भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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३४ पाराशरस्मृतिः [ तृतीयो- ललाटदेशे रुधिरं स्रवच्च यस्याहवे तु प्रविशेच्च वक्त्रम् । तत्सोमपानेन किल.स्य तुल्यं संग्रामयज्ञ विधिवच्च दृष्टम् ॥४०॥ जिस पुरुष के संग्राम-यज्ञ में शत्रुओं से चोट लगने पर ललाटदेश से गिरता हुआ रुधिर उसके मुख में प्रवेश करता है, वह विधिवत् सोम-पान के तुल्य होता है ॥ ४० ॥ अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजातयः । पदे पदे यज्ञफलमानुपूर्व्याल्लभन्ति ते ॥४१॥ जो द्विजाति, अनाथ मरे हुए ब्राह्मण को उठाकर दाह करने के लिए ले जाते हैं, वे पग-पग पर अपूर्व यज्ञ के फल को प्राप्त करते हैं ॥ ४१ ॥ न तेषामशुभं किञ्चित् पापं वा शुभकर्मणाम् । जलावगाहनात्तेषां सद्यः शौचं विधीयते ॥४२॥ ऐसे पुण्य कर्म करनेवालों को कोई अशौच आदि पाप नहीं लगते । वे स्नान करके उसी क्षण शुद्ध हो जाते हैं ॥ ४२ ॥ असगोत्रमबन्धुं च प्रेतीभूतं द्विजोत्तमम् । वहयित्वा दाहयित्वा१ च प्राणायामेन शुद्धयति ॥४३॥ जो ब्राह्मण अपना सगोत्र अथवा बन्धु नहीं है उसके मर जाने पर श्मशान में ले जाकर दाह करनेवालों को एक प्राणायाम से शुद्धि होती है ॥ ४३ ॥ अनुगम्येच्छया प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव वा । स्नात्वा सचैलं स्पृष्ट्वाऽग्निं घृतं प्राश्य विशुद्धयति ॥४४॥ १. ‘दहित्वा’ इति पा० ।