पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri २८ पराशरस्मृतिः [ तृतीयो-
कृष्णाष्टमी त्वमावास्या कृष्णा चैकादशी च या । उदकं पिण्डदानं च तत्र श्राद्धं च कारयेत् ॥१४॥ कृष्णपक्ष की अष्टमी, अमावास्या अथवा कृष्णपक्ष की एकादशी को उसे जल तथा पिण्ड-दान करना चाहिए और उसी दिन उसका श्राद्ध भी करना चाहिए ॥१४॥ आजातान्ता ये बाला ये च गर्भाद् विनिःसृताः । न तेषामग्निसंस्कारो नाऽशौचं नोदकक्रिया ॥१५॥ जिसके दाँत न निकले हों, तथा जन्म लेते ही जो मर जायें ऐसे बालकों के मरणोपरान्त अग्नि-संस्कार, मरणाशौच तथा जलदानादि क्रिया नहीं होती है ॥१५॥ यदि गर्भो विपद्येत स्रवते वाऽपि योषितः । यावन्मासस्थितो गर्भो दिनं तावत्तु सूतकम् ॥१६॥ यदि किसी स्त्री का गर्भपात अथवा गर्भ स्राव हो जाय तो जितने महीने पर गर्भपात अथवा स्राव हो उतने दिन ही उसे अशौच लगता है ॥१६॥ आचतुर्थाद् भवेत् स्रावः पातः पञ्चम-षष्ठयोः । इत ऊर्ध्वं प्रसूतिः स्याद् दशाहं सूतकं भवेत् ॥१७॥ चार महीने के भीतर यदि गर्भ गिरे तो उसे गर्भ-स्राव कहते हैं और यदि पाँच अथवा छः महीने तक गिरे तो उसे गर्भस्राव कहते हैं। इसके अनन्तर यदि गर्भ गिरे तो उसे प्रसूति कहते हैं, अतः प्रसूति में दश दिन का अशौच लगता है ॥१७॥ दन्तजातेऽनुजाते च कृतचूड़े च संस्थिते । अग्निसंस्करणे तेषां त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥१८॥
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal