भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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[Header] ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता २१

तिला रसा न विक्रेया विक्रेया धान्यतः समाः । विप्रस्यैवंविधा वृत्तिस्तृण-काष्ठादि-विक्रयः ॥ ७ ॥ कलि में भूम्यादि के अभाव में यदि ब्राह्मण कृषि न कर सके, तो उसे वाणिज्य करना चाहिए, परन्तु तिल और रस (नमक, गुड़ आदि) का विक्रय कदापि नहीं करना चाहिए। यदि तिल और रस का विक्रय (बेचना) आवश्यक हो तो उसका नकद विक्रय न कर अन्न से बदला करे। उसे तृण (भूसा आदि) तथा काष्ठ (लकड़ी) आदि का विक्रय कर अपनी जीविका चलानी चाहिए ॥७॥ ब्राह्मणश्चेत् कृषिं कुर्यात्तन्महादोषमाप्नुयात् । अष्टगव्यं धर्महलं षड्गवं वृत्तिलक्षणम् ॥ ८ ॥ ब्राह्मण को कृषि कर्म करने से बहुत बड़ा पाप लगता है। यदि कृषि के बिना निर्वाह न हो सके, तो धर्महल से खेती करे, जो दो-दो बैलों को एक-एक प्रहर जुते रहने के कारण आठ बैलों से सम्पन्न होता है। तथा धर्महल (आठ बैलों) के अभाव में अपनी वृत्ति के लिए छः बैलों की भी खेती कर सकता है। इसे वृत्तिहल भी कहते हैं ॥८॥ चतुर्गवं नृशंसानां द्विगवं गोजिघांसुवत् । द्विगवं वाहयेत् पादं मध्याह्ने तु चतुर्गवम् ॥ ९ ॥ निर्दयी पुरुष ही चार बैलों को आठ पहर तक तथा गोहत्यारा दो बैलों को आठ पहर तक जोतता है। इसलिए चार तथा दो बैलों को पूरे दिन जोतकर ब्राह्मण कृषि कर्म न करे। दो बैलों को एक प्रहर तक, फिर दो बैलों (इस प्रकार कुल चार बैलों) को मध्याह्न (दूसरे प्रहर) तक ॥९॥ षड्गवं तु त्रियामाहेऽष्टभिः पूर्णं तु वाहयेत् । नाऽऽप्नोति¹ नरकेष्वेवं वर्त्तमानस्तु वै द्विजः ॥१०॥ १. 'याति' इति पाठान्तरम् ।