौ दीपं विना तथा ॥४१॥ स्नान, जप और अग्निहोत्र के बिना भोजन नहीं करना चाहिए । पत्तल को उलटा रखकर भी भोजन न करे और रात्रि को बिना दीपक अर्थात् अँधेरे में भोजन करना उचित नहीं है ॥४१॥ गृहस्थस्तु दयायुक्तो धर्ममेवाऽनुचिन्तयेत् । पोष्यवर्गार्थसिद्ध्यर्थं न्यायवर्ती ५सुबुद्धिमान् ॥४२॥ १. 'अर्द्धभुक्त' इति । २. 'चोपघातयेत्' इति । ३. 'अस्नात्वा वै न भुञ्जीत तथैवाऽग्निमपूज्य च' इति । ४. 'न पर्णपृष्ठे' इति । ५. 'स बुद्धिमान्' इति ।

अध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३३

CC-0. In Public Domain, Digitization by eGangotri अध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३३ दयायुक्त होकर धर्मचिन्तन करने और अपने आश्रितों के भरण- पोषण के लिए नीतिपूर्वक आचरण करनेवाला गृहस्थ ही बुद्धिमान समझा जाता है ॥४२॥ न्यायोपार्जितवित्तेन कर्त्तव्यं ह्यात्मरक्षणम् । अन्यायेन तु यो जीवेत् सर्वकर्मबहिष्कृतः ॥४३॥ न्यायपूर्वक उपार्जित धन से आत्मरक्षा करना उचित है । इसके विपरीत अन्याय द्वारा अर्जित धन सभी शुभ कर्मों का नाशक होता है ॥४३॥ अग्निचित्कपिला सत्री राजा भिक्षुर्महोदधिः । दृष्टमात्राः पुनन्त्येते तस्मात् पश्येत्तु नित्यशः ॥४४॥ अग्निहोत्री, इष्ट का चयनकर्ता, कपिला गौ, यज्ञकर्ता, राजा, संन्यासी और समुद्र के दर्शन मात्र से मनुष्य शुद्धता को प्राप्त होता है । इसलिए उपर्युक्त का दर्शन प्रतिदिन ही करना चाहिए ॥४४॥ अरणिं कृष्णमार्जारं चन्दनं सुमणिं घृतम् । तिलान् कृष्णाऽजिनं छागं गृहे चैतानि रक्षयेत् ॥४५॥ अपने घर में अग्निमन्थन दण्ड, काली बिल्ली, चन्दन, श्रेष्ठ मणि, घी, तिल, काले मृग का चर्म और बकरे को रखना चाहिए ॥४५॥ गवां शतं सैकवृषं यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितम् । तत्क्षेत्रं दशगुणितं ‘गोचर्म’ परिकीर्तितम् ॥४६॥ भूमि की जितना दूरी में सौ गायें और एक बैल खड़ा हो उससे दसगुनी विस्तृत भूमि को ‘गोचर्म’ कहते हैं ॥४६॥ ब्रह्महत्यादिभिर्मर्त्यो मनो-वाक्काय कर्मजैः । एतद् गोचर्मदानेन मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥४७॥ इस गोचर्म भूमि का दान करनेवाला व्यक्ति कायिक, वाचिक, मानसिक और ब्रह्महत्यादि पापों से मुक्त हो जाता है ॥४७॥ १. ‘कर्मभिः’ इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १३४ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो- कुटुम्बिने दरिद्राय श्रोत्रियाय विशेषतः । यद्दानं दीयते तस्मै तद्दानं शुभकारकम् ॥४८॥ कुटुम्बी, दरिद्री और विशेषतः वेदपाठी ब्राह्मण को दिया जानेवाला दान शुभ फलदायक कहा गया है । ४८॥ वापी कूप-तडागाद्यैर्वाजपेय-शतैर्मखैः । गवां कोटिप्रदानेन भूमिहर्त्ता न शुद्ध्यति ॥४९॥ किसी की भूमि का हरण करनेवाला व्यक्ति सैकड़ों वापी, कूप, तालाव आदि का निर्माण कराने, सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करने तथा करोड़ों गायें दान करने पर भी पापरहित होकर शुद्ध नहीं हाता ॥४९॥ अष्टादशदिनादर्वाक् स्नानमेव रजस्वला । अत ऊर्ध्वं त्रिरात्रं स्यादुशना मुनिरब्रवीत् ॥५०॥ उशना मुनि का कथन है कि यदि स्त्री अठारह दिन के अन्दर ही रजस्वला हो जाती हो तो वह तीन दिनों तक अशुद्ध रहती है ॥५०॥ युगं युगद्वयं चैव त्रियुगं च चतुर्युगम् । चाण्डाल-सूतिकोदक्या-पतितानामधःक्रमात् ॥५१॥ पतिता स्त्री से चार हाथ, रजस्वला से आठ हाथ, प्रसूता से बारह हाथ तथा चाण्डालिनी से सोलह हाथ की दूरी पर रहना चाहिए ।५१। ततः सन्निधिमात्रेण स-चैलं स्नानमाचरेत् । स्नात्वाऽवलोकयेत् सूर्यमज्ञानात् स्पृशते यदि ॥५२॥ यदि उपर्युक्त रूप से वर्णित दायरे के निकट वे आ जायें तो वस्त्र सहित स्नान कर डालना चाहिए । यदि अज्ञानवश इन्हें स्पर्श कर ले तो स्नान के बाद सूर्य का दर्शन करना चाहिए । ज्ञान द्वारा स्पर्श करने पर आठ हजार गायत्री मन्त्र का जप किया जाता है ॥५२॥ विद्यमानेषु हस्तेषु ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः । तोयं पिबति वक्त्रेण श्वयोनौ जायते ध्रुवम् ॥५३॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३५ हाथ का प्रयोग न करके नदी में मुँह लगाकर पानी पीनेवाला अल्पज्ञ ब्राह्मण निश्चय ही कुत्ते की योनि में वास करता है ॥५३॥ यस्तु क्रुद्धः पुमान् ब्रूयाज्जायायास्तु अगम्यताम् । पुनरिच्छति चेदेनां विप्रमध्ये तु श्रावयेत् ॥५४॥ जो ब्राह्मण क्रोधावेश में अपनी पत्नी को माता या बहन की संज्ञा दे दे और क्रोध शान्त होने के पश्चात् यदि उससे पुनः रमण करना चाहे तो उस ब्राह्मण को परिषद् में इस बात को घोषणा करनी चाहिए-॥५४॥ श्रान्तः क्रुद्धस्तमोऽन्धो वा क्षुत्पिपासा-भयार्दितः । दानं पुण्यमकृत्वा तु प्रायश्चित्तं दिनत्रयम् ॥५५॥ मैंने श्रान्त, क्रोध, अज्ञान, क्षुधा-तृषा से क्लान्त एवं भयभीत होकर ऐसा वाक्य कह दिया, अथवा दान, तीर्थ, यात्रादि पुण्य करता हूँ, कहकर भी उसे न करे तो भी ब्राह्मणों को यही पूर्वोक्त कारण सुनाना चाहिए और तीन दिन तक उपवास करना चाहिए ॥५५॥ उपस्पृशेत् त्रिषवणं महानद्युपसङ्गमे । चीर्णान्ते चैव गां दद्याद् ब्राह्मणान् भोजयेद् दश ॥५६॥ इसके बाद समुद्रगामिनी नदी के संगम में त्रिकाल स्नान करे, तत्पश्चात् एक गोदान देकर और दस ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए ॥५६॥ दुराचारस्य विप्रस्य निषिद्धाचरणस्य च । अन्नं भुक्त्वा द्विजः कुर्याद् दिनमेकमभोजनम् ॥५७॥ दुराचरण और निषिद्धाचरण करनेवाले ब्राह्मण का यदि कोई ब्राह्मण अन्न भक्षण कर ले तो उसे एक दिन तक उपवास करना चाहिए ॥५७॥ सदाचारस्य विप्रस्य तथा वेदान्तवेदिनः । भुक्त्वाऽन्नं मुच्यते पापादहोरात्रान्तरान्तरः¹ ॥५८॥ १. '-न्तरः' इति ।

यदि स्वयं उपवास न कर सके तो किसी सदाचारी या वेदांगज्ञाता ब्राह्मण का अन्न दो दिनों तक भक्षण करे तो उपर्युक्त पाप से वह छूट जाता है ॥५८॥ ऊर्ध्वोच्छिष्टमथोच्छिष्टमन्तरिक्षमृतौ तथा । कृच्छ्रत्रयं प्रकुर्वीत अशौचमरणे तथा ॥५९॥ जो कोई वमनादि करके जूठे मुँह, मल-मूत्र से अशुद्ध होकर या अन्तरिक्ष में मृत हो जाय तो प्रायश्चित्त के लिए कृच्छ्र व्रत करा देने अर्थात् व्रत के बदले में उतनी ही गायें दान करने से शुद्ध होता है। इसी प्रकार का प्रायश्चित्त अशौच में मरनेवाले का भी होता है ॥५९॥ कृच्छ्रे १ देव्ययुतं चैव प्राणायामशतद्वयम् । पुण्यतीर्थेऽनार्द्रशिरःस्नानं २ द्वादशसंख्यया ॥६०॥ दस हजार गायत्री का जप करने से भी कृच्छ्र व्रत का फल होता है, दो सौ प्राणायाम करने से एक कृच्छ्र व्रत पूरा होता है। किसी तीर्थ स्थान में स्नान करके जब केश सूख जायें तो पुनः स्नान करे। इस प्रकार बारह बार करने से एक कृच्छ्र व्रत पूरा होता है ॥६०॥ द्वियोजने ३ तीर्थयात्रा कृच्छ्रमेकं प्रकल्पितम् ! गृहस्थः कामतः कुर्याद्रेतः स्खलनं भुवि ॥६१॥ दो योजन अर्थात् आठ कोस तक किसी तीर्थस्थल की ओर गमन करने से भी एक कृच्छ्र व्रत के समान होता है। जो गृहस्थ अपनी स्वेच्छा से वीर्यपात करे तो ॥६१॥ सहस्रं तु जपेद् देव्याः प्राणायामस्त्रिभिः सह । चतुर्विद्योपपन्नस्तु धवद् विप्रघातके ४ ॥६२॥ उसे एक हजार गायत्री मन्त्र का जाप और तीन प्राणायाम करना चाहिए। चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण ॥६२॥ १. 'कृच्छ्रे देव्ययुतं' । २. '-चाद्र'शिराः' । ३. 'द्वियोजनं' । ४. 'ब्रह्मघातके' इति ।

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[ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३७

समुद्रसेतुगमनं प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् । सेतुबन्धपथे भिक्षां चातुर्वर्ण्यात् समाचरेत् ॥६३॥ को विप्रघाती के लिए सेतुबन्ध रामेश्वर दर्शन करने का प्रायश्चित्त बतलाना चाहिए। प्रायश्चित्त करनेवाले ब्रह्मघाती को रामेश्वर दर्शन के लिए जाते समय मार्ग में सभी वर्णों के यहाँ भिक्षाटन करना चाहिए ॥६३॥ वर्जयित्वा विकर्मस्थान् छत्रोपानद्-विवर्जितः । अहं दुष्कृतकर्मा वै महापातककारकः ॥६४॥ विपरीत आचरण करनेवालों के घर भिक्षाटन न करे और न तो अपने पास छाता, जूता आदि ही रखे। भिक्षा याचना के समय प्रायश्चित्त- कर्त्ता को कहना चाहिए—'मैं दुराचरण करनेवाला पापी हूँ' ॥६४॥ गृहद्वारेषु तिष्ठामि भिक्षार्थी ब्रह्मघातकः । गोकुलेषु वसेच्चैव ग्रामेषु नगरेषु वा ॥६५॥ मैं घर के द्वार पर ब्रह्मघाती बनकर भिक्षा के उद्देश्य से आया हूँ। गायों के समूह के साथ गाँव और नगरों में निवास करे ॥६५॥ तपोवनेषु तीर्थेषु नदीप्रस्रवणेषु वा² । एतेषु ख्यापयन्नेनः³ पुण्यं गत्वा तु सागरम् ॥६६॥ तपोवन, तीर्थ, नदी और जल-प्रपातों में अपने किये हुए दुष्कर्मों का वर्णन करते हुए पवित्र सागर में जाय ॥६६॥ दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम् । रामचन्द्रसमादिष्टं¹ नरसञ्चय-सञ्चितम् ॥६७॥ भगवान् रामचन्द्र के कथनानुसार नल द्वारा निर्मित, दस योजन चौड़े और सौ योजन लम्बे ॥६७॥


१. 'समादिशेत्' । २. 'च' इति । ३. '-न्नेव' ।

Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

१३८ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो- सेतुं दृष्ट्वा समुद्रस्य ब्रह्महत्यां व्यपोहति । सेतुं दृष्ट्वा विशुद्धात्मा त्ववगाहेत सागरम् ॥६८॥ उस समुद्र सेतु को देखकर मनुष्य ब्रह्महत्यादि पापों से रहित हो जाता है । सेतुदर्शन से शुद्ध शरीर को प्राप्त करके समुद्र में स्नान करना चाहिए ॥६८॥ यजेत वाऽश्वमेधेन राजा तु पृथिवीपतिः । पुनः प्रत्यागतो वेश्म वासार्थमुपसर्पति ॥६९॥ पृथिवीपति राजा को ब्रह्महत्यादि से मुक्त होने के निमित्त अश्वमेध यज्ञ और निज गृह में वास करना उचित है ॥६९॥ सपुत्रः सह १भृत्यैश्च कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् । गाश्चैवैकशतं दद्याच्चातुर्विद्येषु दक्षिणाम् ॥७०॥ पुत्र, पत्नी, सेवक तथा ब्राह्मणों को भोजन करावे और चारों वेद के ज्ञाता ब्राह्मण को दक्षिणा में एक सौ गायों का दान करे ॥७०॥ ब्राह्मणानां प्रसादेन ब्रह्महा तु विमुच्यते । विन्ध्यादुत्तरतो यस्य २निवासः परिकीर्तितः ॥७१॥ ब्राह्मणों की प्रसन्नता से ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध हो जाता है । विन्ध्य पर्वतमाला के उत्तरी भाग में रहनेवालों के लिए ही ॥७१॥ पराशरमतं तस्य सेतुबन्धस्य दर्शनम् । सवनस्थां स्त्रियं हत्वा ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ॥७२॥ पराशर के मत से सेतुबन्ध दर्शनका विधान है। सोमयाग करनेवाली स्त्री का वध करने से ब्रह्महत्या के समान ही व्रत करना चाहिए ॥७२॥ मद्यपञ्च द्विजः कुर्यान्नदीं गत्वा समुद्रगाम् । चान्द्रायणे ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ॥७३॥ सुरापान करनेवाले ब्राह्मण को भी ब्रह्महत्या का व्रत करना उचित है और समुद्र में मिलनेवाली नदियों में स्नान करने के पश्चात् १. ‘भृत्यश्च’ । २. ‘संवासः’ । ३. ‘सुरापश्च’ ।

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३९ चान्द्रायण करने का विधान है। इसके बाद ब्राह्मण भोजन कराकर ॥७३॥ अनुडुत्सहितां गां च दद्याद् विप्रेषु दक्षिणाम् । सुरापानं सकृत्कृत्वा अग्निवर्णां सुरां पिवेत् ॥७४॥ ब्राह्मण को दक्षिणास्वरूप एक बैल और गौ का दान करना चाहिए। जो एक बार मदिरापान करे या अग्नि के समान तप्त सुरापान करके मृत्यु को प्राप्त हो जाय ॥७४॥ स पावयेदथात्मानमिह लोके परत्र च। अपहृत्य सुवर्णं तु ब्राह्मणस्य ततः स्वयम् ॥७५॥ तो वह व्यक्ति इस लोक तथा परलोक दोनों में अपनी आत्मा को शुद्ध कर लेता है। ब्राह्मण का स्वर्ण चोरी करनेवाले को स्वयं ही ।७५। गच्छेन्मुसलमादाय राजाभ्याशं^२ वधाय तु। हतः शुद्धिमवाप्नोति राज्ञाऽसौ मुक्त एव च ॥७६॥ अपने वध के लिए हाथ में मूसल धारण कर राजा के पास जाना चाहिए। चोर के द्वारा अपने वध का निवेदन करने पर यदि उसे राजा मार डाले या छोड़ दे तो भी वह अपने किये हुए पापों से मुक्त हो जाता है ॥७६॥ कामतस्तु कृतं यत्स्यान्नाऽन्यथा वधमर्हति । आसनाच्छयनाद्यानात् सम्भाषात् सहभोजनात् ॥७७॥ जान-बूझकर ब्राह्मण का स्वर्ण चुरानेवाले का वध करना विहित है, अन्यथा वह वध के अयोग्य होता है। एक साथ बैठने, सोने, एक ही वाहन पर सवारी करने, बोलने और एक साथ बैठकर भोजन करने से ॥७७॥ संक्रामन्ति^३ हि पापानि तैलविन्दुरिवाऽम्भसि । १. 'पावयेदिहात्मानमिह' । २. 'राजानं स्ववधाय' इति । 'न्तीह' इति !

२४० पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो- चान्द्रायणं यावकं च तुलापुरुष एव च । गवां चैवाऽनुगमनं सर्वपापप्रणाशनम् ॥७८॥ किसी पापी का पाप निर्दोष व्यक्ति को पानी पर तेल की बूँद पड़ने के समान ही लग जाता है। चान्द्रायण, यावक, तुलापुरुष और गायों के पीछे-पीछे अनुसरण करने से सभी प्रकार के पापों का शमन हो जाता है ॥७८॥ एतत् पाराशरं शास्त्रं श्लोकानां शतपञ्चकम् । द्विनवत्या समायुक्तं धर्मशास्त्रस्य संग्रहः॥७९॥ यह महर्षि पाराशर रचित पाँच सौ बानवे श्लोकों का धर्मशास्त्र संग्रह है ॥७९॥ यथाऽध्ययनकर्माणि धर्मशास्त्रमिदं तथा । अध्येतव्यं प्रयत्नेन नियतं स्वर्गकामिना ॥८०॥ इति देवरिया-मण्डलान्तर्गत - 'मझौलाराज्य' निवासि-व्याकरणाचार्य- साहित्यवारिधि-पण्डितश्रीशिवदत्तमिश्रशास्त्रिसम्पादिते पाराशरीये धर्म- शास्त्रे सकलप्रायश्चित्तनिर्णयो नाम द्वादशोऽध्यायः समाप्तः ॥१२॥ जिस प्रकार वेदाध्ययन से पुण्य-लाभ होता है उसी प्रकार इस धर्मशास्त्र के पढ़ने से भी पुण्य प्राप्त होता है। अतः प्रत्येक स्वर्गाभिलाषी व्यक्ति के लिए इस शास्त्र का पठन-पाठन नियमपूर्वक करना अत्यन्त आवश्यक है ॥८०॥ इस प्रकार 'देवरिया'-मण्डलान्तर्गत 'मझौलीराज्य' (सम्प्रति वाराणसी) निवासि- पण्डित श्रीसन्तशरणमिश्रात्मज-पण्डित-श्रीशिवदत्तमिश्र-शास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशरीय धर्मशास्त्र में सकल- प्रायश्चित्त निर्णय नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१२॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

श्लोकानुक्रमणिका

श्लोकानुक्रमणिका * १. प्रथमोऽध्याय श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः अकृत्वा वैश्वदेवं तु १५ कृते त्वस्थिगताः ९ अकृत्वा वैश्वदेवं तु १५ कृते सम्भाषणादेव ७ अतिथिं तत्र सम्प्राप्तं १२ क्षत्रियो हि प्रजा रक्षन् १७ अतिथैर्यस्य भग्नाशो १२ गार्गीया गौतमीयाश्च ४ अथ सन्तुष्टहृदयः ३ चतुर्णामपि वर्णानामाचारो १० अथाऽतो हिमशैलाग्रे १ चातुर्वर्ण्यं समाचारं ५ अन्ये कृतयुगे धर्मास्- ७ चोरो वा यदि चाण्डालः १६ अपूर्वः सुव्रती विप्रो १३ जितो धर्मो ह्यधर्मेण ९ अभिगम्य कृते दानं ८ तच्छ्रुत्वा ऋषिवाक्यं तु १ अभिगम्योत्तमं दानमाहूयैव ८ ततस्ते ऋषयः सर्वे २ अव्रती ह्यनधीयानां १७ तपः परं कृतयुगे ७ अस्मिन् मन्वन्तरे धर्माः ४ तस्मिन्नृषिसभामध्ये २ अहमद्यैव तत्सर्वं १० त्यजेद् देशं कृतयुगे ७ इष्टो वा यदि वा द्वेष्यो ११ दद्याच्च भिक्षात्रितयं १४ कपिलाक्षीरपानेन १७ दूराच्चोपगतं श्रान्तं ११ कल्पे कल्पे क्षये सत्या ६ धर्मं कथय मे तात ! ४ कात्यायनकृताश्चैव ४ धर्मस्य निर्णयं प्राह ५ काष्ठभार-सहस्रेण १३ न कश्चिद् वेदकर्ता च ६ कुशलं सम्यगित्युक्त्वा ३ न गृह्णाति तु यो विप्रो १६ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ३ न चाऽहं सर्वतत्वज्ञः २ कृते तात्क्षणिकः शापस्- ८ न पृच्छेद गोत्रचरणे १३ कृते तु मानवा धर्मास्- ७ न श्रीः कुलक्रमायाता १७

( १४२ ) श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः नानापुष्प-लताकीर्णं २ लाभकर्म तथा रत्नं १७ नैव ग्रामीणमतिथि १२ विक्रीणन् मद्य-मांसानि १७ पराशरमतं पुण्यं १० वैश्वदेवकृतं पापं १५ पुष्पं पुष्पं विचिनुयान् १७ वैश्वदेवविहीना ये १५ ब्राह्मणस्य मुखं क्षेत्रं १७ वैश्वदेवे तु सम्प्राप्ते १४ ब्रूहि धर्मं स्वरूपज्ञ ५ शातातपाच्च हारीताद् ४ मानुषाणा हितं धर्मं १ शिरो वेष्ट्य तु यो भुङ्क्ते १६ मृगपक्षि-निनादाढ्यं २ शुक्लवस्त्रं च यानं च १६ यतवे काञ्चनं दत्त्वा १६ शूद्रस्य द्विज-शुश्रूषा १७ यतिश्च ब्रह्मचारी च १४ श्रद्धया चाऽन्नदानेन १२ यतिहस्ते जलं दद्याद् १४ षट्कर्माभिरतो नित्यं १० यस्यच्छत्रं हयश्चैव १४ सन्ध्या स्नानं जपो होमो ११ युगे युगे च ये धर्मास्- ९ सीदन्ति चाऽग्निहोत्राणि ९ युगे युगे तु सामर्थ्यं ९ सुक्षेत्रे वापयेद् बीजं १३ लवणं मधु तैलं च १७ सुक्षेत्रे वापयेद् बीजं १७ * २. द्वितीयोऽध्याय अतः परं गृहस्थस्य १९ जप्यं देवार्चनं होमं २० अदाता कर्षकश्चैव २२ तं प्रवक्ष्याम्यहं पूर्वं १९ अयोमुखेन काष्ठेन २२ तिला रसा न विक्रेया २१ कर्षकः खलयज्ञेन २३ दानं दद्याच्च वै तेषां २२ क्षुधितं तृषितं श्रान्तं २० पञ्चसूना गृहस्थस्य २२ गृहस्थः प्रत्यहं कुर्यात् २३ ब्राह्मणश्चेत् कृषिं कुर्यात् २१ चतुर्गवं नृशंसानां २१ भवन्त्यल्पायुषस्ते वै २४

श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः

( १४३ ) श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः विप्राणां त्रिशकं भागं २३ स चौरः स च पापिष्ठी २३ वैश्यः शूद्रस्तथा कुर्यात् २४ स्थिराङ्गं नीरुजं दृप्तं २० षड्गवं तु त्रियामाहे २१ स्वयं कृष्टे तथा क्षेत्रे २० ३. तृतीयोऽध्यायः अतः शुद्धिं प्रवक्ष्यामि २४ त्रिरात्रे तु ततः पूर्णे ३५ अजा गावो महिष्यश्च २६ दन्तजातेऽनुजाते च २८ अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ३४ देवाङ्गना-सहस्राणि ३३ अनुगम्येच्छया प्रेतं ३४ देशान्तरं गतो विप्रः २७ अन्तरा तु दशाहस्य ३१ देशान्तरमृतः कश्चित् २७ असगोत्रमबन्धुं च ३४ द्वाविमौ पुरुषौ लोके ३२ आचतुर्थाद् भवेत् स्रावः २८ न तेषामशुभं किञ्चित् ३४ आजातदन्ता ये बाला २८ प्रसवे गृहमेधी तु ३० आदन्तजन्मनः सद्य २९ प्राप्नोति सूतकं गोत्रे २६ उद्यतो निधने दाने ३० प्रेतीभूतं तु यः शूद्रं ३५ उपासने तु विप्राणा- २५ ब्रह्मचारी गृहे तेषां २९ एकपिण्डास्तु दायादाः २६ ब्राह्मणार्थे विपन्नानां ३२ एकाहाच्छुद्ध्यते विप्रो २५ भृग्वग्निमरणे चैव २७ कृष्णाष्टमी त्वमावास्या २८ यत्र यत्र हतः शूरः ३२ क्षत्रियं मृतमज्ञानाद् ३५ यदि गर्भो विपद्येत २८ क्षत्रियो द्वादशाहेन २५ यदि पत्न्यां प्रसूतायां ३१ चतुर्थे दशरात्रं स्यात् २७ यस्तु भग्नेषु सैन्येषु ३२ जन्मकर्म-परिभ्रष्टः २६ यस्य छेदक्षतं गात्रं ३३ जाते विप्रो दशाहेन २५ ये यज्ञसङ्घस्तपसा च ३३ जितेन लभ्यते लक्ष्मी- ३३ ललाटदेशे रुधिरं स्रवञ्च ३४ तस्माद् द्विजो मृतं शूद्रं ३६ विनिर्वर्त्य यदा शूद्रा ३६

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ( १४४ ) श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः विवाहोत्सव-यज्ञेषु ३१ सम्पूर्काज्जायते दोषो ३१ शवं तद्वैश्यमज्ञानाद् ३५ सम्पर्काद् दुष्यते विप्रो २९ शिल्पिनः कारुका वैद्या २९ सर्वेषां शावमाशौचं ३० सैन्यस्तं ब्राह्मणं दृष्ट्वा ३२ सन्नतः सत्रपूतश्च ३० ४. चतुर्थोऽध्यायः अतिमानादतिक्रोधात् ३६ न कार्यमावसथ्येन ४१ अपृष्ट्वा चैव भर्तारं ४० नष्टे मृते प्रव्रजिते ४३ ऋतुस्नाता तु या नारी ३९ नाऽशौचं नोदकं नाऽग्नि ३७ ओध-वाताऽऽपहृतं बीजं ४१ पत्यौ जीवति या नारी ४० औरसः क्षेत्रजश्चैव ४१ परिवित्तिः परिवेत्ता ४२ कुब्ज-वामन-षण्ढेषु ४१ पितृव्यपुत्रः सापत्‍नः ४३ चतुर्थे दशरात्रं स्यात् ३९ पूय-शोणित-सम्पूर्णो ३६ ज्येष्ठो भ्राता यदा तिष्ठेद् ४३ बान्धवानां सजातीनां ४० तद्वत् परस्त्रियाः पुत्रौ ४१ मासाद्धं-मासमेकं वा ३८ तप्तकृच्छ्रेण शुद्धास्ते ३७ मृते भर्तरि या नारी ४३ तप्तकृच्छ्रेण शुद्ध्यन्ती ३७ यत्पापं ब्रह्महत्यायां ४० तिस्रः कोट्योऽर्द्धकोटी च ४४ यो वै समाचरेद् विप्रः ३८ त्रिरात्रं प्रथमे पक्षे ३८ व्यालग्राही यथा व्यालं ४४ त्र्यहमुष्णं पिबेद् वारि ३७ शुद्रव्यर्थमष्टमे चैव ३९ दरिद्रं व्याधितं धूतं ४० षट्पलं तु पिबेदम्भस्- ३८ द्वौ कृच्छ्रौ परिवित्तोस्तु ४२ संस्पृशन्ति तु ये विप्रा ३७ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ( १४५ ) ५. पञ्चमोऽध्यायः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः अग्निहोत्रोपकरणमशेषं ४९ दहेतं ब्राह्मणं विप्रो ४७ अन्यथा कुरुते कर्म ५० देहनाशमनुप्राप्तः ४७ अग्रतः सन्नतो वाऽपि ४५ प्राजापत्यं चरेत् पश्चात् ४७ असद्ब्राह्मणके ग्रामे ४६ वृक-श्वान-शृगालाद्यैः ४४ ईदृशं तु विधिं कुर्याद् ४९ वेद-विद्या-व्रतस्नातः ४५ एकविंशतिमूर्द्धन्यां ४८ शतं तु जघने दद्याद् ४८ कर्णे चोलूखलं दद्यात् ४९ शय्यां शिश्ने विनिःक्षिप्य ४८ कृष्णपक्षे यदा सोमो ४६ शुना घ्राताऽवलीढस्य ४६ कृष्णाजिनं समास्तीर्य ४८ शुना तु ब्राह्मणी दष्टा ४६ गवां शृङ्गोदकैः स्नानं ४५ श्रोत्रे च प्रोक्षणी दद्याद् ४९ चत्वारिंशच्छिरे दद्याद् ४८ सव्रतस्तु शुना दष्टो ४५ चाण्डालेन श्वपाकेन ४७ स्वेनाग्निना स्वमन्त्रेण ४७ दद्यात् पुत्रोऽथवा भ्राता ४९ ६. षष्ठोऽध्यायः अतः परं प्रवक्ष्यामि ५० कुरङ्गं वानरं सिंहं ५३ अतोऽन्यथा भवेद् दोषः ६३ कुर्याद् वाक्यं द्विजानां च ६४ अल्पं परित्यजेदन्नं ६८ कुर्वन्त्यनुग्रहं ये तु ६३ अविज्ञातस्तु चाण्डालो ५८ कुसुम्भ-गुड-कार्पास- ५९ उपवासो व्रतं होमो ६२ 'केनेदं शुद्धयते ? चे' ति ६६ एकैकं ग्रासमश्नीयाद् ५७ क्रौञ्च-सारस-हंसाश्च ५० एव चतुष्पदानां च ५३ क्षत्रियेणाऽपि वैश्येन ५४ एवं शुद्धस्ततः पश्चात् ५९ क्षत्रियोऽपि सुवर्णस्य ६१ कारण्डव-चकोराणां ५१ गजस्य च तुरङ्गस्य ५२ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ( १४६ ) श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः गवां मूत्र-पुरीषेण ६१ भावदुष्टं न भुञ्जीत ५९ गृध्र-श्येन-शशादोना- ५१ भुङ्क्तेऽज्ञानाद् द्विजश्रेष्ठः ५७ गृहस्याभ्यन्तरं गच्छेत् ६१ भेरुण्ड-चाष-भासांश्च ५२ चरेत् सान्तपनं विप्रः ५६ महत्कार्योपरोधेन ६३ चाण्डालं हतवान् कश्चिद् ५४ मुनिवक्त्रोद्गतान् धर्मान् ५८ चाण्डालं खात-वापीषु ५५ मृग-रोहिद्-वराहाणा- ५३ चाण्डालंघटसंस्थं तु ५६ यथा पराशरेणोक्तं ६६ चाण्डालदर्शने सद्यः ५५ यदि न क्षिपते तोयं ५६ चाण्डालभाण्डसंस्पृष्टं ५६ रजकी कर्मकारी च ६० चाण्डालैः सह सम्पर्कं ६० रसपूर्णं तु मृद्भाण्डं ६१ चाण्डालैः सह सुप्ते तु ५५ वल्गुली-टिट्टिभानां च ५१ चोराः श्वपाक-चाण्डाला ५४ विप्रसम्पादितं यस्य ६५ ज्ञात्वा तु निष्कृतिं कुर्यात् ६० विप्राणां वेदघोषेण ६७ ततो द्रोणाऽढकस्यान्नं ६६ वृक-काक-कपोतानां ५१ तदन्तरा स्पृशेच्चापः ६५ वृक-जम्बुक-ऋक्षाणां ५२ ते तस्य विघ्नकर्तारः ६३ वृथा तस्योपवासः स्यान्न ६४ तेषां वाक्योदकेनैव ६४ वेद-वेदाङ्गविद्-विप्रै- ६६ त्र्यहं भुञ्जीत दघ्ना च ५८ वैश्यं वा क्षत्रियं वाऽपि ५४ दध्ना च सर्पिषा चैव ५८ वैश्यं शूद्रं क्रियाऽऽसक्तं ५४ पुनर्लेपन-खातेन ६० शिल्पिन कारुकं शूद्रं ५३ प्रणम्य शिरसा ग्राह्य- ६२ शिशुमारं तथा गोधां ५२ वलाका-टिट्टीभौ वाऽपि ५१ शूद्राणां नोपवासः स्यात् ६२ ब्रह्मकूर्चोपवासेन ५७ श्वपाकं वाऽपि चाण्डालं ५५ ब्राह्मणस्य व्रणद्वारे ६१ श्वान-चाण्डालदृष्टौ च ६५ भस्मना तु भवेच्छुद्धि- ५९ सर्वं भवति निष्छिद्रं ६३ भाण्डस्थमन्त्यजानां तु ५६ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

( १४७ ) श्लोकाः पृष्ठाङ्काः श्लोकाः पृष्ठाङ्काः सर्वदेवमयो विप्रः ६४ स्वमुच्छिष्टमसौ भुङ्क्ते ६५ सर्वान् कामानवाप्नोति ६३ स्वल्पमन्नं त्यजेद् विप्रः ६७ सुवर्णोदकमभ्युक्ष्य ६७ हत्वा मूषक-मार्जार- ५२ ० ७. सप्तमोऽध्यायः अथाऽतो द्रव्यसंशुद्धिः ६८ मधुपर्के च सोमे च ७६ अनुच्छिष्टेन शूद्रेण ७३ माता चैव पिता चैव ७० अष्टवर्षा भवेद् गौरी ६१ मारुतार्केण शुद्धयन्ति ७६ अस्तङ्गते यदा सूर्ये ७१ मार्जनाद् यज्ञपात्राणां ६८ आतुरे स्नान उत्पन्ने ७३ मृण्मये दहनाच्छुद्धि- ७५ आयसेष्वायसानां च ७४ मेध्याऽमेध्य स्पृशन्तोऽपि ७६ उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टः ७३ यः करोत्येकरात्रेण ७० उद्धरेद् दीनमात्मानं ७८ यस्तां समुद्वहेत् कन्यां ७० एते सर्वेऽपि विप्राणां ७७ रक्षेदेव स्वदेहादि ७७ और्ण-नेत्रपटानां च ७५ रजसा शुद्धयते नारी ६९ गण्डूषं पादशौचं च ७४ रोगेण यद्रजः स्त्रीणा- ७२ गावाघ्रातानि कांस्यानि ७४ वापी-कूप-तडागेषु ६९ चरूणां च स्रुवाणां च ६९ विप्रस्य दक्षिणे कर्णे ७७ जातवेदं सुवर्णं च ७१ शोषयित्वाऽर्कतापेन ७५ तृणकाष्ठस्य रज्जूणा- ७५ साध्वाचारा न तावत् स्याद् ७२ पतितानां च सम्भाषे ७७ स्त्रियो वृद्धस्तथा बालाः ७७ प्रथमेऽहनि चाण्डाली ७३ स्नाता रजस्वला या तु ७२ प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे ७० स्पृष्ट्वा रजस्वला ७१ भस्मना शुद्धयते कांस्यं ७४ स्पृष्ट्वा रजस्वला ७१ भुक्तोच्छिष्ट तथा स्नेहं ७६ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्यं ७१ मणिपात्राणि शङ्खंश्चेत् ७४ स्पृष्ट्वा रजस्वला ७२

श्लोकाः पृष्ठांकाः श्लोकाः पृष्ठांकाः

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( १४८ )

८. अष्टमोऽध्यायः

श्लोकाः पृष्ठांकाः श्लोकाः पृष्ठांकाः अज्ञातवा धर्मशास्त्राणि ८१ नैव गच्छति कर्तारं ८२ अत ऊर्ध्वं तु ये विप्राः ८३ पञ्चपूर्वं मया प्रोक्ताः ८३ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि ७९ पिबतीषु पिवेत्तोयं ८७ अनाहिताग्नयो येऽन्ये ८२ प्रमाणमार्गं मार्गन्तो ८१ अमेध्यानि तु सर्वाणि ८५ प्रायश्चित्तं सदा दद्याद् ८६ अव्रतानाममन्त्राणा- ८१ प्रायश्चित्तं प्रयच्छन्ति ८४ आत्मनो यदि वाऽन्येषां ८७ प्रायश्चित्तं समुत्पन्ने ८० उपस्थाय ततः शीघ्र- ८० प्रायश्चित्तं ततश्चीर्णे ८९ उष्णे वर्षति शीते वा ८७ ब्राह्मणांस्तानतिक्रम्य ८६ एकाहमेकभक्ताशी ८८ ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु ८९ कृत्वा पापं न गूहेत ७९ ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा ८७ गवां बन्धनयोक्त्रे षु ७८ मुनीनामात्मविद्यानां ८३ गायत्रीरहितो विप्रः ८५ यथा काष्ठमयी हस्ती ८३ नोवघस्याऽऽनुरूपेण ८८ यथाऽश्मनि स्थितं तोयं ८२ ग्रामस्थानं यथा शून्यं ८३ यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु ८४ चतुरहं त्वेकभक्ताशी ८८ यद् वदन्ति तमोमूढा ८१ चत्वारो वा त्रयो वाऽपि ८१ ये पठन्ति द्विजा वेदं ८४ चत्वारो वा त्रयो वाऽपि ८२ राज्ञश्चाऽनुमते स्थित्वा ८६ चातुर्वेद्योऽविकल्पी च ८५ वेद-वेदाङ्गविदुषा ७८ चित्रकर्म यथाऽनेक- ८४ संशये तु न भोक्तव्यं ७९ ते हि पापे कृते वैद्या ८० सचैलं वाग्यतः स्नात्वा ८० त्रिदिनं चैकभक्ताशी ८८ सद्यो निःसंशये पापे ७९ दिनद्वयं चैकभक्तो ८८ सम्प्रणीतः श्मशानेषु ८४ दुःशीलोऽपि द्विजः पूज्यो ८५ स-शिखं वपनं कृत्वा ८६ धर्मशास्त्ररथाऽऽरूढा ८५ सावित्र्याश्चाऽपि गायत्र्याः ८०

Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal