भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १५ जिस संन्यासी को छत्र, घोड़ा तथा हाथी आदि उत्तम वाहन हों तथा इन्द्रासन के समान शुभ स्थान हो उस संन्यासी की पूजा करनी चाहिए। इसमें कोई विचार न करे ॥ ५४ ॥ वैश्वदेवकृतं पापं शक्तो भिक्षुर्व्यपोहितुम् । न हि भिक्षुकृतं दोषं वैश्वदेवो व्यपोहति ॥ ५५ ॥ बलिवैश्वदेव की क्रिया में यदि कोई त्रुटि रह जाय तो उस त्रुटि को भिक्षु-सम्मान दूर कर सकता है। किन्तु यदि भिक्षु के सम्मान में कोई त्रुटि रह जाती है, तो उसे बलिवैश्वदेव भी दूर नहीं कर सकते ॥ ५५ ॥ अकृत्वा वैश्वदेवं तु ये भुञ्जन्ते द्विजातयः । तेषामन्नं न भुञ्जीत काकयोनिं व्रजन्ति ते ॥ ५६ ॥ जो द्विजाति ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) बिना बलिवैश्वदेव किये ही भोजन कर लेते हैं, उनका अन्न कदापि भोजन करने योग्य नहीं होता, और वे काकयोनि में जन्म लेते हैं ॥ ५६ ॥ अकृत्वा वैश्वदेवं तु भुञ्जन्ते ये द्विजाधमाः । सर्वे ते निष्फला ज्ञेयाः पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ ५७ ॥ जो पतित ब्राह्मण बिना बलिवैश्वदेव किये ही भोजन कर लेते हैं, उनके किये गये किसी भी सत्कर्म का फल नहीं होता। वे अशुचि ( अपवित्र ) नरक में जाते हैं ॥ ५७ ॥ वैश्वदेवविहीना ये आतिथ्येन बहिष्कृताः । सर्वे ते नरकं यान्ति काकयोनिं व्रजन्ति च ॥ ५८ ॥ जो बलिवैश्वदेव नहीं करते और न अतिथि-सम्मान ही करते हैं, वे सभी नरक के भागी होते हैं और उन्हें कौवे की योनि मिलती है ॥ ५८ ॥