पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ पराशरस्मृतिः [ तृतीयो- यदि दशाह अशौच के भीतर ही कोई दूसरा जननाशौच या मरणाशौच उपस्थित हो जाय, तो प्रथम अशौच के दश दिन के भीतर ही दूसरे अशौच की शुद्धि हो जाती है । परन्तु दूसरे मृतक की स्त्री तथा लड़के को दश दिन का अशौच रहता ही है ॥३०॥ ब्राह्मणार्थे विपन्नानां बन्दिगोग्रहणे तथा । आहवेषु विपन्नानामेकरात्रमशौचकम् ॥३१॥ ब्राह्मण की रक्षा के लिए मरनेवालों का, कसाई के हाथ में पड़ी हुई गौ के छुड़ाने के लिए मरनेवालों का तथा संग्राम-स्थल में मरने- वालों का एक दिन-रात अशौच लगता है ॥३१॥ द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनौ । परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाऽभिमुखो हतः ॥३२॥ योगयुक्त ( अर्थात् योगाभ्यास में लीन ) संन्यासी तथा युद्ध में शत्रु के सम्मुख लड़कर मरनेवाला ये दोनों ही सूर्य-मण्डल को भेदकर सीधे स्वर्ग जाते हैं ॥३२॥ यत्र यत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिवेष्टितः । अक्षयान् लभते लोकान् यदि क्लीबं न भाषते ॥३३॥ शत्रुओं से घिरा हुआ वीर यदि कातर वचन न बोले और जिस- किसी भी स्थान पर शत्रु-सम्मुख लड़कर मर जाये, तो उसे अक्षय लोक मिलते हैं ॥३३॥ संन्यस्तं ब्राह्मणं दृष्ट्वा स्थानाच्चलति भास्करः । एष मे मण्डलं भित्त्वा परं स्थानं प्रयास्यति ॥३४॥ संन्यस्त ब्राह्मण को देखकर सूर्य काँप उठते हैं कि यह मेरे मण्डल का भेदकर ब्रह्मलोक को जायेगा ॥३४॥ यस्तु भग्नेषु सैन्येषु विद्रवत्सु समन्ततः । परित्राता यदा गच्छेत् स च क्रतुफलं लभेत् ॥३५॥