भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १३ जिसके घर पर आया हुआ अतिथि अन्नादि सत्क्रिया के अभाव से निराश होकर लौट जाता है, उस गृहस्थ के पितर १५ वर्षों तक उसका अन्न ग्रहण नहीं करते ॥ ४५ ॥ काष्ठभारसहस्रेण घृतकुम्भशतेन च । अतिथैर्यस्य भग्नाशस्तस्य होमा निरर्थकः ॥४६॥ जिस गृहस्थ के घर से अतिथि निराश होकर लौट जाता है, उसका हजारों मन काष्ठ एवं सैकड़ों घड़े घृत से किया गया होम भी व्यर्थ ही है ॥४६॥ सुक्षेत्रे वापयेद् बीजं सुपात्रे निक्षिपेद्धनम् । सुक्षेत्रे च सुपात्रे च ह्युप्तं दत्तं न नश्यति ॥४७॥ जिस प्रकार उत्तम खेत में बीज बोने से विनष्ट नहीं होता, प्रत्युत उत्तम फल देता है अथवा सुपात्र में धन को धरोहर रखने से जिस प्रकार वह सुरक्षित रहता है। उसी प्रकार गृहस्थ को सत्पात्र में अन्नादि दान करने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है ॥ ४७ ॥ न पृच्छेद् गोत्रचरणे न स्वाध्यायं श्रुतं तथा । हृदये कल्पयेद् देवं सर्वदेवमयो हि सः ॥४८॥ गृहस्थ अपने घर पर वैश्वदेव के अन्त में आये हुए उस अतिथि का गोत्र तथा शाखा न पूछे। उसका स्वाध्याय तथा श्रुत (शास्त्रश्रवण) भी न पूछे। उसे अपने हृदय में देवता ही समझे, क्योंकि अतिथि सर्वदेवमय होता है ॥ ४८ ॥ अपूर्वः सुव्रती विप्रो ह्यपूर्वश्चाऽतिथिस्तथा । वेदाभ्यासरतो नित्यं त्रयोऽपूर्वे दिने दिने ॥४९॥ उत्तम व्रत करनेवाला यति, वेदाभ्यास में निरत ब्रह्मचारी तथा अतिथि ये तीनों अपूर्व हैं - इनका गृहस्थ प्रतिदिन स्वागत, अर्घ्यादि- दान से पूजन करे ॥ ४९ ॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal