पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ५ भेद हैं और वे कृतयुग में उत्पन्न हुए हैं, पर अब वे सभी धर्म इन कलिकाल में नष्ट हो गये हैं, क्योंकि कृत में धर्म के चार चरण, त्रेता में तीन, द्वापर में दो तथा कलि में एक पाद ही अवशिष्ट रहता है। इसलिए अधिकांश नष्ट हो चुके हैं ॥ १६ ॥ चातुर्वर्ण्यसमाचारं किञ्चित् साधारणं वद । चतुर्णामपि वर्णानां कर्त्तव्यं धर्मकोविदैः ॥ १७ ॥ अतः कलि में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के सदाचार और उनकी शक्ति से होनेवाले साधारण धर्म को आप कहिए ॥ १७ ॥ ब्रूहि धर्मस्वरूपज्ञ सूक्ष्मं स्थूलं च विस्तरात् । व्यास-वाक्यावसानेषु मुनिमुख्यः पराशरः ॥ १८ ॥ यद्यपि धर्म के अनेक लक्षण हैं, जैसे नैयायिक के मत में ‘विहित- कर्मजन्यो धर्मः’, ‘यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः’, ‘चोदनालक्षणो धर्मः,’ ‘विद्वद्भिः सेवितः पन्था नित्यमद्वेषरागिभिः’, हृदयेनाभ्यनुज्ञातः यो धर्मः’ इस प्रकार धर्म के अनेक लक्षण होते हुए भी हे महर्षे, आप वास्तविक धर्म के स्वरूप को साक्षात् करनेवाले हैं, अतः हे धर्म- स्वरूपज्ञ ! चारों वर्णों के मध्य में धर्मज्ञों के द्वारा किये जानेवाले स्थूल और सूक्ष्म धर्म को सविस्तर आप मुझसे कहिए (धर्म का स्थूल रूप जिसे मन्दमति भी कर सकते हैं, जैसे सन्ध्या-वन्दनादि, सूक्ष्म रूप जिसे सब न समझ पायें, जैसे ‘द्रौपदी-विवाहादि’ यह धर्म लोक और वेद से विरुद्ध होने के कारण केवल पण्डित ही समझ पाते हैं) ॥ १८ ॥ धर्मस्य निर्णयं प्राह सूक्ष्मं स्थूलं च विस्तरात् । वक्ष्यमाण-धर्मतत्त्व-ग्रहणाय श्रोतृसावधानतां विधत्ते— शृणु पुत्र ! प्रवक्ष्यामि शृण्वन्तु मुनयस्तथा ॥ १९ ॥ इस प्रकार व्यास के कहने पर महर्षि पराशर ने धर्म के स्थूल तथा सूक्ष्म रूपों का निर्णय कर, विस्तारपूर्वक अपने पुत्र तथा महर्षियों से कहा कि हे पुत्र तथा हे महामुनियो ! सुनो ॥ १९ ॥