पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ पराशरस्मृतिः [ प्रथमो- न चाहं सर्वतत्त्वज्ञः कथं धर्मं वदाम्यहम् । अस्मत्पितैव प्रष्टव्य इति व्यासःसुतोऽवदत् ॥ ४ ॥ हे महर्षियो ! मैं कलि के सम्पूर्ण धर्म-कर्मों का तत्त्व जाननेवाला नहीं हूँ। यद्यपि मुझे कलि के धर्म सामान्य पितृ-प्रसाद से ज्ञात है, अतः हम लोगों को पिता पराशर के पास ही चलकर यह प्रश्न करना उचित है, ऐसा पराशरसुत व्यासजी ने कहा ॥ ४ ॥ ततस्ते ऋषयः सर्वे धर्मतत्त्वार्थकांक्षिणः । ऋषिं व्यासं पुरस्कृत्य गता बदरिकाश्रमम् ॥ ५ ॥ व्यासजी के इस प्रकार कहने पर कलि के सभी धर्मतत्त्वों की जिज्ञासा से महर्षि वेदव्यास को आगे कर, बदरिकाश्रम गये ॥ ५ ॥ नानापुष्प-लताकीर्णं फल-पुष्पैरलङ्कृतम् । नदी-प्रस्रवणोपेतं पुण्यतीर्थोपशोभितम् ॥ ६ ॥ बदरिकाश्रम, अनेक प्रकार की पुष्पवाली लताओं से, फल एवं पुष्पों से समन्वित है, अनेक नदियाँ तथा झरने जिसमें बह रहे हैं, तथा जिसका जल तीर्थों से अत्यन्त पवित्र है, ॥ ६ ॥ मृगपक्षि-निनादाढ्यं देवतायतनावृतम् । यक्ष-गन्धर्व-सिद्धैश्च नृत्य-गीतैरलंक्रतम् ॥ ७ ॥ जिसमें अनेक प्रकार के जंगली जीव मृग और पक्षिगण निर्भीक होकर मनोहर शब्द कर रहे हैं, जो अनेक देव-मन्दिरों से अलंकृत है तथा यक्ष, गन्धर्व और सिद्धों के नाच-गान जहाँ परमात्मा की प्राप्ति के लिए हो रहे हैं ॥ ७ ॥ तस्मिन्नृपिसभामध्ये शक्तिपुत्रं पराशरम् । सुखासीनं महातेजा मुनिमुख्यगणावृतम् ॥ ८ ॥