पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 13, कुल 170 में से
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श्रीमात्रे जयन्त्यै नमः पाराशरस्मृतिः 'शिवदत्ती' भाषाटीकासहिता ✤ ✤ १. प्रथमोऽध्यायः अथाऽतो हिमशैलाग्रे देवदारुवनालये। व्यामेकाग्रमासीनमपृच्छन् ऋषयः पुरा ॥ १ ॥ साम्ब शिवं नमस्कृत्य धारावाहिक-संस्कृतेः । पाराशरस्मृतेष्टीका भूयात् सज्ज्ञानहेतवे ॥ प्राचीन काल में हिमालय पहाड़ की चोटी पर, जहां देवदारु वन है, एकान्त में बेठे हुए वेदव्यासजी से महर्षियों ने पूछा ॥ १ ॥ मानुषाणां हितं धर्मं वर्तमाने कलौ युगे। शौचाचारं यथावच्च वद सत्यवतीसुत ! ॥ २ ॥ हे सत्यवती सुत महर्षि व्यासजी ! इस वर्तमान कलिकाल में मनुष्यों का हितकारी धर्म, शौच तथा आचार क्या है ? उसे आप कहिए ॥ २ ॥ तच्छ्रुत्वा ऋषिवाक्यं तु स-शिष्योऽग्न्यर्कसन्निभः । प्रत्युवाच महातेजाः श्रुति-स्मृति-विशारदः ॥ ३ ॥ श्रुति तथा स्मृतियों में विशारद, वेदव्यासजी, उस समय शिष्यों के सहित इस प्रकार शोभित हो रहे थे, मानो ज्वाला से अग्नि प्रदीप्त हो रहा हो, अथवा किरणों से सूर्य देदीप्यमान होता हो, ऐसे वेदव्यास- जी ने महर्षियों के वचन सुनकर कहा ॥ ३ ॥
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal