भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता २७ चतुर्थे दशरात्रं स्यात् षण्णिशाः पुंसि पञ्चमे । षष्ठे चतुरहाच्छुद्धिः सप्तमे तु दिनत्रयात् ॥१०॥ सपिण्ड में भी विशेष कहते हैं—मृत पुरुष के चार पुस्त तक दश रात, पाँचवीं पीढ़ी में छः दिन तक तथा छठी पीढ़ी के बाद चार दिन में शुद्धि हो जाती है । सपिण्ड में दश रात तक अशौच लगता है । यह वचन भी इसी का विकल्प है ॥१०॥ भृग्वग्निमरणे१ चैव देशान्तरमृते२ तथा । बाले प्रेते च संन्यस्ते सद्यः शौचं विधीयते ॥११॥ पहाड़ की ऊँची चोटी से गिरकर, अग्नि में जलकर, परदेश में, जन्मकाल में ही तथा संन्यास लेकर मरण हो जाने से; उसी क्षण स्नान कर लेने से ही शुद्धि हो जाती है । उपर्युक्त प्रकार से मृत्यु हो जाने पर अशौच नहीं लगता है ॥११॥ देशान्तरमृतः कश्चित् सगोत्रः श्रूयते यदि । न त्रिरात्रमहोरात्रं सद्यः स्नात्वा शुचिर्भवेत् ॥१२॥ यदि कोई अपना सगोत्र ( सपिण्ड ) देशान्तर में निवास करता हुआ मर जाये और उसकी मृत्यु का समाचार नौ दिन के अनन्तर मिले तो सगोत्र को त्रिरात्र अथवा एक रात्र का भी अशौच नहीं लगता । वह सद्यः ( उसी क्षण ) स्नान कर शुद्ध हो जाता है ॥१२॥ देशान्तरं गतो विप्रः प्रवासात् कालकारितात् । देहनाशमनुप्राप्तस्तिथिर्न ज्ञायते यदि ॥१३॥ परदेश में गये हुए ब्राह्मण की मृत्यु यदि दुर्भाग्यवश वहीं हो जाय और उसके मरने की तिथि आदि न ज्ञात हो, तो ॥१३॥ १. 'शृङ्ग्यग्नि-' इति पा० । २. 'महानद्यन्तरं यत्र गिरिर्वा व्यवधायकः । वाचो यत्र विभिद्यन्ते तद् देशान्तरमुच्यते !'—इति मनुः