पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ५७ यदि प्रमाद-वश ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-इन चार वर्णों में से कोई भी चाण्डाल के बरतन में रखे गये जल, दधि अथवा दूध को पी ले, तो ॥३०॥ ब्रह्मकूर्चोपवासेन द्विजातीनां तु निष्कृतिः । शूद्रस्य चोपवासेन तथा दानेन शक्तितः ॥३१॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की शुद्धि ब्रह्मकूर्च तथा उपवास से होती है । शूद्र उपवास तथा यथाशक्ति दान से शुद्ध हो जाता है ॥३१॥ भुङ्क्ते ऽज्ञानाद् द्विजश्रेष्ठश्चाण्डालान्नं कथञ्चन । गोमूत्रं यावकाहाराद् दशरात्रेण शुद्ध्यति ॥३२॥ यदि ब्राह्मण अनजान में किसी भाँति चाण्डाल का अन्न खा ले तो गोमूत्र में पकाये हुए ( यावक ) को दश रात तक खाने से शुद्ध होता है । ३२॥ एकैकं ग्रासमश्नीयाद् ³गोमूत्रयावकस्य च । दशाहं नियमस्तस्य व्रतं ⁴तत्र विनिर्दिशेत् ॥३३॥ दश रात तक गोमूत्र में पके हुए यावक को दश दिन तक एक-एक ग्रास प्रतिदिन खाये तथा उतने ही दिन नियम से रहे तो अनजान में खाये हुए चाण्डाल के अन्न से शुद्धि होती है ॥३३॥ १. ब्रह्मकूर्चम्— अहोरात्रोषितो भूत्वा पौर्णमास्यां विशेषतः । पञ्चगव्यं पिवेत् प्रातः 'ब्रह्मकूर्चम्' इति स्मृतम् ॥ अन्यत्राऽपि— पञ्चगव्येन देवेशं यः स्नापयति भक्तितः । ब्रह्मकूर्चाभिधानेन विष्णुलोके महीयते ॥ इति । २ '-यावकाहारो' इति । ३. 'गोमूत्रे' इति । ४. 'तत्तु' इति ।