पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 21, कुल 170 में से
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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ९ जितो धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं चैवानृतेन च । जिताश्चौरैश्च राजानः स्त्रीभिश्च पुरुषा जिताः ॥३०॥ कलि की यह विशेषता है कि इस युग में अधर्म, धर्म को जीत लेता है। झूठ सत्य पर विजयी होता है। चोर लोग राजा को अपने वश में कर लेते हैं तथा स्त्रियां पुरुषों को जीत लेती हैं। कलि में धर्म का एक ही पाद रह जाता है, तीन पाद नष्ट हो जाते हैं—यही धर्म की पराजय है, और अधर्म की विजय है ॥ ३० ॥ सीदन्ति चाऽग्निहोत्राणि गुरूपूजा प्रणश्यति । कुमार्य्यश्च प्रसूयन्ते तस्मिन् कलियुगे सदा ॥३१॥ इस युग में अधर्म के बढ़ने से कोई अग्निहोत्र न करेगा । गुरुपूजा भी श्रद्धा न होने से विनष्ट हो जाती है, इस कलियुग में बिना ब्याही ( ७ या ८ वर्ष की ) कन्याओं के द्वारा सन्तान की उत्पत्ति होगी ॥३१॥ कृते त्वस्थिगताः प्राणास्त्रेतायां मांसमाश्रिताः । द्वापरे रुधिरं चैव कलौ त्वन्नादिषु स्थिताः ॥३२॥ सत्युग में प्राण अस्थिगत रहते हैं, त्रेता में मांस में, द्वापर में रुधिर में तथा कलि में प्राण अन्नादि में अवस्थित रहते हैं। अतः कलि में सत्युग, त्रेता एवं द्वापर का धर्मानुष्ठान असम्भव है ॥ ३२ ॥ युगे युगे च ये धर्मास्तत्र तत्र च ये द्विजाः । तेषां निन्दा न कर्त्तव्या युगरूपा हि ते द्विजाः॥३३॥ युग-युग में जो धर्म हैं, तथा युग-युग में जो ब्राह्मण हैं उनकी निन्दा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि धर्म तथा ब्राह्मण युग के प्रतीक हैं ॥ ३३ ॥ युगे युगे तु सामर्थ्यं शेषं मुनिविभाषितम् । पराशरेण चाऽप्युक्तं प्रायश्चित्तं विधीयते ॥३४॥
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal