पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 51, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ें५ध्यायः ] भाषाटीकासहिता ३९ उपर्युक्त आठ प्रकार के प्रायश्चित्तों को विधि इस प्रकार है— प्रथम पाँच दिन अनिच्छा से पतित का संसर्ग होने पर त्रिरात्र, दूसरे दश दिन का साथ होने पर कृच्छ्र, तीसरे बारह दिन ससर्ग होने पर कृच्छ्रसान्तपन, ॥ ११ ॥ चतुर्थे दशरात्रं स्यात् पराकः पञ्चमे मतः । कुर्याच्चान्द्रायणं षष्ठे सप्तमे त्वेन्दर-द्वयम् ॥ १२ ॥ चौथे पन्द्रह दिन का संसर्ग होने पर दश रात्र, पाँचवें एक महीने संसर्ग होने पर पराक व्रत, छठे दो महीने संसर्ग होने पर चान्द्रायण, सातवें छः महीने के संसर्ग होने में दो चान्द्रायण ॥ १२ ॥ शुद्धयर्थमष्टमे चैव षण्मासान् कृच्छ्रमाचरेत् । पक्षसंख्याप्रमाणेन सुवर्णान्यपि दक्षिणा ॥१३॥ तथा आठवें एक वर्ष तक संसर्ग होने पर छः महीने तक कृच्छ्रव्रत करना चाहिए और जितने पक्ष पतितों के साथ रहे, व्रतोपरान्त उतने- उतने मुहर की दक्षिणा देवे ॥ १३ ॥ ऋतुस्नाता तु या नारी भर्त्तारं नोपसर्पति । सा मृता नरकं याति विधवा च पुनः पुनः ॥१४॥ रजस्वला होने के उपरान्त चौथे दिन स्नान कर लेने के बाद जो स्त्री अपने पति के पास नहीं जाती, वह मरकर नरक में जाती है और मृत्युलोक में आने पर बारम्बार विधवा होती है ॥ १४ ॥ ऋतुस्नातां तु यो भार्या सन्निधौ नोपगच्छति । घोरायां भ्रूणहत्यायां युज्यते नाऽत्र संशयः ॥१५॥ जो पुरुष ऋतु-काल के अनन्तर चौथे दिन स्नान कर शुद्ध हुई अपनी स्त्री के पास नहीं जाता, उसे भ्रूण हत्या का पाप लगता है, इसमें संशय नहीं ॥ १५ ॥