भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता २३

इन पाँचों के द्वारा प्रतिदिन जीवहत्या होने से पाप लगता रहता है। इसलिए उसे प्रतिदिन वैश्वदेव, बलि, भिक्षा, गोग्रास तथा हन्त- कार करना चाहिए ॥१४॥ गृहस्थः प्रत्यहं कुर्यात् सूनादोषैर्न लिप्यते । वृक्षांश्छित्त्वा महीं भित्त्वा हत्वा च कृमि-कीटकान् ॥१५॥ ऐसा करनेवाले गृहस्थ को उपर्युक्त पाँचों स्थान की जीव-हत्या का दोष नहीं लगता । खेती में वृक्षों के काटने से, पृथ्वी को हल से फाड़ने में तथा अधोमुख हल से जोतने में, कृमि, कीट के मरने से गृहस्थ को बहुत बड़ा पाप लगता है ॥१५॥ कर्षकः खलयज्ञेन सर्वपापैः प्रमुच्यते । यो न दद्याद् द्विजातिभ्यो राशिमूलमुपागतः ॥१६॥ उन सभी पापों की निवृत्ति के लिए गृहस्थ को खलयज्ञ करना चाहिए। जो अन्न की राशि हो जाने पर ब्राह्मणों को दान नहीं देता, ॥१६॥ स चौरः स च पापिष्ठो ब्रह्मघ्नं तं विनिर्दिशेत् । राज्ञे दत्त्वा तु षड्भागं देवानां चैकविंशतिम् ॥१७॥ वह चोर तथा पापी है, उसे ब्रह्महत्यारा कहना चाहिए। इसलिए गृहस्थ को अन्न की राशि प्राप्त होने पर उसका छठा भाग राजा को, इक्कीसवाँ भाग देवताओं को, ॥१७॥ विप्राणां त्रिंशकं भागं सर्वपापैः प्रमुच्यते । क्षत्रियोऽपि कृषिं कृत्वा देवान् विप्रांश्च पूजयेत् ॥१८॥ तीसवाँ भाग ब्राह्मणों को अवश्य देना चाहिए। ऐसा करनेवाला गृहस्थ द्विज सभी प्रकार के पापों से छुटकारा पा जाता है। यह तो

Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal