पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२ पाराशरस्मृतिः [ प्रथमो- रास्ते में दूर से चलकर थका हुआ भूखा-प्यासा व्यक्ति यदि वैश्वदेव काल में गृहस्थ के घर उपस्थित हो जाये तो उसे ही अतिथि कहते हैं। प्रातःकाल वैश्वदेव के पूर्व घर पर आनेवाला व्यक्ति अतिथि नहीं कहा जाता ॥ ४१ ॥ नैकग्रामीणमतिथिं संगृह्णीत कदाचन । अनित्यमागतो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥४२॥ तिथि-विशेष तथा लाभ-विशेष की अपेक्षा न रखकर भूख और प्यास से पीड़ित व्यक्ति यदि वैश्वदेव के अन्त में गृहस्थ के घर आ जाय तो उसे ही आतथि कहते हैं। उसके आने का कोई क्रम निश्चित न होने से ही वह अतिथि है। पर जिसमें गृहस्थ रहता हो, उसी गांव का भूख- प्यास से पीड़ित व्यक्ति वैश्वदेव के अन्त में उपस्थित होने पर भी अतिथि नहीं है ॥ ४२ ॥ अतिथिं तत्र सम्प्राप्तं पूजयेत् स्वागतादिना । तथाऽऽसनप्रदानेन पादप्रक्षालनेन च ॥४३॥ रास्ते में थके हुए भूखे-प्यासे अतिथि को वैश्वदेवकाल में घर आने पर गृहस्थ उससे सुस्वागत पूछे। तत्पश्चात् उसकी पूजा करे, फिर अर्घ्य, आसन देकर उसका पादप्रक्षालन करे ॥ ४३ ॥ श्रद्धया चाऽन्नदानेन प्रियप्रश्नोत्तरेण च । गच्छतश्चाऽनुयानेन प्रीतिमुत्पादयेद् गृही ॥४४॥ फिर श्रद्धा से भोजन कराकर प्रेमपूर्वक उससे कुशल-मंगल पूछे। जब वह जाने लगे तो उसके पीछे-पीछे कुछ दूर तक अनुगमन करे (जाये)। इस प्रकार तथा अन्य प्रकार के उपचारों से उसे प्रसन्न करे ॥४४॥ अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहाद् प्रतिनिवर्तते । पितरस्तस्य नाऽश्नन्ति दशवर्षाणि पञ्च च ॥४५॥