भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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१० पाराशरस्मृतिः [ प्रथमो- युग-युग में महर्षियों ने तथा महर्षि पराशर ने पापों का प्रायश्चित्त सामर्थ्यानुसार ही कहा है ॥ ३४ ॥ अहमद्यैव तत्सर्वमनुस्मृत्य ब्रवीमि वः । चातुर्वर्ण्यसमाचारं शृण्वन्तु ऋषिपूङ्गवाः ॥३५॥ पराशरजी ने महर्षियों से कहा—हे महर्षियो ! युगानुसार होने- वाले चारों वर्णों के आचार तथा धर्म को स्मरण कर कह रहा हूँ, आप लोग उसे सुनें ॥ ३५ ॥ पराशरमतं पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् । चिन्तितं ब्राह्मणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ॥३६॥ महर्षि पराशर के द्वारा वेदार्थ को विचारकर कहा गया यह वर्णाश्रमाचार अत्यन्त पुण्य, पवित्र तथा पाप का नाशक है। यह विशेषकर धर्म के संस्थापन तथा ब्राह्मणों के हित की दृष्टि से कहा गया है ॥ ३६ ॥ चतुर्णामपि वर्णानामाचारो धर्मपालकः । आचारभ्रष्टदेहानां भवेद्धर्मः पराङ्मुखः ॥३७॥ सदाचार चारों वर्णों के धर्म का पालक है। इसलिए जो सदाचार का पालन नहीं करते, उनसे धर्म विमुख हो जाता है ॥ ३७ ॥ षट्कर्माभिरतो नित्यं देवताऽतिथि पूजकः । हुतशेषं तु भुञ्जानो ब्राह्मणो नावसीदति ॥३८॥ यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान एवं प्रतिग्रह इन छह कर्मों में लगा रहनेवाला, देवता तथा अतिथि की पूजा करने- Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal