भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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६ पराशरस्मृतिः [ प्रथमो- कल्पे कल्पे क्षये सत्या ब्रह्म-विष्णु-महेश्वराः । श्रुति-स्मृति सदाचार-निर्णेतारश्च सर्वदा ॥२०॥ कल्प-कल्प में जब सृष्टि का क्षय हो जाता है, उस समय धर्म विनष्ट होने पर भी बीजरूप से अवस्थित रहता है । अतः प्रलय के बाद जब सृष्टि होती है तो ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर ही सदैव धर्म का निर्णय किया करते हैं । ( कल्प दो प्रकार का होता है—प्रथम कल्प, दूसरा महाकल्प । प्रथम कल्प ब्रह्मा का एक दिन का होता है, उस समय सृष्टि के निमित्तभूत महदादि का विनाश हो जाता है । दूसरा महाकल्प है, जिसमें ब्रह्मदेव की आयु समाप्त हो जाती है, उस महाकल्प में ब्रह्मदेव का भी नाश हो जाता है । पुराणों में चार प्रकार का प्रलय कहा है : १. नित्य प्रलय, २. नैमित्तिक प्रलय, ३. प्राकृत प्रलय, ४. आत्यन्तिक प्रलय । इनमें नैमित्तिक और प्राकृतिक प्रलय ऊपर कल्प और महाकल्प के रूप में कहा जा चुका है । जीवों का नित्य विनाश ही नित्य प्रलय कहा जाता है और जब जीव ज्ञान के द्वारा परमात्मा में विलीन हो जाता है, तो उसे आत्यन्तिक लय कहते हैं । इस प्रकार चार प्रकार के प्रलयों का वर्णन कूर्म पुराण में वर्णित है ) ॥ २० ॥ न कश्चिद् वेदकर्ता च वेदं स्मृत्वा चतुर्मुखः । तथैव धर्मान् स्मरति मनुः कल्पान्तरेऽन्तरे ॥२१॥ धर्म का उद्गम स्थान वेद है, सृष्टि के प्रलय के अनन्तर जिस प्रकार वेद का अनादित्व है उसी प्रकार प्रवाह-परम्परा से धर्म भी अनादि है । वेद की अनादिता से धर्म की अनादिता सिद्ध होती है । वेद का कोई कर्त्ता नहीं है, सृष्टि के आदि में ब्रह्मा-परमेश्वर वेद पढ़- कर धर्म का स्मरण करते हैं और प्रत्येक कल्प के मनुओं को उसका उपदेश करते हैं । पश्चात् प्रत्येक मन्वन्तर में मनु सर्व-साधारण के लिए धर्मोपदेश करते है । प्रति युग में धर्म की विभिन्नता होने के कारण धर्मान् यह बहुवचन निर्देश है ॥ २१ ॥