पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्याय ] भाषाटीकासहिता ३१ मरणाशौच सपिण्ड मात्र को लगता है। परन्तु जननाशौच केवल माता तथा पिता को ही लगता है। उसमें पिता स्नान तथा आचमन करने से शुद्ध हो जाता है, किन्तु माता को दश दित तक जननाशौच होता है। (इसमें पिता को दश दित तक स्पर्श करने से दोष नहीं होता, यद्यपि वह कर्म-नित्य-नैमित्तिकादि का अधिकारी नहीं रहता) ॥२६॥ यदि पत्न्यां प्रसूतायां सम्पर्कं कुरुते द्विजः । सूतकं तु भवेत्तस्य यदि विप्रः षडङ्गवित् ॥२७॥ स्त्री के प्रसव काल में यदि ब्राह्मण प्रसूती स्त्री का स्पर्श आदि कर ले तो उसे दश दिन तक अशौच लगता ही है, चाहे वह षडंग ( १. शिक्षा, २ कल्प, ३. निरुक्त, ४. व्याकरण, ५. छन्द, ६. ज्योतिष) वेद का ज्ञाता ही क्यों न हो ॥२७॥ सम्पर्काज्जायते दोषोनाऽन्यो दोषोऽस्ति वै द्विजै । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन सम्पर्कं वर्जयेद् बुधः ॥२८॥ ब्राह्मण को सम्पर्क से ही दोष होता है, और कोई दूसरा दोष नहीं होता। इसलिए बुद्धिमान् ब्राह्मण को चाहिए कि प्रसूतिकाल में सर्वथा प्रसूति से सम्बन्ध न रखे ॥२८॥ विवाहोत्सव-यज्ञेषु त्वन्तरा मृतसूतके । पूर्वसंकल्पितं द्रव्यं दीयमानं न दुष्यति ॥२९॥ विवाह, उत्सव, (यज्ञोपवीत आदि) तथा यज्ञों के मध्य यदि जननाशौच अथवा मरणाशौच आ जाय, तो पूर्व में संकल्प किये गये द्रव्यों को देने में कोई दोष नहीं होता ॥२९॥ अन्तरा तु दशाहस्य पुनर्मरणजन्मनि । तावत् स्यादशुचिर्विप्रो यावत्तत्स्यादनिर्दशम् ॥३०॥