पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ४९ यज्ञ के पात्रों के रखने का प्रकार ऐसा है—शमी को लिंग पर, अरणी को अण्डकोश पर, जुहू (स्रुवा) को दाहिने हाथ पर, उपभृत् को बाँयें हाथ पर, ॥१९॥ कर्णे चोलूखलं दद्यात् पृष्ठे च मुशलं न्यसेत् । उरसि क्षिप्य दृषदं तण्डुलाऽऽज्य-तिलान् मुखे ॥२०॥ ऊलूखल को कान पर, मुसल को पीठ पर, दृषत् को छाती पर, चावल, घी तथा तिल को मुख में देवे ॥२०॥ श्रोत्रे च प्रोक्षणीं दद्यादाज्यस्थालीं तु चक्षुषोः । कर्णे नेत्रे मुखे घ्राणे हिरण्यशकलं क्षिपेत्१ ॥२१॥ प्रोक्षणीपात्र कान पर, आज्यस्थाली आँखों पर तथा कान, आँख, नाक एवं मुँह में सुवर्ण का टुकड़ा देवे ॥२१॥ अग्निहोत्रोपकरणमशेषं तत्र विन्यसेत् । ‘असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहे’ त्येकाहुतिं सकृत् ॥२२॥ इस प्रकार उसके अग्निहोत्र का सारा उपकरण रखकर 'असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा' ऐसा कहकर एक आहुति देवे ॥२२॥ दद्यात् पुत्रोऽथवा भ्राताऽप्यन्यो वाऽपि च बान्धवः। यथा दहनसंस्कारस्तथा कार्यं विचक्षणैः ॥२३॥ इस प्रकार उस अग्निहोत्री का पुत्र, भाई अथवा दूसरा कोई सजातीय बान्धव आहुति देकर विज्ञ लोग विधानतः उसका दाह- संस्कार करें ॥२३॥ ईदृशं तु विधिं कुर्याद् ब्रह्मलोके गतिर्ध्रुवम्२ । दहन्ति ये द्विजास्तं तु ते यान्ति परमां गतिम् ॥२४॥ १. 'न्यसेत्' इति । २. 'गतिः स्मृता' इति ।