पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 47, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ३५ अपनी इच्छा से जाति अथवा परजाति के मुरदे के पीछे जाने- वाले को वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए । पश्चात् अग्नि का स्पर्श कर, उस दिन केवल घी चाटकर रहे तब उसकी शुद्धि होती है ॥४४॥ क्षत्रियं मृतमज्ञानाद् ब्राह्मणो योऽनुगच्छति । एकाहमशुचिर्भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्धयति ॥४५॥ जो ब्राह्मण अज्ञान से किसी मरे हुए क्षत्रिय के पीछे दाह के लिए जाता है, उसे एक दिन-रात का अशौच लगता है । फिर दूसरे दिन पंचगव्य पान करने से उसकी शुद्धि होती है ॥ ४५ ॥ शवं १तद्वैश्यमज्ञानाद् ब्राह्मणो २योऽनुगच्छति । कृत्वाऽशौचं द्विरात्रं च प्राणायामान् षडाचरेत् ॥४६॥ जो ब्राह्मण अज्ञान से किसी मरे हुए वैश्य के पीछे जाता है उसे दो दिन का अशौच लगता है, तदनन्तर तीसरे दिन छः प्राणायाम से उसकी शुद्धि होती है ॥ ४६ ॥ प्रेतीभूतं तु यः शूद्रं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः । अनुगच्छेन्नीयमानं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥४७॥ जो ब्राह्मण अज्ञान-वश किसी मरे हुए शूद्र के पीछे जाता है उसे तीन दिन-रात का अशौच लगता है ॥ ४७ ॥ त्रिरात्रे तु ततः पूर्णे नदीं गत्वा समुद्रगाम् । प्राणायामशतं कृत्वा घृतं प्राश्य विशुद्धयति ॥४८॥ तीन दिन-रात बीतने के पश्चात् किसी समुद्रगामिनी ( समुद्र में जाकर मिलनेवाली ) नदी में जाकर स्नान करे और सौ प्राणायाम करने के उपरान्त घी का भोजन करे तो उसकी शुद्धि होती है ॥४८॥ १. 'च' इत्यपि पा० । २. 'ह्य' इति ।