पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८ पाराशरस्मृतिः [ पञ्चमो- मर जाय और उसकी अग्नि उसके घर में हो, तो हे ऋषियो ! उसके अग्निहोत्र संस्कार को आप लोग सुनें ॥१४॥ कृष्णाजिनं समास्तीर्य कुशैस्तु पुरुषाकृतिम् । षट्शतानि शतं चैव पलाशानां च वृन्ततः ॥१५॥ काले मृग का चर्म फैलाकर, उसपर कुशा से पुरुष की आकृति बनावे । कुश न मिले तो ७०० पलाश के पत्तों को लेकर, ॥१५॥ चत्वारिंशच्छिरो दद्याच्छतं कण्ठे तु विन्यसेन् । बाहुभ्यां दशकं दद्यादङ्गुलीषु दशैव तु ॥१६॥ शिर में ४० पत्ते, गला में १०० पत्ते, बाहु में १० पत्ते, हाथ की अँगुलियों में १० पत्ते, ॥१६॥ शतं तु जघने दद्यात् द्विशतं तूदरे तथा । दद्यादष्टौ वृषणयोः पञ्च मेढे तु विन्यसेत् ॥१७॥ जांघ में १०० पत्ते, उदर में २०० पत्ते, अण्डकोश में ८ पत्ते, लिङ्ग में ५ पत्ते, ॥१७॥ एकविंशतिमूरुभ्यां द्विशतं जानु-जंघयोः । पादाङ्गुलीषु षड् दद्यात् यज्ञपात्रं ततो न्यसेत् ॥१८॥ ऊरु में २१ पत्ते, जानु तथा जंघा में २०० पत्ते तथा पैर की अँगुलियों में ६ पत्ते देवे । तदनन्तर यज्ञपात्रों को रखे ॥१८॥ शम्यां शिश्ने विनिःक्षिप्यः अरणी मुष्कयोरपि । जुहूं च दक्षिणे हस्ते वामे तूपभृतं न्यसेत् ॥१९॥ १. 'पादाङ्गुष्ठेषु' इति ।