पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 20, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ८ पराशरस्मृतिः [ प्रथमो- सत्युग में पतित से संभाषण करने से, त्रेता में पतित का स्पर्श करने से, द्वापर में पतित का अन्न खाने से पुरुष पतित होता है, किन्तु कलि में पतित से सम्भाषणादि व्यवहार करने पर भी पतित नहीं होता, कलि में वह तभी पतित होता है जब पतित होने के योग्य बधादि पाप स्वयं करे ॥ २६ ॥ कृते तात्क्षणिकः शापस्त्रेतायां दशभिर्दिनैः । द्वापरे चैकमासेन कलौ संवत्सरेण तु ॥२७॥ सत्युग में शाप उसी क्षण फल देता है, त्रेता में दश दिन, द्वापर में एक महीना तथा कलि में एक वर्ष के भीतर शाप का फल होता है ॥ २७ ॥ अभिगम्य कृते दानं त्रेतास्त्राहूय दीयते । द्वापरे याचमानाय सेवया दीयते कलौ ॥२८॥ सत्युग में गुरु आदि के पास जाकर दान किया जाता था । त्रेता में प्रतिग्रहीता को स्वयं बुलाकर, द्वापर में माँगने पर दान दिया जाता था, किन्तु कलियुग में तो माँगने पर भी कोई उसे दान नहीं देता । कलि में उसीको दान दिया जाता है, जो दाता की सेवा करे ॥ २८ ॥ अभिगम्योत्तमं दानमाहूयैव मध्यमम् । अधमं याचमानाय सेवादानं तु निष्फलम् ॥२९॥ उपर्युक्त दान के निमित्त भेद होने से क्रमानुसार फलभेद भी होता है, जैसे जो दान सत्पात्र के घर स्वयं जाकर दिया जाता है वह दान 'उत्तम', है। पात्र को अपने घर बुलाकर जो दान दिया जाता है वह 'मध्यम', माँगने पर जो दान दिया जाये वह 'अधमदान' है, किन्तु जो दान सेवा की दृष्टि से दिया जाता है उस दान का कोई फल नहीं होता ॥ २९ ॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal