पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
ऽध्याय ] भाषाटीकासहिता ३१ मरणाशौच सपिण्ड मात्र को लगता है। परन्तु जननाशौच केवल माता तथा पिता को ही लगता है। उसमें पिता स्नान तथा आचमन करने से शुद्ध हो जाता है, किन्तु माता को दश दित तक जननाशौच होता है। (इसमें पिता को दश दित तक स्पर्श करने से दोष नहीं होता, यद्यपि वह कर्म-नित्य-नैमित्तिकादि का अधिकारी नहीं रहता) ॥२६॥ यदि पत्न्यां प्रसूतायां सम्पर्कं कुरुते द्विजः । सूतकं तु भवेत्तस्य यदि विप्रः षडङ्गवित् ॥२७॥ स्त्री के प्रसव काल में यदि ब्राह्मण प्रसूती स्त्री का स्पर्श आदि कर ले तो उसे दश दिन तक अशौच लगता ही है, चाहे वह षडंग ( १. शिक्षा, २ कल्प, ३. निरुक्त, ४. व्याकरण, ५. छन्द, ६. ज्योतिष) वेद का ज्ञाता ही क्यों न हो ॥२७॥ सम्पर्काज्जायते दोषोनाऽन्यो दोषोऽस्ति वै द्विजै । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन सम्पर्कं वर्जयेद् बुधः ॥२८॥ ब्राह्मण को सम्पर्क से ही दोष होता है, और कोई दूसरा दोष नहीं होता। इसलिए बुद्धिमान् ब्राह्मण को चाहिए कि प्रसूतिकाल में सर्वथा प्रसूति से सम्बन्ध न रखे ॥२८॥ विवाहोत्सव-यज्ञेषु त्वन्तरा मृतसूतके । पूर्वसंकल्पितं द्रव्यं दीयमानं न दुष्यति ॥२९॥ विवाह, उत्सव, (यज्ञोपवीत आदि) तथा यज्ञों के मध्य यदि जननाशौच अथवा मरणाशौच आ जाय, तो पूर्व में संकल्प किये गये द्रव्यों को देने में कोई दोष नहीं होता ॥२९॥ अन्तरा तु दशाहस्य पुनर्मरणजन्मनि । तावत् स्यादशुचिर्विप्रो यावत्तत्स्यादनिर्दशम् ॥३०॥
३२ पराशरस्मृतिः [ तृतीयो- यदि दशाह अशौच के भीतर ही कोई दूसरा जननाशौच या मरणाशौच उपस्थित हो जाय, तो प्रथम अशौच के दश दिन के भीतर ही दूसरे अशौच की शुद्धि हो जाती है । परन्तु दूसरे मृतक की स्त्री तथा लड़के को दश दिन का अशौच रहता ही है ॥३०॥ ब्राह्मणार्थे विपन्नानां बन्दिगोग्रहणे तथा । आहवेषु विपन्नानामेकरात्रमशौचकम् ॥३१॥ ब्राह्मण की रक्षा के लिए मरनेवालों का, कसाई के हाथ में पड़ी हुई गौ के छुड़ाने के लिए मरनेवालों का तथा संग्राम-स्थल में मरने- वालों का एक दिन-रात अशौच लगता है ॥३१॥ द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनौ । परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाऽभिमुखो हतः ॥३२॥ योगयुक्त ( अर्थात् योगाभ्यास में लीन ) संन्यासी तथा युद्ध में शत्रु के सम्मुख लड़कर मरनेवाला ये दोनों ही सूर्य-मण्डल को भेदकर सीधे स्वर्ग जाते हैं ॥३२॥ यत्र यत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिवेष्टितः । अक्षयान् लभते लोकान् यदि क्लीबं न भाषते ॥३३॥ शत्रुओं से घिरा हुआ वीर यदि कातर वचन न बोले और जिस- किसी भी स्थान पर शत्रु-सम्मुख लड़कर मर जाये, तो उसे अक्षय लोक मिलते हैं ॥३३॥ संन्यस्तं ब्राह्मणं दृष्ट्वा स्थानाच्चलति भास्करः । एष मे मण्डलं भित्त्वा परं स्थानं प्रयास्यति ॥३४॥ संन्यस्त ब्राह्मण को देखकर सूर्य काँप उठते हैं कि यह मेरे मण्डल का भेदकर ब्रह्मलोक को जायेगा ॥३४॥ यस्तु भग्नेषु सैन्येषु विद्रवत्सु समन्ततः । परित्राता यदा गच्छेत् स च क्रतुफलं लभेत् ॥३५॥
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ३३ सेनाओं के इधर-उधर भागने पर जो वीर उसको रक्षा के लिए शत्रु के सन्मुख होता है, उसे यज्ञ करने का फल होता है ॥ ३५ ॥ यस्य छेदक्षतं गात्रं शर-मुद्गर-यष्टिभिः । देवकन्यास्तु तं वारं हरन्ति रमयन्ति च ॥३६॥ जिस वीर पुरुष का शरीर वाण, मुद्गर तथा लाठियों की चोट से क्षत-विक्षत हो जाता है, उस वीर पुरुष को देव-कन्याएँ अपने स्थान में ले जाती हैं और उससे रमण करता हैं ॥ ३६ ॥ देवाङ्गना-सहस्राणि शूरमायोधने हतम् । त्वरमाणाः प्रधावन्ति 'मम भर्त्ता ममेति' च ॥३७॥ युद्ध में शत्रु-सन्मुख लड़कर मरनेवाले वीरों को हजारों देवांगनाएँ यह कहती उसके निकट दौड़ती हुई आती हैं कि 'यह मेरा पति है', 'यह मेरा पति है' ॥ ३७ ॥ ये यज्ञसङ्घस्तपसा च विप्राः स्वर्गैषिणो यत्र यथैव यान्ति । क्षणेन यान्त्येव हि तत्र वीराः प्राणान् सुयुद्धेन परित्यजन्तः¹ ।३८। स्वर्गादि उत्तम लोक की इच्छा रखनेवाले ब्राह्मण अनेक यज्ञ तथा तपस्या से जिस भाँति जिस लोक को प्राप्त करते हैं, धर्मपूर्वक युद्ध कर प्राण को त्यागनेवाले वीर उन-उन लोकों को उसी प्रकार क्षणभर में प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३८ ॥ जितेन लभ्यते लक्ष्मीमृतेनाऽपि सुराङ्गना । क्षणध्वंसिनी कायेऽस्मिन् का चिंता मरणे रण ? ॥३९॥ वीरों को विजय होने पर लक्ष्मी प्राप्त होती हे और मर जाने पर अप्सराओं की प्राप्ति होती है। इसलिए वे क्षणभंगुर इस शरीर की चिन्ता क्यों करें ? ॥ ३९ ॥ १. 'परित्यजन्ति' इत्यपि पाठः । ३
३४ पाराशरस्मृतिः [ तृतीयो- ललाटदेशे रुधिरं स्रवच्च यस्याहवे तु प्रविशेच्च वक्त्रम् । तत्सोमपानेन किल.स्य तुल्यं संग्रामयज्ञ विधिवच्च दृष्टम् ॥४०॥ जिस पुरुष के संग्राम-यज्ञ में शत्रुओं से चोट लगने पर ललाटदेश से गिरता हुआ रुधिर उसके मुख में प्रवेश करता है, वह विधिवत् सोम-पान के तुल्य होता है ॥ ४० ॥ अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजातयः । पदे पदे यज्ञफलमानुपूर्व्याल्लभन्ति ते ॥४१॥ जो द्विजाति, अनाथ मरे हुए ब्राह्मण को उठाकर दाह करने के लिए ले जाते हैं, वे पग-पग पर अपूर्व यज्ञ के फल को प्राप्त करते हैं ॥ ४१ ॥ न तेषामशुभं किञ्चित् पापं वा शुभकर्मणाम् । जलावगाहनात्तेषां सद्यः शौचं विधीयते ॥४२॥ ऐसे पुण्य कर्म करनेवालों को कोई अशौच आदि पाप नहीं लगते । वे स्नान करके उसी क्षण शुद्ध हो जाते हैं ॥ ४२ ॥ असगोत्रमबन्धुं च प्रेतीभूतं द्विजोत्तमम् । वहयित्वा दाहयित्वा१ च प्राणायामेन शुद्धयति ॥४३॥ जो ब्राह्मण अपना सगोत्र अथवा बन्धु नहीं है उसके मर जाने पर श्मशान में ले जाकर दाह करनेवालों को एक प्राणायाम से शुद्धि होती है ॥ ४३ ॥ अनुगम्येच्छया प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव वा । स्नात्वा सचैलं स्पृष्ट्वाऽग्निं घृतं प्राश्य विशुद्धयति ॥४४॥ १. ‘दहित्वा’ इति पा० ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ३५ अपनी इच्छा से जाति अथवा परजाति के मुरदे के पीछे जाने- वाले को वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए । पश्चात् अग्नि का स्पर्श कर, उस दिन केवल घी चाटकर रहे तब उसकी शुद्धि होती है ॥४४॥ क्षत्रियं मृतमज्ञानाद् ब्राह्मणो योऽनुगच्छति । एकाहमशुचिर्भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्धयति ॥४५॥ जो ब्राह्मण अज्ञान से किसी मरे हुए क्षत्रिय के पीछे दाह के लिए जाता है, उसे एक दिन-रात का अशौच लगता है । फिर दूसरे दिन पंचगव्य पान करने से उसकी शुद्धि होती है ॥ ४५ ॥ शवं १तद्वैश्यमज्ञानाद् ब्राह्मणो २योऽनुगच्छति । कृत्वाऽशौचं द्विरात्रं च प्राणायामान् षडाचरेत् ॥४६॥ जो ब्राह्मण अज्ञान से किसी मरे हुए वैश्य के पीछे जाता है उसे दो दिन का अशौच लगता है, तदनन्तर तीसरे दिन छः प्राणायाम से उसकी शुद्धि होती है ॥ ४६ ॥ प्रेतीभूतं तु यः शूद्रं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः । अनुगच्छेन्नीयमानं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥४७॥ जो ब्राह्मण अज्ञान-वश किसी मरे हुए शूद्र के पीछे जाता है उसे तीन दिन-रात का अशौच लगता है ॥ ४७ ॥ त्रिरात्रे तु ततः पूर्णे नदीं गत्वा समुद्रगाम् । प्राणायामशतं कृत्वा घृतं प्राश्य विशुद्धयति ॥४८॥ तीन दिन-रात बीतने के पश्चात् किसी समुद्रगामिनी ( समुद्र में जाकर मिलनेवाली ) नदी में जाकर स्नान करे और सौ प्राणायाम करने के उपरान्त घी का भोजन करे तो उसकी शुद्धि होती है ॥४८॥ १. 'च' इत्यपि पा० । २. 'ह्य' इति ।
३६ पाराशरस्मृतिः [ चतुर्थो- विनिर्वर्त्य यदा शूद्रा उदकान्तमुपस्थिताः । द्विजैस्तदानुगन्तव्या एष धर्मः सनातनः ॥४९॥ जब शूद्र लोग दाह कर प्रेत को जलांजलि दे घर लौट आवें तब ब्राह्मणादि वर्णों को उनके घर जाना चाहिए, यह सनातन धर्म है ॥ ४९ ॥ तस्माद् द्विजो मृतं शूद्रं न स्पृशेन्न च दाहयेत् । दृष्टे सूर्यविलोकेन शुद्धिरेषा पुरातनी ॥५०॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे जनन-मरण-सूतकादिशुद्धिर्नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इसलिए ब्राह्मण किसी मरे हुए शूद्र का न तो स्पर्श करें और न उसे जलावें। यदि कदाचित् देख भी लें तो भगवान् सूर्य के दर्शन कर लेने से शुद्ध हो जाते हैं। यही प्राचीन परिपाटी है ॥ ५० ॥ इस प्रकार 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशरीय धर्मशास्त्र में जनन-मरण-सूतकादि- शुद्धि नामक तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ • ४. चतुर्थोऽध्यायः अतिमानादतिक्रोधात् स्नेहाद् वा यदि वा भयात् । उद्वध्नीयात् स्त्री पुमान् वा गतिरेषा विधीयते ॥ १ ॥ यदि कोई स्त्री अथवा पुरुष अत्यन्त मान से, क्रोध से, स्नेह से अथवा अत्यन्त भय से फांसी लगाकर या आग में जलकर, जल में डूबकर, पर्वतादि से गिरकर आत्महत्या कर ले तो उसकी गति इस प्रकार होती है ॥ १ ॥ पूय-शोणित-सम्पूर्णे त्वन्धे तमसि मज्जति । षष्टिवर्ष-सहस्राणि नरकं प्रतिपद्यते ॥ २ ॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ३७ वह पीव और रक्त से भरे हुए अन्धतामिस्र नामक नरक में साठ हजार वर्ष तक पड़ा रहता है ॥ २ ॥ नाऽशौचं नोदकं नाऽग्निं नाऽश्रुपातं च कारयेत् । वोढारोऽग्निप्रदातारः पाशच्छेदकरास्तथा ॥ ३ ॥ इस प्रकार मरनेवाले पुरुष के लिए अशौच, जलदान तथा दाहादि कर्म न करे, उनके लिए रोवे भी नहीं । जो लोग उन्हें उठा- कर० श्मशान में दाह करते हैं, उनका बन्धन काटते हैं ॥ ३ ॥ तप्तकृच्छ्रेण शुद्ध्यन्तीत्येवमाह प्रजापतिः । गोभिर्हतं तथोद्बद्धं ब्राह्मणेन तु घातितम् ॥ ४ ॥ वे तप्तकृच्छ्र व्रत से शुद्ध होते हैं । जो गौ से मारा गया हो, फांसी लगाकर मरा हो अथवा ब्राह्मणों ने जिनको मार डाला हो ॥ ४ ॥ सम्पृशन्ति तु ये विप्रा वोढारश्चाऽग्निदाश्च ये । अन्ये ये चाऽनुगन्तारः पाशच्छेदकराश्च ये ॥ ५ ॥ उस मरे हुए को जो लोग स्पर्श करते हैं, श्मशान पर ले जाकर दाह करते हैं अथवा उसके पीछे-पीछे जाते हैं या उसकी फांसी काटते हैं ॥ ५ ॥ तप्तकृच्छ्रेण शुद्धास्ते कुर्युर्ब्राह्मणभोजनम् । अनडुत्सहितां गां च दद्युर्विप्राय दक्षिणाम् ॥ ६ ॥ वे तप्तकृच्छ्र व्रत-द्वारा शुद्ध होकर ब्राह्मण भोजन करावें और गाय, बैल के १ जोड़े दक्षिणा में दान करें ॥ ६ ॥ त्र्यहमुष्णं पिवेद् वारि त्र्यहमुष्णं पयः पिवेत् । त्र्यहमुष्णं पिवेत् सर्पिर्वायुभक्षो दिनत्रयम् ॥ ७ ॥
३८ पाराशरस्मृतिः [ चतुर्थो- तप्तकृच्छ्र व्रत की विधि इस प्रकार है—व्रत करनेवाला पुरुष तीन दिन तक उष्ण जल पीवे, पश्चात् तीन दिन गरम दूध पीवे, फिर तीन दिन तक घी पीवे और उसके बाद तीन दिन तक कुछ न खाये । इस प्रकार १२ दिन का एक तप्तकृच्छ्र होता है ॥ ७ ॥ षट्पलं तु पिबेदम्भस्त्रिपलं तु पयः पिबेत् । पलमेकं पिबेत् सर्पिस्तप्तकृच्छ्रं विधीयते ॥ ८ ॥ उपर्युक्त व्रत में विहित जलादि का परिमाण इस प्रकार है—छः पल ( २४ तोले ) जल प्रतिदिन, तीन पल ( १२ तोले ) दूध प्रतिदिन, एक पल ( ४ तोले ) घी प्रतिदिन पीवे । यही तप्तकृच्छ्र व्रत में पीये जानेवाले जल, दूध तथा घी का परिमाण है ॥ ८ ॥ यो वै समाचरेद् विप्रः पतितादिष्वकामतः । पञ्चाहं वा दशाहं वा द्वादशाहमथापि वा ॥ ९ ॥ जो ब्राह्मण अनिच्छा से पतितों के साथ पाँच, दश अथवा बारह दिन तक निवास करे ॥ ९ ॥ मासार्द्धं मासमेकं वा मासद्वयमथापि वा । अब्दार्द्धमब्दमेकं वा १तदूर्ध्वं चैव तत्समः ॥१०॥ अथवा पतितों के साथ पन्द्रह दिन, एक महीना, दो महीना, छः महीना वा एक वर्ष निवास करे, तो उसे वक्ष्यमाण ( आगे कहे गये ) प्रायश्चित्त करना चाहिए। एक वर्ष के बाद अनिच्छा से भी पतित संसर्ग करने पर वह उन्हीं के तुल्य हो जाता है । ( उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है ) ॥ १० ॥ त्रिरात्रं प्रथमे पक्षे द्वितीये कृच्छ्रमाचरेत् । तृतीये चैव पक्षे तु कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥११॥ १, 'भवेदूर्ध्वं हि तत्समः' इति क्वचित्पुस्तके ।
५ध्यायः ] भाषाटीकासहिता ३९ उपर्युक्त आठ प्रकार के प्रायश्चित्तों को विधि इस प्रकार है— प्रथम पाँच दिन अनिच्छा से पतित का संसर्ग होने पर त्रिरात्र, दूसरे दश दिन का साथ होने पर कृच्छ्र, तीसरे बारह दिन ससर्ग होने पर कृच्छ्रसान्तपन, ॥ ११ ॥ चतुर्थे दशरात्रं स्यात् पराकः पञ्चमे मतः । कुर्याच्चान्द्रायणं षष्ठे सप्तमे त्वेन्दर-द्वयम् ॥ १२ ॥ चौथे पन्द्रह दिन का संसर्ग होने पर दश रात्र, पाँचवें एक महीने संसर्ग होने पर पराक व्रत, छठे दो महीने संसर्ग होने पर चान्द्रायण, सातवें छः महीने के संसर्ग होने में दो चान्द्रायण ॥ १२ ॥ शुद्धयर्थमष्टमे चैव षण्मासान् कृच्छ्रमाचरेत् । पक्षसंख्याप्रमाणेन सुवर्णान्यपि दक्षिणा ॥१३॥ तथा आठवें एक वर्ष तक संसर्ग होने पर छः महीने तक कृच्छ्रव्रत करना चाहिए और जितने पक्ष पतितों के साथ रहे, व्रतोपरान्त उतने- उतने मुहर की दक्षिणा देवे ॥ १३ ॥ ऋतुस्नाता तु या नारी भर्त्तारं नोपसर्पति । सा मृता नरकं याति विधवा च पुनः पुनः ॥१४॥ रजस्वला होने के उपरान्त चौथे दिन स्नान कर लेने के बाद जो स्त्री अपने पति के पास नहीं जाती, वह मरकर नरक में जाती है और मृत्युलोक में आने पर बारम्बार विधवा होती है ॥ १४ ॥ ऋतुस्नातां तु यो भार्या सन्निधौ नोपगच्छति । घोरायां भ्रूणहत्यायां युज्यते नाऽत्र संशयः ॥१५॥ जो पुरुष ऋतु-काल के अनन्तर चौथे दिन स्नान कर शुद्ध हुई अपनी स्त्री के पास नहीं जाता, उसे भ्रूण हत्या का पाप लगता है, इसमें संशय नहीं ॥ १५ ॥
४० पाराशरस्मृतिः [ चतुर्थो- दरिद्रं व्याधितं धूर्तं १ भर्त्तारं याऽवमन्यते । सा शुनी जायते मृत्वा सूकरी च पुनः पुनः ॥१६॥ जो स्त्री अपने दरिद्र, रोगी अथवा धूर्त्त पति का अपमान करती है, वह मरने के अनन्तर बारम्बार कुतिया या शूक़री होती है ॥ १६ ॥ पत्यौ जीवति या नारी उपोष्य व्रतमाचरेत् । आयुष्यं हरते भर्त्तुः सा नारी नरकं व्रजेत् ॥१७॥ जो स्त्री अपने पति के जीवित रहने प . ( उसको आज्ञा के बिना ) व्रत अथवा उपवास करती है वह अपने पति को अल्पायु बनाती है तथा मरकर स्वयं भी नरक में जाती है ॥ १७ ॥ अपृष्ट्वा चैव भर्त्तारं या नारी कुरुते व्रतम् । सर्वं तद्राक्षसान् गच्छेदित्येवं मनुरब्रवीत् ॥१८॥ मनु का तो मत है कि जो स्त्री अपने पति की अनुमति के बिना ही व्रत का आचरण करती है उसे उस व्रत का फल न मिलकर राक्षसों को प्राप्त होता है ॥१८॥ बान्धवानां सजातीनां दुर्वृत्तं कुरुते तु या । गर्भपातं च या कुर्यान्न तां सम्भाषयेत् क्वचित् ॥१९॥ जो स्त्री अपने कुटुम्ब तथा सजातियों को अपने दुराचरण से हानि पहुँचावे अथवा गर्भपात करे, ऐसी स्त्री से किसी काल में भी सम्भाषणादि न करे ॥१९॥ यत्पापं ब्रह्महत्यायां द्विगुणं गर्भपातने । प्रायश्चित्तं न तस्याः २स्यात्तस्यास्त्यागो विधीयते ॥२०॥ १. 'मूर्ख' इत्यपि पाठः । २. 'तस्याऽस्ति' इति ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४१ ब्रह्महत्या में जितना पाप लगता है उसका दूना पाप गर्भ के गिराने से होता है, अतः उसका कोई प्रायश्चित्त नहीं है। इसलिए ऐसी स्त्री को त्याग देना ही श्रेयस्कर है ॥२०॥ न कार्यमावसथ्येन नाऽग्निहोत्रेण वा पुनः । स भवेत् कर्मचाण्डालो यस्तु धर्मपराङ्मुखः ॥२१॥ जो पुरुष धर्म से विमुख है उसके आवसथ्य (स्नाताग्नि) और अग्निहोत्र करने से कोई फल नहीं होता । वह तो कर्म से चाण्डाल कहा जाता है ॥२१॥ १ओघ-वाताऽऽहृतं बीजं यस्य क्षेत्रे प्ररोहति । २क्षेत्री तल्लभते बीजं न बीजी भागमर्हति ॥२२॥ जिस प्रकार जल और वायु के वेग से किसी का बीज दूसरे के क्षेत्र में उत्पन्न हो तो उस बीज का मालिक खेत का स्वामी होता है, बीज का मालिक नहीं ॥२२॥ तद्वत् परस्त्रियाः३ पुत्रौ द्वौ सुतौ कुण्ड गोलकौ । पत्यौ जीवति कुण्डः स्यात् मृते भर्त्तरि गोलकः ॥२३॥ उसी प्रकार दूसरे की स्त्री में दूसरे से उत्पन्न हुआ पुत्र उस स्त्री के स्वामी का ही होता है, उपपति का नहीं । इस प्रकार दूसरे के क्षेत्र में उपपति से उत्पन्न किये गये पुत्र के भी दो भेद हैं । प्रथम कुण्ड तथा दूसरा गोलक । पति के जीते-जी उपपति के द्वारा स्त्री में उत्पन्न पुत्र 'कुण्ड' कहा जाता है और पति के मरने पर उपपति से उत्पन्न पुत्र 'गोलक' कहा जाता है ॥२३॥ औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिमकः सुतः । दद्यान्माता पिता वाऽपि स पुत्रौ दत्तको भवेत् ॥२४॥ १. 'अम्बु इति । २. 'स क्षेत्री लभते' इति । ३. स्त्रियः' इति ।
४२ पाराशरस्मृतिः [ चतुर्थो- इस प्रकार पुत्र तीन प्रकार के होते हैं : १ औरस (अपनी सजा- तीय भार्या में स्वपति से उत्पन्न), २. क्षेत्रज (दूसरे की स्त्री में उपपति से उत्पन्न हुआ पुत्र) तथा ३. दत्तक पुत्र, जिसे कृत्रिम भी कहते हैं। जिसे माता-पिता अपनी इच्छा से दे दें वह उसका दत्तक (कृत्रिम) पुत्र हो जाता है ॥२४॥ परिवित्तिः परिवेत्ता यया च परिविद्यते । सर्वे ते नरकं यान्ति दातृयाजकपञ्चमाः ॥२५॥ १. परिवित्ति, २. परिवेत्ता, ३. परिवेत्ता से ब्याही गयी कन्या, ४. परिवेत्ता को कन्यादान करनेवाला दाता तथा ५. परिवेत्ता से कन्या का विवाह करनेवाला ब्राह्मण ये पाँचों नरक में जाते हैं। (बड़े भाई के रहते हुए जिसने अपना विवाह कर लिया वह 'परिवेत्ता' तथा उसका बड़ा भाई 'परिवित्ति' कहा जाता है) ॥२५॥ द्वौ कृच्छ्रौ परिवित्तेस्तु कन्यायाः कृच्छ्र एव च । कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ दातस्तु होता चान्द्रायणं चरेत् । २६ ।। 'परिवित्ति' को दो कृच्छ्र व्रत करना चाहिए। कन्या को एक कृच्छ्र व्रत, दाता को कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्र व्रत तथा विवाह करानेवाले को 'चान्द्रायण' व्रत करना चाहिए। ऐसा करने से उन्हें पाप नहीं लगता ॥२६॥ कुब्ज-वामन-षण्ढेषु गद्गदेषु जडेषु च । जात्यन्धे बधिरे मूके न दोषः परिवेदने १ ॥२७॥ यदि जेठा भाई लँगड़ा, वामन, नपुंसक, तोतला बोलनेवाला, जड़, जन्मान्ध, बधिर तथा गूँगा हो और उस अवस्था में छोटा भाई व्याह कर ले तो वह 'परिवेत्ता' नहीं कहा जाता ॥२७॥ १. 'परिविन्दतः' इति ।
-ध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४३ पितृव्यपुत्रः सापत्नः परनारीसुतस्तथा। दाराऽग्निहोत्र-संयोगे न दोषः परिवेदने ॥२८॥ चचेरा भाई, सौतेला भाई तथा पर स्त्री से उत्पन्न हुआ ( दत्तक आदि ) सुतों को जेठे भाई के रहते, दारसंयोग ( ब्याह ) अथवा अग्निहोत्र कर लेने में कोई पाप नहीं लगता ॥२८॥ ज्येष्ठो भ्राता यदा तिष्ठेदाधानं नैव कारयेत् । अनुज्ञातस्तु कुर्वीत शंखस्य वचनं यथा ॥२९॥ बड़े भाई के रहते छोटा भाई अग्निहोत्र कार्य न करे । किन्तु शंख के वचनानुसार बड़े भाई की आज्ञा से छोटा भाई अग्निहोत्र कर सकता है, इसमें कोई दोष नहीं होता ॥२९॥ नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ । पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ॥३०॥ यदि कन्या का वाग्दान हो जाने पर पति १. नष्ट, २. मृत, ३. संन्यासी, ४. क्लीब ( नपुंसक ) तथा ५. पतित ज्ञात हो जाय तो इन पाँच आपत्तियों में कन्या का दूसरा विवाह कर देना चाहिए ! (यहाँ 'पतितेऽपतौ' में 'अपतौ' ऐसा खण्ड है जा 'पतिः समास एव' से घि संज्ञा, तथा 'अच्च घेः' सूत्र से ङि को 'औ' तथा घि को अत् हो गया है, 'न पतिः अपतिस्तस्मिन्नपतौ' ऐसा विग्रह करना चाहिए । जिसका अर्थ है—'ईषत् पतौ' क्योंकि नञ् का ईषत् अर्थ होता है। जैसे 'अनुदरा कन्या' अर्थात् वाग्दानान्तरं सप्तपदाक्रमणात् पूर्वम् ) अन्यथा वक्ष्यमाण ३१वें श्लोक से विरोध होगा ॥३०॥ मृते भर्त्तरि या नारी ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता । सा मृता लभते स्वर्गं यथा ते ब्रह्मचारिणः ॥३१॥
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ४४ पाराशरस्मृतिः [ पञ्चमो- जो स्त्री अपने पति के मर जाने पर ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई अपने दिन को बिताती है वह मरने पर ब्रह्मचारियों की भाँति स्वर्ग को जाती है ॥३१॥ तिस्रः कोट्योऽर्द्धकोटी च यानि लोमानि मानुषे । तावत्कालं वसेत् स्वर्गे भर्तारं याऽनुगच्छति ॥३२॥ जो स्त्री अपने पति के मर जाने पर उसके साथ ही प्राण त्यागकर पातिव्रत्य धर्म का पालन करती है वह मनुष्य शरोर में रहनेवाले साढ़े तीन करोड़ रोयें के बराबर उतने हो वर्ष तक स्वर्ग में वास करती है ॥३२॥ व्यालग्राही यथा व्यालं बलादुद्धरते बिलात् । एवं स्त्री पतिमुद्धृत्य तेनैव सह मोदते ॥३३॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे उद्बन्धनादिमृतशुद्धिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ जिस प्रकार सपेरा साँप को उसके बिल से बलात् निकाल लेता है उसी प्रकार पतिव्रता स्त्री भी अपने तप के प्रभाव से लोकान्तर में गये हुए अपने पति को खोजकर उसके साथ विहार करती है ॥३३॥ इस प्रकार 'शिवदत्ती' भाषाटीका में, पाराशरीय धर्मशास्त्र में उद्बन्धनादिमृतशुद्धि नामक चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥ • ५. पञ्चमोऽध्यायः वृक-श्वान-शृगालाद्यैर्दष्टो यस्तु द्विजोत्तमः । स्नात्वा जपेत् स गायत्रीं पवित्रां वेदमातरम् ॥ १ ॥ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४५ जिस ब्राह्मण को भेड़िया, कुत्ता अथवा शृगाल आदि नीच जानवरों ने काट खाया हो, तो वह स्नान कर वेदमाता गायत्री का जप करे ॥ १ ॥ गवां शृङ्गोदकैः स्नानं महानद्योस्तु सङ्गमे । समुद्रदर्शनाद् वाऽपि शुना दष्टः शुचिर्भवेत् ॥ २ ॥ अब विशेष कहते हैं कि जिस ब्राह्मण को कुत्ते ने काट लिया हो वह गौ के शृङ्ग ( सींग ) के जल से स्नान करे अथवा समुद्रगामिनी दो महानदियों के संगम में स्नान करे या समुद्र का दर्शन करे तब उसकी शुद्धि होती है ॥ २ ॥ वेद-विद्या-व्रतस्नातः शुना दष्टो द्विजो यदि । स हिरण्योदकैः स्नात्वा घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति ॥ ३ ॥ यदि किसी वेदज्ञ अथवा चतुर्दश-विद्यासम्पन्न अथवा उत्तम व्रत करनेवाले किसी ब्राह्मण को कुत्ते ने काट लिया हो, तो वह सोने को धोकर, उस पानी से स्नान करे, पश्चात् घी का भोजन करने से उसकी शुद्धि होती है ॥ ३ ॥ सत्रतस्तु शुना दष्टो यस्त्रिरात्रमुपावसेत् । घृतं कुशोदकं पीत्वा व्रतशेषं समापयेत् ॥ ४ ॥ व्रत की अवस्था में यदि किसी ब्राह्मण को कुत्ते ने काट लिया हो, तो वह तीन दिन-रात उपवास करे ओर फिर घी तथा कुशा का जल पीकर व्रत के शेष दिनों को पूरा करे ॥ ४ ॥ अव्रतः सत्रती वाऽपि शुना दष्टो भवेद् द्विजः । प्रणिपत्य भवेत् पूतो विप्रैश्चक्षुर्निरीक्षितः ॥ ५ ॥ ब्राह्मण चाहे किसी व्रत में हो अथवा न हो, यदि उसे कुत्ते ने काट लिया हो तो वह ब्राह्मणों को दण्डवत् करे । यदि ब्राह्मण उसे आँखभर देख लें तो वह शुद्ध हो जाता है ॥ ५ ॥
४६ पाराशरस्मृतिः [ पञ्चमो- शुना घ्राताऽवलीढस्य नखैर्विलिखितस्य च । अद्भिः प्रक्षालनाच्छुद्धिर्ग्निना चोपचूलनम् ॥ ६ ॥ जिस वस्तु को कुत्ते ने सूंघ अथवा चाट लिया हो अथवा अपने नाखूनों से खसोट लिया हो, उस वस्तु की शुद्धि जल से धोकर आग में तपा देने से हो जाती है ॥ ६ ॥ शुना तु ब्राह्मणी दष्टा जम्बुकेन वृकेण वा । उदितं १सोमनक्षत्रं दृष्ट्वा सद्यः शुचिर्भवेत् ॥ ७ ॥ जिस ब्राह्मणी को कुत्ते, गीदड़ अथवा भेड़िये ने काट लिया हो वह उसी समय उदय होनेवाले चन्द्रमा सहित ताराओं को देखकर शुद्ध हो जाती है ॥ ७ ॥ कृष्णपक्षे यदा सोमो न दृश्येत कदाचन । यां दिशं व्रजते सोमस्तां दिशं वाऽवलोकयेत् ॥ ८ ॥ यदि कदाचित् कृष्णपक्ष के होने से चन्द्रमा दिखाई न दें तो जिस दिशा में चन्द्रमा जानेवाले हों उस दिशा को ही देख ले। चन्द्रमा की दिशा गति इस प्रकार है—मेष२, सिंह और धनु राशि में पूर्व दिशा में, वृष, कन्या, मकर राशि में दक्षिण दिशा में, मिथुन, तुला, कुम्भ में पश्चिम दिशा में, कर्क, वृश्चिक तथा मीन में उत्तर दिशा में चन्द्रमा रहते हैं ॥ ८ ॥ असद्ब्राह्मणके ग्रामे शुना दष्टो द्विजोत्तमः । वृषं प्रदक्षिणीकृत्य सद्यः स्नात्वा शुचिर्भवेत् ॥ ९ ॥ १. 'ग्रह-' इति । २. मेषे च सिंहे धन पूर्वभागे वृषे च कन्या मकरे तु याम्याम् । मिथुने तुले कुम्भसु पश्चिमायां कर्काऽलि-मीने दिशि चोत्तरस्याम् ॥
[Header] ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४७
यदि किसी ऐसे गाँव में ब्राह्मण को कुत्ते ने काट लिया हो, जिसमें एक भी ब्राह्मण न हो तो वह बेल की प्रदक्षिणा कर स्नान कर लेवे । इतने से ही वह शुद्ध हो जाता है ॥ ९ ॥ चाण्डालेन श्वपाकेन गोभिर्विप्रैर्हतो यदि । अहिताग्निर्मृतो विप्रो विषेणात्महतो यदि ॥१०॥ यदि कोई अग्निहोत्री, चाण्डाल ( ब्राह्मणी में शूद्र से उत्पन्न ), श्वपाक ( क्षत्राणी में शूद्र से उत्पन्न ), गौ अथवा ब्राह्मण के मारने से मर गया हो अथवा स्वयं विष खाकर आत्महत्या कर ले, तो ॥१०॥ दहेत्तं ब्राह्मणं विप्रो लोकाग्नौ मन्त्रवर्जितम् । स्पृष्ट्वा वोढ्वा च दग्ध्वा च सपिण्डेषु च सर्वथा ॥११॥ उस अग्निहोत्री ब्राह्मण को उसका कोई सपिण्डी ब्राह्मण बिना मन्त्र पढ़े ही लौकिक अग्नि में जला देवे और उसके स्पर्श, श्मशान तक वहन तथा दाह करने के पाप के निमित्त, ॥११॥ प्राजापत्यं चरेत् पश्चाद् विप्राणामनुशासनात् । दग्ध्वाऽस्थीनि पुनर्गृह्य क्षीरैः प्रक्षालयेत् द्विजः ॥१२॥ ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर प्राजापत्य व्रत करे । फिर वह ब्राह्मण उसकी हड्डियों का पुनः दाह कर उसे दूध से धोवे ॥१२॥ स्वेनाग्निना स्वमन्त्रेण पृथगेतत् पुनर्दहेत् । आहिताग्निर्द्विजः कश्चित् प्रवसन् कालचोदितः ॥१३॥ पुनः उसे अलग किसी स्थान पर अग्निहोत्र की अग्नि से मन्त्रपूर्वक जलावे ( पश्चात् उसकी क्रिया करे ) । यदि कोई अग्निहोत्री ब्राह्मण दुर्देव से परदेश में जाकर, ॥१३॥ देहनाशमनुप्राप्तस्तस्याऽग्निर्वर्तते गृहे । प्रेताऽग्निहोत्र-संस्कारः१ श्रूयतामृषिपुङ्गवाः ॥१४॥
[Footnote] १. 'श्रोताग्निहोत्रसंस्कारः इति पा० ।
४८ पाराशरस्मृतिः [ पञ्चमो- मर जाय और उसकी अग्नि उसके घर में हो, तो हे ऋषियो ! उसके अग्निहोत्र संस्कार को आप लोग सुनें ॥१४॥ कृष्णाजिनं समास्तीर्य कुशैस्तु पुरुषाकृतिम् । षट्शतानि शतं चैव पलाशानां च वृन्ततः ॥१५॥ काले मृग का चर्म फैलाकर, उसपर कुशा से पुरुष की आकृति बनावे । कुश न मिले तो ७०० पलाश के पत्तों को लेकर, ॥१५॥ चत्वारिंशच्छिरो दद्याच्छतं कण्ठे तु विन्यसेन् । बाहुभ्यां दशकं दद्यादङ्गुलीषु दशैव तु ॥१६॥ शिर में ४० पत्ते, गला में १०० पत्ते, बाहु में १० पत्ते, हाथ की अँगुलियों में १० पत्ते, ॥१६॥ शतं तु जघने दद्यात् द्विशतं तूदरे तथा । दद्यादष्टौ वृषणयोः पञ्च मेढे तु विन्यसेत् ॥१७॥ जांघ में १०० पत्ते, उदर में २०० पत्ते, अण्डकोश में ८ पत्ते, लिङ्ग में ५ पत्ते, ॥१७॥ एकविंशतिमूरुभ्यां द्विशतं जानु-जंघयोः । पादाङ्गुलीषु षड् दद्यात् यज्ञपात्रं ततो न्यसेत् ॥१८॥ ऊरु में २१ पत्ते, जानु तथा जंघा में २०० पत्ते तथा पैर की अँगुलियों में ६ पत्ते देवे । तदनन्तर यज्ञपात्रों को रखे ॥१८॥ शम्यां शिश्ने विनिःक्षिप्यः अरणी मुष्कयोरपि । जुहूं च दक्षिणे हस्ते वामे तूपभृतं न्यसेत् ॥१९॥ १. 'पादाङ्गुष्ठेषु' इति ।
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४९ यज्ञ के पात्रों के रखने का प्रकार ऐसा है—शमी को लिंग पर, अरणी को अण्डकोश पर, जुहू (स्रुवा) को दाहिने हाथ पर, उपभृत् को बाँयें हाथ पर, ॥१९॥ कर्णे चोलूखलं दद्यात् पृष्ठे च मुशलं न्यसेत् । उरसि क्षिप्य दृषदं तण्डुलाऽऽज्य-तिलान् मुखे ॥२०॥ ऊलूखल को कान पर, मुसल को पीठ पर, दृषत् को छाती पर, चावल, घी तथा तिल को मुख में देवे ॥२०॥ श्रोत्रे च प्रोक्षणीं दद्यादाज्यस्थालीं तु चक्षुषोः । कर्णे नेत्रे मुखे घ्राणे हिरण्यशकलं क्षिपेत्१ ॥२१॥ प्रोक्षणीपात्र कान पर, आज्यस्थाली आँखों पर तथा कान, आँख, नाक एवं मुँह में सुवर्ण का टुकड़ा देवे ॥२१॥ अग्निहोत्रोपकरणमशेषं तत्र विन्यसेत् । ‘असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहे’ त्येकाहुतिं सकृत् ॥२२॥ इस प्रकार उसके अग्निहोत्र का सारा उपकरण रखकर 'असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा' ऐसा कहकर एक आहुति देवे ॥२२॥ दद्यात् पुत्रोऽथवा भ्राताऽप्यन्यो वाऽपि च बान्धवः। यथा दहनसंस्कारस्तथा कार्यं विचक्षणैः ॥२३॥ इस प्रकार उस अग्निहोत्री का पुत्र, भाई अथवा दूसरा कोई सजातीय बान्धव आहुति देकर विज्ञ लोग विधानतः उसका दाह- संस्कार करें ॥२३॥ ईदृशं तु विधिं कुर्याद् ब्रह्मलोके गतिर्ध्रुवम्२ । दहन्ति ये द्विजास्तं तु ते यान्ति परमां गतिम् ॥२४॥ १. 'न्यसेत्' इति । २. 'गतिः स्मृता' इति ।
५० पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो- उपर्युक्त प्रकार की विधि करने से उस अग्निहोत्री को निश्चय ही ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है और जो ब्राह्मण इस प्रकार दाहसंस्कार करते हैं वे भी उत्तम लोक को प्राप्त करते हैं ॥२४॥ अन्यथा कुर्वते कर्म त्वात्मबुद्ध्या प्रचोदिताः । भवन्त्यल्पायुषस्ते वै पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥२५॥ इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ जो लोग अपनी बुद्धि की कल्पना से अन्यथा ( विपरीत ) काम करते हैं वे अल्पायु होकर अत्यन्त अपवित्र नरक में गिरते हैं ॥२५॥ इस प्रकार पण्डित शिवदत्तमिश्रशास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशरीय धर्मशास्त्र में पाँचवाँ अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥ ६. षष्ठोऽध्यायः अतः परं प्रवक्ष्यामि प्राणहत्यासु निष्कृतिम् । पराशरेण पूर्वोक्तां मन्वर्थेऽपि च विस्तृताम् ॥ १ ॥ अशौच प्रकरण के अनन्तर अब मैं प्राणहत्या का प्रायश्चित्त कहता हूँ, जिसे महर्षि पराशर ने पहले ही कहा है तथा मन्वादि स्मृतियों में भी विस्तारपूर्वक वर्णित है ॥१॥ क्रौञ्च-सारस-हंसांश्च चक्रवाकं च कुक्कुटम् । जालपादं च शरभं हत्वाऽहोरात्रतः शुचिः ॥ २ ॥ क्रौंच, सारस, हंस, चक्रवाक, मुर्ग, बत्तक तथा शरभ इनमें से किसी की हत्या करने से पुरुष एक दिन-रात का उपवास कर शुद्ध होता है ॥२॥