भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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५६ पाराशरस्मृतिः [ षष्ठो- एक भक्त करे, फिर दिन-रात उपवास करे, तब उसकी शुद्धि होती है ॥२५॥ चाण्डालभाण्डसंस्पृष्टं पीत्वा कूपगतं जलम् । गोमूत्र यावकाहार स्त्रिरात्राच्छुद्धिमाप्नुयात् । २६॥ जिस कूप में चाण्डाल ने अपना जलपात्र डाल रखा हो, उस कुएँ का जल पी ले, तो तीन दिनों तक गोमूत्र में जव पकाकर खावे तब शुद्धि होती है ॥२६॥ चाण्डालघटसंस्थं तु यत्तोयं पिवति द्विजः । तत्क्षणात् क्षिपते यस्तु प्राजापत्यं समाचरेत् ॥२७॥ यदि कोई ब्राह्मण चाण्डाल के घड़े का जल पी ले और ज्ञात होने पर उसी क्षण वमन कर दे, तो उसे शुद्धि के लिए प्राजापत्य व्रत करना चाहिए ॥२७॥ यदि न क्षिपते तोयं शरीरे यस्य जीर्यति । प्राजापत्यं तदावश्यं कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥२८॥ जो चाण्डाल के घड़े का जल पीकर ज्ञात होने पर भी वमन न करे और वह जल उसके शरीर में पच गया हो तो उसे शुद्धि के लिए कृच्छ्र सान्तपन व्रत करना चाहिए ॥२८॥ चरेत् सान्तपनं विप्रः प्राजापत्यमनन्तरः । तदर्द्धं तु चरेद् वैश्यः पादं शूद्रस्य दापयेत् ॥२९॥ ब्राह्मण कृच्छ्र सान्तपन करे, क्षत्रिय चाण्डाल का जल पचाकर प्राजापत्य करे । वैश्य चाण्डाल का जल पचाकर अर्द्धप्राजापत्य तथा शूद्र प्राजापत्य का चतुर्थांश व्रत करे ॥२९॥ भाण्डस्थमन्त्यजानां तु जलं दधि पयः पिवेत् । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चैव प्रमादतः ॥३०॥