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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १५ जिस संन्यासी को छत्र, घोड़ा तथा हाथी आदि उत्तम वाहन हों तथा इन्द्रासन के समान शुभ स्थान हो उस संन्यासी की पूजा करनी चाहिए। इसमें कोई विचार न करे ॥ ५४ ॥ वैश्वदेवकृतं पापं शक्तो भिक्षुर्व्यपोहितुम् । न हि भिक्षुकृतं दोषं वैश्वदेवो व्यपोहति ॥ ५५ ॥ बलिवैश्वदेव की क्रिया में यदि कोई त्रुटि रह जाय तो उस त्रुटि को भिक्षु-सम्मान दूर कर सकता है। किन्तु यदि भिक्षु के सम्मान में कोई त्रुटि रह जाती है, तो उसे बलिवैश्वदेव भी दूर नहीं कर सकते ॥ ५५ ॥ अकृत्वा वैश्वदेवं तु ये भुञ्जन्ते द्विजातयः । तेषामन्नं न भुञ्जीत काकयोनिं व्रजन्ति ते ॥ ५६ ॥ जो द्विजाति ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) बिना बलिवैश्वदेव किये ही भोजन कर लेते हैं, उनका अन्न कदापि भोजन करने योग्य नहीं होता, और वे काकयोनि में जन्म लेते हैं ॥ ५६ ॥ अकृत्वा वैश्वदेवं तु भुञ्जन्ते ये द्विजाधमाः । सर्वे ते निष्फला ज्ञेयाः पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ ५७ ॥ जो पतित ब्राह्मण बिना बलिवैश्वदेव किये ही भोजन कर लेते हैं, उनके किये गये किसी भी सत्कर्म का फल नहीं होता। वे अशुचि ( अपवित्र ) नरक में जाते हैं ॥ ५७ ॥ वैश्वदेवविहीना ये आतिथ्येन बहिष्कृताः । सर्वे ते नरकं यान्ति काकयोनिं व्रजन्ति च ॥ ५८ ॥ जो बलिवैश्वदेव नहीं करते और न अतिथि-सम्मान ही करते हैं, वे सभी नरक के भागी होते हैं और उन्हें कौवे की योनि मिलती है ॥ ५८ ॥

वामपादकरः स्थित्वा तद् वै रक्षांसि भुञ्जते ॥५९॥

१६ पराशरस्मृतिः [ प्रथमो- शिरो वेष्ट्य तु यो भुङ्क्ते दक्षिणाभिमुखस्तु यः। वामपादकरः स्थित्वा तद् वै रक्षांसि भुञ्जते ॥५९॥ जो मनुष्य शिर पर पगड़ी या टोपी रखकर अथवा बायें पैर पर हाथ रखकर दक्षिणाभिमुख हो भोजन करता है, सह भोजन राक्षस लोग खा जाते हैं ॥ ५९ ॥ यतये काञ्चनं दत्त्वा ताम्बूलं ब्रह्मचारिणे । चोरेभ्योऽप्यभयं दत्त्वा दाताऽपि नरकं व्रजेत् ॥६०॥ संन्यासी को सोना आदि देनेवाला, ब्रह्मचारी को ताम्बूल देने- वाला तथा चोर को अभय देनेवाला-ये तीनों प्रकार के दाता नरक- गामी होते हैं अर्थात् इनको नरक प्राप्त होता है ॥ ६० ॥ शुक्लवस्त्रं च यानं च ताम्बूलं धातुमेव च । प्रतिगृह्य कुलं हन्यात् प्रतिगृह्णाति यस्य च ॥६१॥ जो संन्यासी श्वेत वस्त्र, सवारी, ताम्बूल तथा धातु आदि का प्रतिग्रह लेते हैं वे अपने कुल का तथा उस देनेवाले के भी कुल का नाश करते हैं ॥ ६१ ॥ चोरो वा यदि चाण्डालः शत्रुव पितृघातकः । वैश्वदेवे तु सम्प्राप्ते सोऽतिथिः स्वर्गसङ्क्रमः ॥६२॥ चोर, चाण्डाल, शत्रु अथवा स्वयं पिता का वध करनेवाला यदि वैश्वदेव काल में घर पर उपस्थित हो जाये, तो उस अतिथि को स्वर्ग- प्राप्ति का साधन मानना चाहिए ॥ ६२ ॥ न गृह्णाति तु यो विप्रो ह्यतिथिं वेदपारगम् । अदत्तं चाऽन्नपात्रं तु भुक्त्वा भुङ्क्ते तु किल्विषम् ॥६३॥ जो ब्राह्मण वेदपारंगत अतिथि के घर आने पर सत्कार नहीं करता तथा उसे अन्नादि बिना दिये ही स्वयं भोजन कर लेता है, वह पाप का भोजन करता है ॥ ६३ ॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १७ ब्राह्मणस्य मुखं क्षेत्रं निरुपममकण्टकम् । वापयेत् सर्वबीजानि सा कृषिः सर्वकामिका ॥६४॥ ब्राह्मण का मुख सुन्दर क्षेत्र-खेत के समान है, जिसमें कंटक नहीं रहत। उस ब्राह्मण के मुखरूपी क्षेत्र में बीजों को बोने से सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि होती है। अतः ब्राह्मण को भोजन आदि से सन्तुष्ट करना चाहिए। ६४॥ सुक्षेत्रे वापयेद् बीजं सुपात्रे निक्षिपेद्धनम् । सुक्षेत्रे च सुपात्रे च ह्युप्तं तन्न विनश्यति ॥६५॥ बुद्धिमान् पुरुष, सुन्दर ब्राह्मण के मुखरूपी क्षेत्र में बीज बोये और सुपात्र में धन का धरोहर रखे। क्योंकि सुन्दर खेत में बोये गये बीज और सत्पात्र मे रखा गया निक्षेप (धरोहर) का नाश नहीं होता ॥६५॥ अव्रता ह्यनधीयाना यत्र भैक्ष्यचरा द्विजाः । तं ग्रामं दण्डयेद् राजा चोरभयप्रदो हि सः ॥६६॥ अध्ययन-शून्य ब्रह्मचर्यादि व्रत का अनुष्ठान न करनेवाले ब्राह्मण जिस गाँव से भिक्षा से अपनी जीविका करते हों। राजा को उचित है कि वह उस गाँव को दण्ड दे, क्योंकि वह गाँव चोरों को आश्रय देने- वाला है ॥६६॥ क्षत्रियो हि प्रजा रक्षन् शस्त्रपाणिः प्रदण्डयान् । निर्जित्य परसैन्यानि क्षितिं धर्मेण पालयेत् ॥६७॥ क्षत्रिय हाथ में शस्त्र लेकर दुष्टों को दंड देता हुआ प्रजा की रक्षा करे। अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे तथा धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन करे ॥६७॥ न श्रीः कुलक्रमायाता भूषणोल्लिखिताऽपि वा । खड्गेनाक्रम्य भुञ्जीत वीरभोग्यां वसुन्धराम् ॥६८॥ २ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

१८ पाराशरस्मृतिः [ प्रथमो- कुलपरम्परा से समागत लक्ष्मी भी, बिना पराक्रम के स्थिर नहीं रहती और न भूषणादि धारण से ही लक्ष्मी की शोभा होती है। इस- लिए पराक्रमपूर्वक तलवार से जीतकर लक्ष्मी का उपभोग करना चाहिए। यह पृथ्वी वीरों से ही भोगने योग्य है ॥६८॥ पुष्पं पुष्पं विचिनुयान् मूलच्छेदं न कारयेत् । मालाकार इवारामे न यथाऽङ्गारकारकः ॥६९॥ बुद्धिमान् पुरुष माली की तरह वृक्षरूपी प्रजा से धीरे-धीरे पुष्पों का संचय करे, उसका मूलच्छेदन न करे। जिस प्रकार आग लगा देने- वाला, वृक्ष की जड़ जला देता है, फिर उसे पुष्प-प्राप्ति की सम्भावना नहीं रहती ॥६९॥ लाभकर्म तथा रत्नं गवां च परिपालनम् । कृषिकर्म च वाणिज्यं वैश्यवृत्तिरुदाहृता ॥७०॥ ब्याज लेना, रत्नों का क्रय-विक्रय, गो-पालन, खेती तथा व्यापार- ये वैश्य की जीविका कही गयी हैं ॥७०॥ शूद्रस्य द्विज-शुश्रूषा परमो धर्म उच्यते । अन्यथा कुरुते किञ्चित् तद् भवेदस्य निष्फलम् ॥७१॥ द्विजाति की सेवा ही शूद्र का सबसे बड़ा धर्म है। जो शूद्र द्विज- शुश्रूषा को छोड़कर अन्य कार्य करता है, उसका किया गया सभी कर्म निष्फल है ॥७१। लवणं मधु तैलं च दधि तक्रं घृतं पयः । न दुष्येच्छूद्रजातीनां कुर्यात् सर्वेषु विक्रयम् ॥७२॥ नमक, मधु, तेल, दही, मठ्ठा, घी तथा दूध शूद्र के हाथ से भी दूषित नहीं होता । इसलिए शूद्र इन सभी वस्तुओं का विक्रय सबके लिए कर सकता है ॥७२॥

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १९ विक्रीणन् मद्य-मांसानि ह्यभक्ष्यस्य च भक्षणम् । कुर्वन्नगम्यागमनं शूद्रः पतति तत्क्षणात् ॥७३॥ मद्य तथा मांस का विक्रय करने से, अभक्ष्य वस्तु का भक्षण करने से तथा अगम्या स्त्री से गमन करने पर शूद्र तत्क्षण ही पतित हो जाता है । इसलिए इन कर्मों को शूद्र त्याग दे ॥७३॥ कपिलाक्षीरपानेन ब्राह्मणीगमनेन च । वेदाक्षरविचारेण शूद्रस्य नरकं ध्रुवम् ॥७४॥ इति पराशरीय-धर्मशास्त्रे चातुर्वर्ण्यचारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ कपिला गौ का दूध पीने से, ब्राह्मणी के साथ संगम करने से तथा वेद के अक्षर का विचार करने ( अर्थात् वेद पढ़ने ) से शूद्र को निश्चय ही नरक होता है ॥७४॥ इस प्रकार 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशरप्रोक्त धर्मशास्त्र में चारों वर्णों के धर्माचार नामक प्रथम अध्याय समाप्त ॥१॥ २. द्वितीयोऽध्यायः अतः परं गृहस्थस्य कर्माचारं कलौ युगे । धर्मं साधारणं शक्त्या चातुर्वर्ण्यश्रियागतम्¹ ॥ १ ॥ तं प्रवक्ष्याम्यहं पूर्वं पराशरवचो यथा । प्रथमाध्याय में विशेष एवं साधारण धर्म कहकर ग्रन्थकार इस द्वितीय अध्याय में कहते हैं कि अब इसके अनन्तर गृहस्थ के कर्म एवं आचार तथा उनसे शक्ति के अनुसार किये जानेवाले साधारण धर्म को मैं कहूँगा । यह कर्म आचार तथा सामान्य धर्म, कलि में चारों वर्णों का क्रमपूर्वक चला आया है, ऐसा पराशर का मत है ॥१॥ षट्कर्मनिरतो विप्रः कृषिकर्म च कारयेत् ॥ २ ॥ १. '-सहितो' इत्यपि पाठः ।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri २० पराशरस्मृतिः [ द्वितीयो- अध्ययन, अध्यापन, यजन, याजन, दान तथा प्रतिग्रह इन छः कर्मों में लगा हुआ ब्राह्मण कृषि-कर्म ( खेती ) भी करावे ॥२॥ क्षुधितं तृषितं श्रान्तं बलीवर्दं न योजयेत् । हीनाङ्गं व्याधितं क्लीवं वृषं विप्रो न वाहयेत् ॥ ३ ॥ भूखे, प्यासे, थके हुए, अंगहीन, रोगी तथा बधिया ( क्लीब ) बैल को ब्राह्मण हल में न जोते ॥३॥ स्थिराङ्गं नीरुजं दृप्तं सुनर्दं षण्ढवर्जितम् । वाहयेद् दिवसस्याऽर्द्धं पश्चात् स्नानं समाचरेत् ॥ ४ ॥ जिस बैल का अंग पुष्ट हो तथा जो नीरोग हो, ऐसे अहंकार से भरे हुए तथा सुन्दर हँडकनेवाले बैल को, जो बधिया न हो, ब्राह्मण आधा दिन जोतकर अनन्तर स्नान करे ॥४॥ जप्यं देवार्चनं होमं स्वाध्यायं चैवमभ्यसेत् । एक-द्वि-त्रि-चतुर्विप्रान् भोजयेत् स्नातकान् द्विजाः ॥५॥ ब्राह्मण को प्रतिदिन जप, देव पूजन, होम तथा वेदों का स्वाध्याय करना चाहिए । और एक, दो, तीन अथवा चार स्नातक ब्रह्मचारी को प्रतिदिन भोजन भी कराना चाहिए ॥५॥ स्वयं कृष्टे तथा क्षेत्रे धान्यैश्च स्वयमर्जितैः । निर्वपेत् पञ्चयज्ञांश्च¹ क्रतुदीक्षां च कारयेत् ॥ ६ ॥ अपने खेत में अपनी कमाई के द्वारा उत्पन्न किये गये धान्य से गृहस्थ ब्राह्मण प्रतिदिन पंचयज्ञ (बलिवैश्वदेवादि) तथा यज्ञ-दीक्षादि भी करावे ॥६॥ १. '-यज्ञानि' इति पा० । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

[Header] ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता २१

तिला रसा न विक्रेया विक्रेया धान्यतः समाः । विप्रस्यैवंविधा वृत्तिस्तृण-काष्ठादि-विक्रयः ॥ ७ ॥ कलि में भूम्यादि के अभाव में यदि ब्राह्मण कृषि न कर सके, तो उसे वाणिज्य करना चाहिए, परन्तु तिल और रस (नमक, गुड़ आदि) का विक्रय कदापि नहीं करना चाहिए। यदि तिल और रस का विक्रय (बेचना) आवश्यक हो तो उसका नकद विक्रय न कर अन्न से बदला करे। उसे तृण (भूसा आदि) तथा काष्ठ (लकड़ी) आदि का विक्रय कर अपनी जीविका चलानी चाहिए ॥७॥ ब्राह्मणश्चेत् कृषिं कुर्यात्तन्महादोषमाप्नुयात् । अष्टगव्यं धर्महलं षड्गवं वृत्तिलक्षणम् ॥ ८ ॥ ब्राह्मण को कृषि कर्म करने से बहुत बड़ा पाप लगता है। यदि कृषि के बिना निर्वाह न हो सके, तो धर्महल से खेती करे, जो दो-दो बैलों को एक-एक प्रहर जुते रहने के कारण आठ बैलों से सम्पन्न होता है। तथा धर्महल (आठ बैलों) के अभाव में अपनी वृत्ति के लिए छः बैलों की भी खेती कर सकता है। इसे वृत्तिहल भी कहते हैं ॥८॥ चतुर्गवं नृशंसानां द्विगवं गोजिघांसुवत् । द्विगवं वाहयेत् पादं मध्याह्ने तु चतुर्गवम् ॥ ९ ॥ निर्दयी पुरुष ही चार बैलों को आठ पहर तक तथा गोहत्यारा दो बैलों को आठ पहर तक जोतता है। इसलिए चार तथा दो बैलों को पूरे दिन जोतकर ब्राह्मण कृषि कर्म न करे। दो बैलों को एक प्रहर तक, फिर दो बैलों (इस प्रकार कुल चार बैलों) को मध्याह्न (दूसरे प्रहर) तक ॥९॥ षड्गवं तु त्रियामाहेऽष्टभिः पूर्णं तु वाहयेत् । नाऽऽप्नोति¹ नरकेष्वेवं वर्त्तमानस्तु वै द्विजः ॥१०॥ १. 'याति' इति पाठान्तरम् ।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri २२ पाराशरस्मृतिः [ द्वितीयो- फिर दो बैलों अर्थात् कुल छः बैलों को तीसरे प्रहर तक तथा फिर दो बैलों को ( इस प्रकार कुल आठ बैलों को ) चौथे प्रहर तक । इस प्रकार आठ बैलों के द्वारा पूरे दिन धर्महल चलाकर ब्राह्मण नरक का भागी नहीं होता ॥१०॥ दानं दद्याच्च वै तेषां प्रशस्तं स्वर्गसाधनम् । संवत्सरेण यत्पापं मत्स्यघाती समाप्नुयात् ॥११॥ खेती करनेवाला दान भी करे, इस प्रकार गृहस्थ द्विज का यह अत्युत्तम स्वर्ग साधन है। मछली मारनेवाला एक वर्ष में जितना पाप कर सकता है ॥११॥ अयोमुखेन काष्ठेन ददेकाहेन लाङ्गली। पाशका मत्स्यघाती च व्याधः शाकुनिकस्तथा ॥१२॥ हल जोतनेवाला उतना पाप लोहे जड़े हुए काठ के हल से बैलों को जोतकर एक ही दिन में प्राप्त कर लेता है। १. फाँसी लगानेवाला, २. मछली मारनेवाला, ३. व्याध, ४. चिड़ीमार ॥१२॥ अदाता कर्षकश्चैव पञ्चैते समभागिनः । कण्डनी पेषणी चुल्ली उदकुम्भोऽथ मार्जनी ॥१३॥ तथा ५. हल जोतकर अन्न का दान करनेवाला कृषक इन पाँचों को समान पाप लगता है। गृहस्थ को ओखली, चक्की, चूल्ही, जल का घड़ा तथा झाडू ॥१३॥ पञ्चसूना गृहस्थस्य अहन्यहनि वर्त्तते । वैश्वदेवो बलिर्भिक्षा गोग्रासो हन्तकारकः¹ ॥१४॥ १. ग्रासमात्रं तु भिक्षा स्याद् अग्रं ग्रासचतुष्टयम् । अग्रं चतुर्गुणीकृत्य हन्तकारो विधीयते ॥ —इति मनुः Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता २३

इन पाँचों के द्वारा प्रतिदिन जीवहत्या होने से पाप लगता रहता है। इसलिए उसे प्रतिदिन वैश्वदेव, बलि, भिक्षा, गोग्रास तथा हन्त- कार करना चाहिए ॥१४॥ गृहस्थः प्रत्यहं कुर्यात् सूनादोषैर्न लिप्यते । वृक्षांश्छित्त्वा महीं भित्त्वा हत्वा च कृमि-कीटकान् ॥१५॥ ऐसा करनेवाले गृहस्थ को उपर्युक्त पाँचों स्थान की जीव-हत्या का दोष नहीं लगता । खेती में वृक्षों के काटने से, पृथ्वी को हल से फाड़ने में तथा अधोमुख हल से जोतने में, कृमि, कीट के मरने से गृहस्थ को बहुत बड़ा पाप लगता है ॥१५॥ कर्षकः खलयज्ञेन सर्वपापैः प्रमुच्यते । यो न दद्याद् द्विजातिभ्यो राशिमूलमुपागतः ॥१६॥ उन सभी पापों की निवृत्ति के लिए गृहस्थ को खलयज्ञ करना चाहिए। जो अन्न की राशि हो जाने पर ब्राह्मणों को दान नहीं देता, ॥१६॥ स चौरः स च पापिष्ठो ब्रह्मघ्नं तं विनिर्दिशेत् । राज्ञे दत्त्वा तु षड्भागं देवानां चैकविंशतिम् ॥१७॥ वह चोर तथा पापी है, उसे ब्रह्महत्यारा कहना चाहिए। इसलिए गृहस्थ को अन्न की राशि प्राप्त होने पर उसका छठा भाग राजा को, इक्कीसवाँ भाग देवताओं को, ॥१७॥ विप्राणां त्रिंशकं भागं सर्वपापैः प्रमुच्यते । क्षत्रियोऽपि कृषिं कृत्वा देवान् विप्रांश्च पूजयेत् ॥१८॥ तीसवाँ भाग ब्राह्मणों को अवश्य देना चाहिए। ऐसा करनेवाला गृहस्थ द्विज सभी प्रकार के पापों से छुटकारा पा जाता है। यह तो

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२४ पाराशरस्मृतिः [ तृतीयो- गृहस्थ ब्राह्मण की बात कही। क्षत्रिय इसी प्रकार खेती कर ब्राह्मण तथा देवताओं का पूजन करे ॥१८॥ वैश्यः शूद्रस्तथा कुर्यात् कृषि-वाणिज्य-शिल्पकान् । वि कर्म कुर्वते शूद्रा द्विजसेवा-विवर्जिताः ॥१९॥ वैश्य तथा शूद्र भी खेती, व्यापार तथा कारीगरी का काम करे। परन्तु यदि शूद्र ब्राह्मण की सेवा को छोड़कर कोई अन्य कार्य करे, तो वह अपने कर्म से विरुद्ध कर्म करनेवाला होता है ॥१९॥ भवन्त्यल्पायुषस्ते वै निरयं यान्त्यसंशयम् । चतुर्णामपि वर्णानामेष धर्मः सनातनः ॥२०॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे गृहस्थधर्माचारो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ वे अल्पायु तथा मरने पर नरक के भागी होते हैं। यह धर्म चारों वर्णों का सदैव से चला आया है, इसलिए यही सनातन धर्म है ॥ २० ॥ इस प्रकार पण्डित शिवदत्तमिश्रशास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशर- प्रोक्त धर्मशास्त्र में गृहस्थधर्माचार नामक द्वितीय अध्याय समाप्त ॥२॥ • ३. तृतीयोऽध्यायः अतः शुद्धिं² प्रवक्ष्यामि जनने मरणे तथा । दिनत्रयेण शुद्ध्यन्ति ब्राह्मणाः³ प्रेतसूतके ॥ १ ॥ गृहस्थ का धर्माचार कहकर, ग्रन्थाकार कहते हैं कि अब जन्म तथा मरण में जितने दिनों के अनन्तर गृहस्थ की शुद्धि होती है, उसे मैं कहूँगा। ब्राह्मण लोग मरणाशौच में तीन दिनों में शुद्ध होते हैं। १. '-शुश्रूष-' इति क्वचित्पुस्तके । २. 'परं' इति पा० । ३. 'जन्म' इति ।

अध्यायः ] भाषाटीकासहिता २५

अध्यायः ] भाषाटीकासहिता २५ परन्तु यह शुद्धि समानोदकों अर्थात् सात से चौदह पीढ़ी तक के लोगों के लिए ही जाननी चाहिए ॥१॥ क्षत्रियो द्वादशाहेन वैश्यः पञ्चदशाहकैः । शूद्रः शुद्ध्यति मासेन पराशरवचो यथा ॥ २ ॥ मरणशौच में क्षत्रिय बारह दिनों में, वैश्य पन्द्रह दिनों में तथा शूद्र एक मास में शुद्ध होता है, ऐसा पराशर का मत है । (यह शुद्धि सपिण्डों- सात पीढ़ी तक के भीतर के लोगों के लिए जाननी चाहिए ) ।२॥ उपाने तु विप्राणामङ्गशुद्धिश्च जायते । ब्राह्मणानां प्रसूतौ १ तु देहस्पर्शो विधीयते ॥ ३ ॥ परन्तु मरणाशौच में भी अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मण को उतने समय तक अशौच नहीं लगता, जितने समय तक वह अग्निहोत्र कर सकता है । जननाशौच में ब्राह्मण के शरीर के स्पर्श हो जाने पर भी कोई दोष नहीं लगता ॥३॥ जाते विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः । वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुद्ध्यति ॥ ४ ॥ जननाशौच में ब्राह्मण दश दिनों में, क्षत्रिय बारह दिनों में, वैश्य पन्द्रह दिनों में तथा शूद्र एक महीने में ही शुद्ध हो जाता है ॥४॥ एकाहाच्छुद्धयते विप्रो योऽग्नि-वेद-समन्वितः । त्र्यहात् केवलवेदस्तु द्विहीनो दशभिर्दिनैः ॥ ५ ॥ परन्तु जो ब्राह्मण अग्निहोत्र करनेवाला तथा वेदों का स्वाध्याय करनेवाला हो वह जननाशौच में एक ही दिन में शुद्ध हो जाता है । केवल वेदज्ञ तीन दिनों में तथा अग्निहोत्र एवं वेदज्ञान इन दोनों से शून्य ब्राह्मण दश दिन में शुद्ध होता है ॥५॥ १. विशुद्धौ' इति ।

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२६ पाराशरस्मृतिः [ तृतीयो-

जन्मकर्म-परिश्रष्टः सन्ध्योपासनवर्जितः । नामधारक-विप्रस्य दशाहं सूतकं भवेत् ॥ ६ ॥ जो ब्राह्मण जन्म से ही अपने कर्म (अध्ययन, अध्यापनादि षट्कर्म) से परिभ्रष्ट हो तथा सन्ध्योपासन आदि नित्यकर्म से रहित हो, वह केवल नाममात्र से ही ब्राह्मण हो, उसे दश दिनों का अशौच लगता है ॥६॥

अजा गावो महिष्यश्च ब्राह्मणी नवसूतिका । दशरात्रेण संशुद्ध्येद् भूमिष्ठं च नवोदकम् ॥ ७ ॥ बकरी, गाय, भैंस तथा ब्राह्मणी नव-प्रसूता होने पर दश दिनों में शुद्ध हो जाती हैं। इसी प्रकार वर्षा का जल यदि पृथिवी पर एकत्र हो गया हो तो वह भी दश दिनों में शुद्ध हो जाता है ॥७॥

एकपिण्डास्तु दायादाः पृथग् दारनिकेतनाः । जन्मन्नपि विपत्तौ च तेषां तत्सूतकं भवेत् ॥ ८ ॥ सपिण्ड (सात पीढ़ी) के भीतर भिन्न-भिन्न जाति की स्त्रियों से उत्पन्न होनेवाले तथा पृथक्-पृथक् गृहों में निवास करनेवाले पुत्र परस्पर दायाद कहे जाते हैं। उन्हें भी जननाशौच तथा मरणाशौच उसी प्रकार लगता है, जिस प्रकार पुत्रादि के उत्पन्न होने पर पिता को लगता है ॥८॥

प्राप्नोति¹ सूतकं गोत्रे चतुर्थपुरुषेण तु । दायाद् विच्छेदमाप्नोति पञ्चमो वाऽऽत्मवंशजः ॥ ९ ॥ गोत्र में भिन्न जाति की स्त्री से उत्पन्न पुरुष की चार पीढ़ी तक अशौच लगता है। मूल पुरुष की भिन्न जाति की स्त्री से उत्पन्न पाँचवाँ पुस्त पिण्ड का अधिकारी नहीं रहता ॥९॥

१. 'तावत्तत्' इति पा० ।

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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता २७ चतुर्थे दशरात्रं स्यात् षण्णिशाः पुंसि पञ्चमे । षष्ठे चतुरहाच्छुद्धिः सप्तमे तु दिनत्रयात् ॥१०॥ सपिण्ड में भी विशेष कहते हैं—मृत पुरुष के चार पुस्त तक दश रात, पाँचवीं पीढ़ी में छः दिन तक तथा छठी पीढ़ी के बाद चार दिन में शुद्धि हो जाती है । सपिण्ड में दश रात तक अशौच लगता है । यह वचन भी इसी का विकल्प है ॥१०॥ भृग्वग्निमरणे१ चैव देशान्तरमृते२ तथा । बाले प्रेते च संन्यस्ते सद्यः शौचं विधीयते ॥११॥ पहाड़ की ऊँची चोटी से गिरकर, अग्नि में जलकर, परदेश में, जन्मकाल में ही तथा संन्यास लेकर मरण हो जाने से; उसी क्षण स्नान कर लेने से ही शुद्धि हो जाती है । उपर्युक्त प्रकार से मृत्यु हो जाने पर अशौच नहीं लगता है ॥११॥ देशान्तरमृतः कश्चित् सगोत्रः श्रूयते यदि । न त्रिरात्रमहोरात्रं सद्यः स्नात्वा शुचिर्भवेत् ॥१२॥ यदि कोई अपना सगोत्र ( सपिण्ड ) देशान्तर में निवास करता हुआ मर जाये और उसकी मृत्यु का समाचार नौ दिन के अनन्तर मिले तो सगोत्र को त्रिरात्र अथवा एक रात्र का भी अशौच नहीं लगता । वह सद्यः ( उसी क्षण ) स्नान कर शुद्ध हो जाता है ॥१२॥ देशान्तरं गतो विप्रः प्रवासात् कालकारितात् । देहनाशमनुप्राप्तस्तिथिर्न ज्ञायते यदि ॥१३॥ परदेश में गये हुए ब्राह्मण की मृत्यु यदि दुर्भाग्यवश वहीं हो जाय और उसके मरने की तिथि आदि न ज्ञात हो, तो ॥१३॥ १. 'शृङ्ग्यग्नि-' इति पा० । २. 'महानद्यन्तरं यत्र गिरिर्वा व्यवधायकः । वाचो यत्र विभिद्यन्ते तद् देशान्तरमुच्यते !'—इति मनुः

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri २८ पराशरस्मृतिः [ तृतीयो-

कृष्णाष्टमी त्वमावास्या कृष्णा चैकादशी च या । उदकं पिण्डदानं च तत्र श्राद्धं च कारयेत् ॥१४॥ कृष्णपक्ष की अष्टमी, अमावास्या अथवा कृष्णपक्ष की एकादशी को उसे जल तथा पिण्ड-दान करना चाहिए और उसी दिन उसका श्राद्ध भी करना चाहिए ॥१४॥ आजातान्ता ये बाला ये च गर्भाद् विनिःसृताः । न तेषामग्निसंस्कारो नाऽशौचं नोदकक्रिया ॥१५॥ जिसके दाँत न निकले हों, तथा जन्म लेते ही जो मर जायें ऐसे बालकों के मरणोपरान्त अग्नि-संस्कार, मरणाशौच तथा जलदानादि क्रिया नहीं होती है ॥१५॥ यदि गर्भो विपद्येत स्रवते वाऽपि योषितः । यावन्मासस्थितो गर्भो दिनं तावत्तु सूतकम् ॥१६॥ यदि किसी स्त्री का गर्भपात अथवा गर्भ स्राव हो जाय तो जितने महीने पर गर्भपात अथवा स्राव हो उतने दिन ही उसे अशौच लगता है ॥१६॥ आचतुर्थाद् भवेत् स्रावः पातः पञ्चम-षष्ठयोः । इत ऊर्ध्वं प्रसूतिः स्याद् दशाहं सूतकं भवेत् ॥१७॥ चार महीने के भीतर यदि गर्भ गिरे तो उसे गर्भ-स्राव कहते हैं और यदि पाँच अथवा छः महीने तक गिरे तो उसे गर्भस्राव कहते हैं। इसके अनन्तर यदि गर्भ गिरे तो उसे प्रसूति कहते हैं, अतः प्रसूति में दश दिन का अशौच लगता है ॥१७॥ दन्तजातेऽनुजाते च कृतचूड़े च संस्थिते । अग्निसंस्करणे तेषां त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥१८॥

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५ध्यायः ] भाषाटीकासहिता २९ बालक को दाँत आया हो अथवा न आया हो, यदि उसका चूड़ाकरण संस्कार हो गया हो, तो अग्नि-संस्कार कर देने पर तीन रात तक अशौच होता है ॥१८॥ आदन्तजन्मनः सद्यः अचूडान्नैशिकी स्मृता । त्रिरात्रमाव्रतादेशाद् दशरात्रमतः परम् ॥१९॥ अब उपर्युक्त स्थल में विशेषता कहते हैं—दाँत जमने तक बालक की मृत्यु हो तो सद्यःशौच-तत्क्षण अर्थात् स्नान-मात्र से शुद्धि, दाँत जमने के अनन्तर चूड़ाकरण होने तक मृत्यु हो जाने पर एक रात, तथा चूड़ाकरण के अनन्तर व्रतबन्ध होने तक तीन दिन का एवं व्रतबन्ध के अनन्तर मृत्यु हो जाने पर सपिण्ड को दश दिन का अशौच लगता है ॥१९॥ ब्रह्मचारी गृहे येषां हूयते च हुताशनः । सम्पर्कं चेन्न कुर्वीत न तेषां सूतकं भवेत् ॥२०॥ जो ब्रह्मचारी हो अथवा जिसके घर में नित्य अग्निहोत्र होता हो वे यदि अशौचवालों से खाने-पीने तथा स्पर्श आदि का सम्बन्ध न रखें तो उन्हें अशौच नहीं लगता ॥२०॥ सम्पर्काद् दुष्यते विप्रो जनने मरणे तथा । सम्पर्कैषु¹ निवृत्तस्य न प्रेतं नैव सूतकम् ॥२१॥ ब्राह्मण तभी दोष का भागी होता है जब वह जननाशौच अथवा मरणाशौच में सम्पर्क रखता है। यदि वह उपर्युक्त दोनों अवस्थाओं में अशौचवालों से सम्पर्क न रखे तो उसे जननाशौच अथवा मरणाशौच नहीं लगता ॥२१॥ शिल्पिनः कारुका वैद्या दासी-दासाश्च नापिताः । राजानः श्रोत्रियाश्चैव सद्यः शौचाः प्रकीर्तिताः ॥२२॥ १. सम्पर्काच्च' इति।

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३० पराशरस्मृतिः [ तृतीय- शिल्पी ( चितेरा आदि ), कारुक ( रसोइया आदि ), वैद्य, दासी, दास, नाई, राजा तथा श्रोत्रिय ( वेद-पाठी ) इन लोगों की स्नान करने से ही शुद्धि हो जाती है ॥२२॥ सत्रतः मन्त्रपूतश्च आहिताग्निश्च यो द्विजः । राज्ञश्च सूतकं नास्ति यस्य चेच्छति पार्थिवः ॥२३॥ कृच्छ्र चान्द्रायणादि व्रतों को करनेवाले, यज्ञ में दीक्षा लेकर पवित्र हुए, अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मण तथा राजाओं को अशौच नहीं लगता और राजा जिसे चाहे उसे भी अशौच नहीं लगता ॥२३॥ उद्यतो निधने दाने आर्त्तो विप्रो निमन्त्रितः । तदैव ऋषिभिर्दृष्टं यथाकालेन शुद्ध्यति ॥२४॥ संग्रामादि में मरने के लिए तैयार हुआ पुरुष, तथा दान देनेके लिए उद्यत, आर्त्त ( रोगादि ग्रस्त ) और श्राद्ध में निमन्त्रित व्यक्ति उतने काल के लिए शुद्ध हो जाता है, जितने काल तक उसका प्रयोजन है, फिर उसकी अपने धर्मानुसार तत्तत् दिनों में शुद्धि होती है ॥२४॥ प्रसवे गृहमेधी तु न कुर्यात् सङ्करं यदि । दशाहाच्छुध्यते माता त्ववगाह्य पिता शुचिः ॥२५॥ यदि गृहस्थ पुत्र आदि के जन्म होने पर प्रसूति का स्पर्श न करे तो पिता उसी क्षण स्नान कर शुद्ध हा जाता है ( अर्थात् स्पर्श करने योग्य हो जाता है, परन्तु कर्म करने का अधिकारी नहीं रहता ) । माता तो दश दिन के अनन्तर ही शुद्ध होती है । दश दिन के पहले स्पर्श के योग्य नहीं रहती ॥२५॥ सर्वेषां शावमाशौचं माता-पित्रोस्तु सूतकम् । सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ॥२६॥

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ऽध्याय ] भाषाटीकासहिता ३१ मरणाशौच सपिण्ड मात्र को लगता है। परन्तु जननाशौच केवल माता तथा पिता को ही लगता है। उसमें पिता स्नान तथा आचमन करने से शुद्ध हो जाता है, किन्तु माता को दश दित तक जननाशौच होता है। (इसमें पिता को दश दित तक स्पर्श करने से दोष नहीं होता, यद्यपि वह कर्म-नित्य-नैमित्तिकादि का अधिकारी नहीं रहता) ॥२६॥ यदि पत्न्यां प्रसूतायां सम्पर्कं कुरुते द्विजः । सूतकं तु भवेत्तस्य यदि विप्रः षडङ्गवित् ॥२७॥ स्त्री के प्रसव काल में यदि ब्राह्मण प्रसूती स्त्री का स्पर्श आदि कर ले तो उसे दश दिन तक अशौच लगता ही है, चाहे वह षडंग ( १. शिक्षा, २ कल्प, ३. निरुक्त, ४. व्याकरण, ५. छन्द, ६. ज्योतिष) वेद का ज्ञाता ही क्यों न हो ॥२७॥ सम्पर्काज्जायते दोषोनाऽन्यो दोषोऽस्ति वै द्विजै । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन सम्पर्कं वर्जयेद् बुधः ॥२८॥ ब्राह्मण को सम्पर्क से ही दोष होता है, और कोई दूसरा दोष नहीं होता। इसलिए बुद्धिमान् ब्राह्मण को चाहिए कि प्रसूतिकाल में सर्वथा प्रसूति से सम्बन्ध न रखे ॥२८॥ विवाहोत्सव-यज्ञेषु त्वन्तरा मृतसूतके । पूर्वसंकल्पितं द्रव्यं दीयमानं न दुष्यति ॥२९॥ विवाह, उत्सव, (यज्ञोपवीत आदि) तथा यज्ञों के मध्य यदि जननाशौच अथवा मरणाशौच आ जाय, तो पूर्व में संकल्प किये गये द्रव्यों को देने में कोई दोष नहीं होता ॥२९॥ अन्तरा तु दशाहस्य पुनर्मरणजन्मनि । तावत् स्यादशुचिर्विप्रो यावत्तत्स्यादनिर्दशम् ॥३०॥

३२ पराशरस्मृतिः [ तृतीयो- यदि दशाह अशौच के भीतर ही कोई दूसरा जननाशौच या मरणाशौच उपस्थित हो जाय, तो प्रथम अशौच के दश दिन के भीतर ही दूसरे अशौच की शुद्धि हो जाती है । परन्तु दूसरे मृतक की स्त्री तथा लड़के को दश दिन का अशौच रहता ही है ॥३०॥ ब्राह्मणार्थे विपन्नानां बन्दिगोग्रहणे तथा । आहवेषु विपन्नानामेकरात्रमशौचकम् ॥३१॥ ब्राह्मण की रक्षा के लिए मरनेवालों का, कसाई के हाथ में पड़ी हुई गौ के छुड़ाने के लिए मरनेवालों का तथा संग्राम-स्थल में मरने- वालों का एक दिन-रात अशौच लगता है ॥३१॥ द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनौ । परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाऽभिमुखो हतः ॥३२॥ योगयुक्त ( अर्थात् योगाभ्यास में लीन ) संन्यासी तथा युद्ध में शत्रु के सम्मुख लड़कर मरनेवाला ये दोनों ही सूर्य-मण्डल को भेदकर सीधे स्वर्ग जाते हैं ॥३२॥ यत्र यत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिवेष्टितः । अक्षयान् लभते लोकान् यदि क्लीबं न भाषते ॥३३॥ शत्रुओं से घिरा हुआ वीर यदि कातर वचन न बोले और जिस- किसी भी स्थान पर शत्रु-सम्मुख लड़कर मर जाये, तो उसे अक्षय लोक मिलते हैं ॥३३॥ संन्यस्तं ब्राह्मणं दृष्ट्वा स्थानाच्चलति भास्करः । एष मे मण्डलं भित्त्वा परं स्थानं प्रयास्यति ॥३४॥ संन्यस्त ब्राह्मण को देखकर सूर्य काँप उठते हैं कि यह मेरे मण्डल का भेदकर ब्रह्मलोक को जायेगा ॥३४॥ यस्तु भग्नेषु सैन्येषु विद्रवत्सु समन्ततः । परित्राता यदा गच्छेत् स च क्रतुफलं लभेत् ॥३५॥

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ३३ सेनाओं के इधर-उधर भागने पर जो वीर उसको रक्षा के लिए शत्रु के सन्मुख होता है, उसे यज्ञ करने का फल होता है ॥ ३५ ॥ यस्य छेदक्षतं गात्रं शर-मुद्गर-यष्टिभिः । देवकन्यास्तु तं वारं हरन्ति रमयन्ति च ॥३६॥ जिस वीर पुरुष का शरीर वाण, मुद्गर तथा लाठियों की चोट से क्षत-विक्षत हो जाता है, उस वीर पुरुष को देव-कन्याएँ अपने स्थान में ले जाती हैं और उससे रमण करता हैं ॥ ३६ ॥ देवाङ्गना-सहस्राणि शूरमायोधने हतम् । त्वरमाणाः प्रधावन्ति 'मम भर्त्ता ममेति' च ॥३७॥ युद्ध में शत्रु-सन्मुख लड़कर मरनेवाले वीरों को हजारों देवांगनाएँ यह कहती उसके निकट दौड़ती हुई आती हैं कि 'यह मेरा पति है', 'यह मेरा पति है' ॥ ३७ ॥ ये यज्ञसङ्घस्तपसा च विप्राः स्वर्गैषिणो यत्र यथैव यान्ति । क्षणेन यान्त्येव हि तत्र वीराः प्राणान् सुयुद्धेन परित्यजन्तः¹ ।३८। स्वर्गादि उत्तम लोक की इच्छा रखनेवाले ब्राह्मण अनेक यज्ञ तथा तपस्या से जिस भाँति जिस लोक को प्राप्त करते हैं, धर्मपूर्वक युद्ध कर प्राण को त्यागनेवाले वीर उन-उन लोकों को उसी प्रकार क्षणभर में प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३८ ॥ जितेन लभ्यते लक्ष्मीमृतेनाऽपि सुराङ्गना । क्षणध्वंसिनी कायेऽस्मिन् का चिंता मरणे रण ? ॥३९॥ वीरों को विजय होने पर लक्ष्मी प्राप्त होती हे और मर जाने पर अप्सराओं की प्राप्ति होती है। इसलिए वे क्षणभंगुर इस शरीर की चिन्ता क्यों करें ? ॥ ३९ ॥ १. 'परित्यजन्ति' इत्यपि पाठः । ३

३४ पाराशरस्मृतिः [ तृतीयो- ललाटदेशे रुधिरं स्रवच्च यस्याहवे तु प्रविशेच्च वक्त्रम् । तत्सोमपानेन किल.स्य तुल्यं संग्रामयज्ञ विधिवच्च दृष्टम् ॥४०॥ जिस पुरुष के संग्राम-यज्ञ में शत्रुओं से चोट लगने पर ललाटदेश से गिरता हुआ रुधिर उसके मुख में प्रवेश करता है, वह विधिवत् सोम-पान के तुल्य होता है ॥ ४० ॥ अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजातयः । पदे पदे यज्ञफलमानुपूर्व्याल्लभन्ति ते ॥४१॥ जो द्विजाति, अनाथ मरे हुए ब्राह्मण को उठाकर दाह करने के लिए ले जाते हैं, वे पग-पग पर अपूर्व यज्ञ के फल को प्राप्त करते हैं ॥ ४१ ॥ न तेषामशुभं किञ्चित् पापं वा शुभकर्मणाम् । जलावगाहनात्तेषां सद्यः शौचं विधीयते ॥४२॥ ऐसे पुण्य कर्म करनेवालों को कोई अशौच आदि पाप नहीं लगते । वे स्नान करके उसी क्षण शुद्ध हो जाते हैं ॥ ४२ ॥ असगोत्रमबन्धुं च प्रेतीभूतं द्विजोत्तमम् । वहयित्वा दाहयित्वा१ च प्राणायामेन शुद्धयति ॥४३॥ जो ब्राह्मण अपना सगोत्र अथवा बन्धु नहीं है उसके मर जाने पर श्मशान में ले जाकर दाह करनेवालों को एक प्राणायाम से शुद्धि होती है ॥ ४३ ॥ अनुगम्येच्छया प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव वा । स्नात्वा सचैलं स्पृष्ट्वाऽग्निं घृतं प्राश्य विशुद्धयति ॥४४॥ १. ‘दहित्वा’ इति पा० ।