पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 34, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri २२ पाराशरस्मृतिः [ द्वितीयो- फिर दो बैलों अर्थात् कुल छः बैलों को तीसरे प्रहर तक तथा फिर दो बैलों को ( इस प्रकार कुल आठ बैलों को ) चौथे प्रहर तक । इस प्रकार आठ बैलों के द्वारा पूरे दिन धर्महल चलाकर ब्राह्मण नरक का भागी नहीं होता ॥१०॥ दानं दद्याच्च वै तेषां प्रशस्तं स्वर्गसाधनम् । संवत्सरेण यत्पापं मत्स्यघाती समाप्नुयात् ॥११॥ खेती करनेवाला दान भी करे, इस प्रकार गृहस्थ द्विज का यह अत्युत्तम स्वर्ग साधन है। मछली मारनेवाला एक वर्ष में जितना पाप कर सकता है ॥११॥ अयोमुखेन काष्ठेन ददेकाहेन लाङ्गली। पाशका मत्स्यघाती च व्याधः शाकुनिकस्तथा ॥१२॥ हल जोतनेवाला उतना पाप लोहे जड़े हुए काठ के हल से बैलों को जोतकर एक ही दिन में प्राप्त कर लेता है। १. फाँसी लगानेवाला, २. मछली मारनेवाला, ३. व्याध, ४. चिड़ीमार ॥१२॥ अदाता कर्षकश्चैव पञ्चैते समभागिनः । कण्डनी पेषणी चुल्ली उदकुम्भोऽथ मार्जनी ॥१३॥ तथा ५. हल जोतकर अन्न का दान करनेवाला कृषक इन पाँचों को समान पाप लगता है। गृहस्थ को ओखली, चक्की, चूल्ही, जल का घड़ा तथा झाडू ॥१३॥ पञ्चसूना गृहस्थस्य अहन्यहनि वर्त्तते । वैश्वदेवो बलिर्भिक्षा गोग्रासो हन्तकारकः¹ ॥१४॥ १. ग्रासमात्रं तु भिक्षा स्याद् अग्रं ग्रासचतुष्टयम् । अग्रं चतुर्गुणीकृत्य हन्तकारो विधीयते ॥ —इति मनुः Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal